भारत अब भी विकसित देशाें की पांत में शामिल होने के लिए प्रयासरत है। पूरी दुनिया कोरोना वायरस के संकट से भयाक्रांत है, अर्थव्यवस्था संकट में है। भारत भी हलाकान है, राजीव गांधी के उत्तराधिकारी पार्टी के लगातार हाशिए पर जाने से जूझ रहे हैं, यह संकट भी अभूतपूर्व है।
कैसे और कहां चूके थे राजीव?
राजीव गांधी का श्रीलंका में शांति सेना भेजना आत्मघाती कदम बना, इसके अलावा उन्होंने शाहबानो मामले में कोर्ट का फैसला संसद में पलटने का कदम उठाया था, उससे कांग्रेस अब तक निजात नहीं पा सकी है। राजीव जी के जाने के ढाई दशक से ज्यादा अरसे बाद भी उनके पुत्र को मंदिर मंदिर जाना पड़ रहा है, लेकिन तुष्टिकरण का असर जाने का नाम नहीं ले रहा।
इसी से ताकतवर बनी भाजपा से पार पाने में कांग्रेस बुरी तरह नाकाम साबित हो रही है। राजीव ने भी कांग्रेस को आजादी के पहले की ही तरह हिंदुओं की जमात बनाने की एक बार कोशिश की थी।
अयोध्या में विवादित राम जन्मभूमि मंदिर के ताले खुलवाए थे। यह दांव उनके पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक के खत्म होने का कारण बन गया। उप्र में कांग्रेस अब किस हालत में है, किसी से छुपा नहीं है। लोकसभा चुनाव में उसके उम्मीदवारों की जमानत जब्त होती है। उसी उप्र में जहां इलाहाबाद में राजीव के नाना-परनाना नेहरू (कौल कश्मीरी पंडित) के घर से देश की सियासत चलती थी।
आजादी के पहले भी और बाद में भी इस घराने का दबदबा रहा। आलम ये कि उनके पुत्र राहुल को उस अमेठी में हार झेलना पड़ी जो दशकों से काग्रेस की जीत की गारंटी थी। जहां संजय, राजीव और सोनिया के बाद खुद राहुल दो मर्तबा बेधड़क जीत चुके थे। सोनिया बमुश्किल इंदिरा जी की सीट रही रायबरेली भर बचा सकीं।
कांग्रेस कैसे याद करे राजीव को?
आज राजीव गांधी को याद करने का दिन है। उनकी नृसंशा हत्या आज भी झकझोर देती है, लेकिन सियासत और उनके फैसले ऐसी घटनाओं की बार बार आवृत्ति करती हैं। कांग्रेसियों को आज राजीव को कैसे याद करना चाहिए? यह सवाल सियासी जानकारों के मंथन का है।
मुझे लगता है-
कांग्रेस को न केवल राजीव बल्कि इंदिरा और नेहरू जी की गलतियों से सबक लेना चाहिए। उनके अच्छे फैसलों को जनमानस में फिर ताजा करना चाहिए और जिन वजहों से देश में ताकतवर विपक्ष की भूमिका भी क्षीण हुई है, उन्हें दूर कर ताकतवर विपक्ष बनना चाहिए।
कांग्रेस ताकतवर विपक्ष बनने के बजाय सत्ता में लौटने की सीधी जुगत की तलाश में ज्यादा लगी है। ऐसे में जनता के सामने प्रचंड ताकत वाली सत्ता है और बिना विपक्ष बने सत्ता में आने के लिए तत्पर कमजोर विपक्ष।
कांग्रेस एक परिवारवाद के साए से निकल पार्टी के उन नेताओं प्रधानमंत्रियों को भी अपनी विरासत माने जो इस परिवार के न थे, तो शायद हालात बदल भी सकते हैं। देश को ताकतवर विपक्ष की जरूरत है। यह जल्द हो पाएगा, इसकी उम्मीद कम ही लगती है। देखना होगा कि इस पार्टी का सियासत और नेतृत्व किस तरफ जाता है? राजीव जी के शब्द आज भी कानों में गूंजते हैं-
हमने देखा, हम देख रहे हैं, हम देखेंगे।
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