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संस्कृत भाषा में केवल शपथ न लें, देवभाषा को पुनः खोई प्रतिष्ठा दिलाएं

सार

हालांकि, अभी भी संस्कृत पुनः जन-जन की भाषा बनने से कोसों दूर है। यह बात भी ठीक है कि वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार के समय भारतीय भाषाओं पर अधिक जोर दिया गया है। अंग्रेजी से हटकर सरकारी कामकाज में हिंदी को बढ़ावा मिला है। हिंदी के साथ संस्कृत भाषा को भी आगे बढ़ाने के प्रयासों को और गति प्रदान की जानी चाहिए।
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Rajasthan 2023 Oath Taking Ceremony - फोटो : Istock
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विस्तार
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देवभाषा संस्कृत एक बार फिर चर्चाओं में है। राजस्थान विधानसभा में 22 विधायकों ने संस्कृत भाषा में शपथ ग्रहण की है, जो एक रिकॉर्ड है। पिछले एक दशक में संस्कृत भाषा को लेकर खोई प्रतिष्ठा दिलाने के लिए देश-दुनिया में व्यापक प्रयास हो रहे हैं। हालांकि, अभी भी संस्कृत पुनः जन-जन की भाषा बनने से कोसों दूर है। यह बात भी ठीक है कि वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार के समय भारतीय भाषाओं पर अधिक जोर दिया गया है। अंग्रेजी से हटकर सरकारी कामकाज में हिंदी को बढ़ावा मिला है। हिंदी के साथ संस्कृत भाषा को भी आगे बढ़ाने के प्रयासों को और गति प्रदान की जानी चाहिए।

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संस्कृत विश्व की प्राचीनतम भाषा है। यह पूर्णतः वैज्ञानिक है। यह प्राचीन और नवीन ज्ञान के बीच का एक सेतु है। खगोल, गणित, ज्योतिष, चिकित्सा, वास्तुशास्त्र, मानव शरीर, मन-मस्तिष्क आदि जीवन के सभी पहलुओं का पूरा ज्ञान संस्कृत साहित्य में समाहित है। संस्कृत भाषा हमारी संस्कृति की आत्मा है।

चारों वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद की रचना संस्कृत में की गई है। श्रीमद् भागवत गीता, उपनिषद, वाल्मीकि रामायण संस्कृत में रचित हैं। यह विश्व की एकमात्र ऐसी भाषा है, जो अपनी ध्वनियों, लिपि और पूर्णत: परिष्कृत व्याकरण के मेल से एक अक्षर के उपयोग से पूर्ण वाक्य और काव्य रचना में सक्षम है। 
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संस्कृत भाषा में उच्चारित ध्वनियां, शुद्ध उच्चारण के साथ बोले गए मंत्र न सिर्फ पंच तत्वों से निर्मित मानव के स्थूल और सूक्ष्म शरीर को प्रभावित करते हैं, वरन प्राकृतिक अवयवों, वातावरण और स्थिति-परिस्थितियों को भी प्रभावित करते हैं। वास्तव में उन्नति की तलाश करते मानव की दौड़ घूमकर उसी पथ पर आने लगी है, जहां से यह उन्नति यात्रा प्रारंभ हुई थी। कहते हैं, साहित्य का समाज और व्यक्तित्व पर बहुत प्रभाव पड़ता है। संस्कृत साहित्य किस प्रकार उच्चतम ज्ञान के साथ विनम्रता के गुण सिखाता है, यह संस्कृत के किसी भी विद्वान से मिलकर जान सकते हैं। संस्कृत भाषा की जानकारी रखने वाले अधिकांश विद्वान अत्यंत ज्ञानवान, परंतु विनम्र मिलेंगे। 

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Rajasthan Oath Taking Ceremony - फोटो : अमर उजाला
यह सच है कि पिछले कुछ दशकों में संस्कृत की उपेक्षा होती आई है। विशेष कर 1947 में स्वतंत्रता के बाद संस्कृत पर जितना ध्यान दिया जाना था, उतना नहीं दिया गया, जबकि अंतरराष्ट्रीय फोर्ब्स पत्रिका ने अपने 1987 के एक अंक में यहां तक लिखा था कि संस्कृत भाषा में सर्वाधिक शुद्धता है। यह कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर के लिए सबसे उपयुक्त भाषा है। आज संस्कृत का शब्दकोश भी दुनिया में सबसे बड़ा है। संस्कृत में 102.78 अरब शब्द हैं। 

कमाल की बात है कि जिस संस्कृत की भारत में उपेक्षा होती आ रही है, उसकी ओर दुनिया के कई देश आकर्षित हो रहे हैं। खासकर यूरोपीय देशों में संस्कृत सीखने की लिए युवा आतुर हैं। जर्मनी में 14 विश्वविद्यालयों में संस्कृत की न केवल पढ़ाई चल रही है, बल्कि अलग से विभाग तक गठित किए गए हैं। ब्रिटेन के चार विश्वविद्यालय में संस्कृत की पढ़ाई हो रही है। यूनिवर्सिटी ऑफ हेडेलबर्ग में पिछले साल 34 देशों के 254 छात्र संस्कृत का कोर्स कर रहे थे। वहां यह संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती आ रही है। फ्रांस, इटली, नीदरलैंड जैसे देशों में संस्कृत को पढ़ाया जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी संस्कृत भाषा को बढ़ावा देने के प्रयासों में जुटे हैं। इसी साल अगस्त में अपने मन की बात कार्यक्रम में उन्होंने विश्व संस्कृत दिवस की बधाई देते हुए कहा था कि भारत का प्राचीन ज्ञान हजारों वर्षों तक संस्कृत भाषा में संरक्षित किया गया है। योग, आयुर्वेद और दर्शन जैसे विषयों पर शोध करने वाले लोग अब ज्यादा से ज्यादा संस्कृत सीख रहे हैं।

संस्कृत के उत्थान के लिए उनकी सरकार लगातार प्रयासरत है। पिछले साल अगस्त में मोदी सरकार ने महर्षि सांदीपनि राष्ट्रीय वेद संस्कृत शिक्षा बोर्ड का गठन किया। इसके तहत सांदीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान के पांच क्षेत्रीय केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने संसद में बताया था कि बोर्ड से संबद्ध 123 पाठशालाएं हैं, जिसमें 4600 छात्र और 632 शिक्षक हैं।

वैसे संस्कृत को बढ़ावा देने में इनदिनों सोशल मीडिया भी अपना अहम योगदान दे रहा है। संस्कृत पर ज्ञान बढ़ाने वाले कई अकाउंट्स सोशल मीडिया पर चल रहे हैं, जिनकी व्यूअरशिप लाखों में है। संस्कृत पॉइंट 2 नाम से दो किशोरियां अपना इंस्टाग्राम चैनल चलती हैं, जिस पर 5.76 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स हैं। लोग अपनी देवभाषा संस्कृत के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। आज जरूर संस्कृत भाषा को आगे बढ़ाने की है। केवल विधानसभा में चंद विधायकों के शपथ लेने से काम नहीं चलेगा। संस्कृत को पुनः उसकी प्रतिष्ठा दिलाने के लिए भागीरथ प्रयास करने होंगे।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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