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राजीव गांधी की पुण्यतिथि: भारत को विकसित देशों में लाने की मंशा वाले नेता, कितनी चरितार्थ हो पाई उनकी सोच?

सार

राजीव गांधी का श्रीलंका में शांति सेना भेजना आत्मघाती कदम बना, इसके अलावा उन्होंने शाहबानो मामले में कोर्ट का फैसला संसद में पलटने का कदम उठाया था, उससे कांग्रेस अब तक निजात नहीं पा सकी है।
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राजीव गांधी की पुण्यतिथि - फोटो : Twitter
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विस्तार
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आज 21 मई है राजीव गांधी की पुण्यतिथि। 31साल पुरानी वो दिल दहलाने वाली घटना याद करने का दिन, जिसकी खबर ने 22 मई की सुबह, भारत ही नहीं समूची दुनिया को सन्न कर दिया था। मैं भी इसमें शामिल था, लेकिन मेरे लिए खबर एक अलग अर्थ में भी स्मरणीय है।  वो मुँह से अचानक निकला वाक्य सच होना।

मई का महीना था, परीक्षाओं के बाद छुट्टियां और हमारे शहर गंजबासौदा में दोस्तों का समूह रोज अलसुबह बेतवा नदी में तैराकी के लिए जाता था। जो पहले जाग जाए वो बाकी साथियाें को जगाने पहुंचता था। उस भोर में मैं अपने कमरे में गहरी नींद में था। मित्र संदीप दुबे ने जोर-जोर से खिड़की भड़भड़ाई तो मैं उठ गया। उठते ही संदीप ने पूछा-  खतरनाक खबर है यार, मैं नींद में था। मैंने अनायास यह कहा कि क्या हो गया क्या राजीव गांधी की हत्या हो गई?

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संदीप  रेडियो पर बीबीसी हिंदी पर खबर सुनकर आए थे और मैं नींद से उठा था, कुछ पता ही नहीं था, लेकिन कैसे यह बात मेरे मुंह से निकली, संदीप भी और मैं भी अवाक। संदीप ने बताया कि हां यही खबर सुनकर आया हूं। उस रोज बेतवा नदी नहीं गए। पूरा देश शोक में था।

सौम्य सुदर्शन पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का इस तरह कत्ल पूरे मुल्क को हिला गया। वे तब महज 47 साल के ही तो थे। बाद में जब 23 मई के अखबारों में उनकी हत्या की वारदात की विस्तृत खबरें और फोटो प्रकाशित हुए, राजीव जी को उनके जूतों से पहचाना जा सका।
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श्रीलंका में बागी भारतीय मूल के तमिलों के खिलाफ भारतीय सेना को शांति सेना के नाम पर भेजने से खफा तमिल चरमपंथियों के समर्थकों ने यह पूरा कांड किया था। माता की हत्या से उपजी सहानुभूति लहर में भारी बहुमत से प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी असल में प्रधानमंत्री बनना ही नहीं चाहते थे। उनकी पत्नी भी नहीं चाहती थीं कि वे प्रधानमंत्री बनें, उन्हें आशंका थी कि सास की तरह पति का भी ऐसा अंत न हो, लेकिन कहते हैं होनी को कौन टाल सका है।

 राजीव गांधी, अपनी मां की हत्या के बाद सिखों के नरसंहार के बीच न चाहते हुए भी प्रधानमंत्री बने थे। उनके इस वाक्य-
 

कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है ।


इसने आग में घी का काम कर दंगाइयों को भारतीय समाज में अपार जहर घोलने की मानो शह ही दे दी थी। वे दंगों के बावजूद माता की हत्या के प्रति सहानुभूति लहर में अतिप्रचंड बहुमत से प्रधानमंत्री बने। तब वे फकत 40 वर्ष के थे, सियासत के लिहाज से यह उम्र कमसिन ही कही जा सकती है। 


कंप्यूटर युग और राजीव

इस सरकार के कार्यकाल में उन्होंने भारत को कंप्यूटर युग में प्रवेश कराया और वे खुद को ऐसे शख्स के तौर पर याद करने की मंशा रखते थे, जिसने भारत को विकासशील की पांत से निकालकर विकसित देशों की श्रेणी में ला खड़ा किया।


यह सपना वे अपनी पांच साल की सरकार के दौरान पूरा न कर पाए, उनकी सरकार पांच साल के बाद दोबारा न बन सकी। वे बोफोर्स तोप मामले में ऐसे घिरे कि प्रचंड बहुमत प्रतिगामी हो गया। ये  गैर कांग्रेसवाद के भारी होने के दिन थे, उनकी सरकार के वित्त मंत्री वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने और राजीव गांधी की हत्या के बाद पीवी नरसिंहराव आए।

राजीव की हत्या न हुईं होती तो कांग्रेस का चुनावी प्रदर्शन और खराब होने वाला था। इसकी तसदीक इस हत्याकांड से पहले और बाद के चरणों के नतीजों के अंतर में साफ दिखा। नरसिंह राव सरकार के कार्यकाल में अयोध्या में बाबरी ढांचा जमीदोज हुआ और भाजपा का तेजी से उत्थान हुआ। फिर भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन, 13 महीने और फिर पांच साल यानी छह साल सरकार रही।

फिर राजीव की पत्नी सोनिया गांधी के नेतृत्व वाले यूपीए की लगातार दो बार सरकार और इसके  बाद प्रचंड बहुमत के साथ भाजपा की मोदी सरकार के पांच  साल और उससे भी प्रचंड बहुमत से फिर मोदी सरकार। जिसका एक साल बीत चुका है। 

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राजीव गांधी के सपने - फोटो : Istock
भारत अब भी विकसित देशाें की पांत में शामिल होने के लिए प्रयासरत है। पूरी दुनिया कोरोना वायरस के संकट से भयाक्रांत है, अर्थव्यवस्था संकट में है। भारत भी हलाकान है, राजीव गांधी के उत्तराधिकारी पार्टी के लगातार हाशिए पर जाने से जूझ रहे हैं, यह संकट भी अभूतपूर्व है।

कैसे और कहां चूके थे राजीव?

राजीव गांधी का श्रीलंका में शांति सेना भेजना आत्मघाती कदम बना, इसके अलावा उन्होंने शाहबानो मामले में कोर्ट का फैसला संसद में पलटने का कदम उठाया था, उससे कांग्रेस अब तक निजात नहीं पा सकी है। राजीव जी के जाने के ढाई दशक से ज्यादा अरसे  बाद भी उनके पुत्र को मंदिर मंदिर जाना पड़ रहा है, लेकिन तुष्टिकरण का असर जाने का नाम नहीं ले रहा।

इसी से ताकतवर बनी भाजपा से पार पाने में कांग्रेस बुरी तरह नाकाम साबित हो रही है।  राजीव ने भी कांग्रेस को आजादी के पहले की ही तरह हिंदुओं की जमात बनाने की एक बार कोशिश की थी। 

अयोध्या में विवादित राम जन्मभूमि मंदिर के ताले खुलवाए थे। यह दांव उनके पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक के खत्म होने का कारण बन गया। उप्र में कांग्रेस अब किस हालत में है, किसी से छुपा नहीं है। लोकसभा चुनाव में उसके उम्मीदवारों की जमानत जब्त होती है। उसी उप्र में जहां इलाहाबाद में राजीव के नाना-परनाना नेहरू (कौल कश्मीरी पंडित) के घर से देश की सियासत चलती थी।

आजादी के पहले भी और बाद में भी इस घराने का दबदबा रहा। आलम ये कि उनके पुत्र राहुल को उस अमेठी में हार झेलना पड़ी जो दशकों से काग्रेस की जीत की गारंटी थी। जहां संजय, राजीव और सोनिया के बाद खुद राहुल दो मर्तबा बेधड़क जीत चुके थे। सोनिया बमुश्किल इंदिरा जी की सीट रही रायबरेली भर बचा सकीं।      

कांग्रेस कैसे याद करे राजीव को?

आज राजीव गांधी को याद करने का दिन है। उनकी नृसंशा हत्या आज भी झकझोर देती है, लेकिन सियासत और उनके फैसले ऐसी घटनाओं की बार बार आवृत्ति करती हैं। कांग्रेसियों को आज राजीव को कैसे याद करना चाहिए? यह सवाल सियासी जानकारों के मंथन का है।

मुझे लगता है-
कांग्रेस को न केवल राजीव बल्कि इंदिरा और नेहरू जी की गलतियों से सबक लेना चाहिए। उनके अच्छे फैसलों को जनमानस में फिर ताजा करना चाहिए और जिन वजहों से देश में ताकतवर विपक्ष की भूमिका भी क्षीण हुई है, उन्हें दूर कर ताकतवर विपक्ष बनना चाहिए।

कांग्रेस ताकतवर विपक्ष बनने के बजाय सत्ता में लौटने की सीधी जुगत की तलाश में ज्यादा लगी है। ऐसे में जनता के सामने प्रचंड ताकत वाली सत्ता है और बिना विपक्ष बने सत्ता में आने के लिए तत्पर कमजोर विपक्ष। 

कांग्रेस एक परिवारवाद के साए से निकल पार्टी के उन नेताओं प्रधानमंत्रियों को भी अपनी विरासत माने जो इस परिवार के न थे, तो शायद हालात बदल भी सकते हैं। देश को ताकतवर विपक्ष की जरूरत है। यह जल्द हो पाएगा, इसकी उम्मीद कम ही लगती है। देखना होगा कि इस पार्टी का सियासत और नेतृत्व किस तरफ जाता है?  राजीव जी के शब्द आज भी कानों में गूंजते हैं-
हमने देखा, हम देख रहे हैं, हम देखेंगे।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw।co।in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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