मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों की हालत भी खराब
यहां बात अकेले राजस्थान की नहीं हैं, जहां
कुल 9 लाख 13 हजार 50 स्कूलों में से 2 हजार स्कूल के भवन जीर्ण शीर्ण हालत में है, बल्कि मध्यप्रदेश सहित अधिकांश राज्यों की यही स्थिति है।
मप्र में 211 स्कूलों के पास भवन ही नहीं है।
1275 स्कूलों में शिक्षक ही नहीं है तो
12 हजार से ज्यादा स्कूलों में सिर्फ एक शिक्षक है। राज्य सरकार ने एक अधिकृत जवाब में माना कि
मप्र में 5600 स्कूल भवनों की हालत जर्जर है। कई स्कूलों में बारिश में छत से पानी टपक रहा है तो स्कूल के प्लास्टर उखड़ना और दीवार गिरना असाधारण बात नहीं है।
प्रदेश की राजधानी भोपाल में ही पिछले दिनों एक पीएमश्री स्कूल में छत का प्लास्टर गिरने से एक छात्रा घायल हो गई थी। 67 हजार में फर्नीचर और 15 हजार विद्यालयों में बिजली तक नहीं है। 2,787 स्कूलों में बालिका शौचालय ही नहीं हैं।
यहां तक कि बालकों के लिए भी 3116 स्कूलों में शौचालय नहीं हैं। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस नेता कमलनाथ ने हाल में आरोप लगाया था कि मप्र शिक्षकों के 70 हजार पद खाली हैं और 15 हजार शिक्षक गैर शैक्षणिक कार्यों में लगे हैं।
हालांकि, मप्र सरकार ने अब स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती का अभियान शुरू किया है, जिसके तहत 13 हजार स्कूली शिक्षकों की नियुक्ति की जानी है। लेकिन यह भी नाकाफी है। स्कूल भवनों के रखरखाव के लिए कितना बजट है, यह स्पष्ट नहीं है।
देशभर में सरकारी स्कूलों की अहम भूमिका
यह स्थिति तकरीबन देश के सभी राज्यों के सरकारी स्कूलों की है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार
देश वर्तमान में कुल 10 लाख 22 हजार 386 सरकारी स्कूल हैं। यह भारत भर के कुल स्कूलों की संख्या का 68.7 फीसदी है। इसका अर्थ यही है कि देश में स्कूली शिक्षा में अभी भी सरकारी स्कूलों की अहम भूमिका है।
इन स्कूलों में कुल स्कूली बच्चों के 54 प्रतिशत बच्चे पढ़ते हैं और सरकारी स्कूल कुल शिक्षकों का 51.4 रोजगार देते हैं। देश में सबसे ज्यादा सरकारी स्कूल उत्तर प्रदेश में यानी 16 लाख से ज्यादा से हैं। उसके बाद राजस्थान और मध्यप्रदेश का नंबर है। हालांकि देश में सबसे अच्छा छात्र शिक्षक अनुपात यूपी में है।
आखिर शिक्षा बजट कहां जा रहा?
ऐसा नहीं है कि सरकारें शिक्षा के लिए बजट नहीं दे रही हैं या फिर बढ़ा नहीं रही हैं। हालांकि यह बजट नीति आयोग द्वारा प्रस्तावित कुल जीडीपी के 6 फीसदी से अभी भी कम है, जबकि होना चाहिए। वर्ष 2024- 25 के बजट में मोदी सरकार ने शिक्षा के लिए 1.20 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया था।
न केवल केन्द्र बल्कि अधिकांश राज्यों में भी
शिक्षा के लिए बजट बढ़ तो रहा है, लेकिन जा कहां रहा है, वह बड़ा सवाल है। स्वीकृत बजट में से भी ज्यादातर खर्च उन चुनिंदा स्कूलों पर ही हो रहा है, जिसे सरकार ‘
वीआईपी’ मानती है।
दूरदराज के सरकारी स्कूल राम भरोसे हैं। जबकि शिक्षा और उसका अधिकार सबके लिए बराबर है और होना चाहिए। इसमें गांव और शहर का भेदभाव भी अस्वीकार्य है।
पिपलोदी हादसे में भी हमेशा की तरह राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं। गिरी छत तुम्हारे शासन में बनी कि हमारे शासन में, यह मूर्खता पूर्ण बहस केवल जनता को धोखा देना है।
जबकि, शिक्षा और वो भी स्कूली शिक्षा राजनीति का विषय होना ही नहीं चाहिए। क्योंकि शिक्षा देश की नई पीढ़ी को सुशिक्षित और उसे योग्य इंसान बनाने का उपक्रम है। दरअसल स्कूली शिक्षा को दोयम दर्जे का मानकर उसे हिकारत की नजर देखना भी अपने आप में बड़ा सामाजिक और मानव विकास की दृष्टि से महापाप है।
पिपलोदी का हादसा भी इस मायने में ‘हत्या’ ही है। इसे सिर्फ इसलिए अनदेखा नहीं किया जा सकता कि स्कूल की छत ढह जाने से वहां पढ़ रहे जो फूल असमय कुम्हला गए, उनमें आपका बच्चा नहीं था।
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