आखिर ऐसे कौन से कारण रहे, जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी के राजस्थान जैसे सुरक्षित किले में सेंध लगा दी। एक तो पार्टी ने बिल्कुल नए नवेले चेहरे पर दांव लगाया। भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री पद दिया गया, जो पहली बार के विधायक थे और उन्हें सरकार चलाने का अनुभव नहीं था। पार्टी यह संदेश देना चाहती थी कि वो एक सामान्य कार्यकर्ता को भी आगे बढ़ाती है।
राजस्थान में बड़ा उलटफेर हो गया है। दो बार से हैट्रिक लगा रही भारतीय जनता पार्टी इस बार आधी सीटों पर सिमटती नजर आ रही है। कांग्रेस को मरू प्रदेश में संजीवनी मिली है। साफ लग रहा है कि प्रदेश में भाजपा का अति आत्मविश्वास उसे भारी पड़ गया। कांग्रेस ने मजबूती से चुनाव लड़ा और इंडी गठबंधन के सहयोगियों को भी साथ लेकर चली।
आखिर ऐसे कौन से कारण रहे, जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी के राजस्थान जैसे सुरक्षित किले में सेंध लगा दी। एक तो पार्टी ने बिल्कुल नए नवेले चेहरे पर दांव लगाया। भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री पद दिया गया, जो पहली बार के विधायक थे और उन्हें सरकार चलाने का अनुभव नहीं था। पार्टी यह संदेश देना चाहती थी कि वो एक सामान्य कार्यकर्ता को भी आगे बढ़ाती है। शायद यहां पर पार्टी से थोड़ी चूक हुई। इसका असर यह हुआ कि दो बार की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पूरे लोकसभा चुनाव के परिदृश्य से गायब रहीं। वो केवल अपने पुत्र दुष्यंत सिंह की झालावाड़ सीट तक प्रचार में सीमित रहीं। अन्य वरिष्ठ नेता भी अपनी-अपनी सीटों पर नजर आए।
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के समय उनकी कुछ योजनाओं को लेकर जनता में जबरदस्त उत्साह था। खासकर हेल्थ इंश्योरेंस की चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना की प्रदेश भर में तारीफ हो रही थी, लेकिन जैसे ही सरकार बदली, यह योजना ठंडे बस्ते में चली गई। इसका असर लोकसभा चुनाव में देखने को मिल रहा है।
कानून व्यवस्था के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा चुनाव लड़ा था और जीता था, लेकिन सरकार बनने के बाद कानून व्यवस्था की स्थिति में बहुत ज्यादा फर्क नजर नहीं आया।
यह बात ठीक है कि भजनलाल सरकार को 90 दिन ही काम करने के लिए मिले और उसके बाद आचार संहिता लग गई, लेकिन कानून व्यवस्था की स्थिति को लेकर कहीं न कहीं जनता ने वोट के माध्यम से अपनी नाराजगी जाहिर कर दी है। राजस्थान में राजपूतों की नाराजगी को भाजपा ने हल्के में लिया। इसका असर साफ देखने को मिल रहा है।
राजस्थान से भाजपा के चार केंद्रीय मंत्री और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला चुनाव मैदान में हैं। बाड़मेर-जैसलमेर सीट पर केंद्रीय मंत्री कैलाश चौधरी तीसरे नंबर पर खिसक गए हैं, जबकि बीकानेर में अर्जुनराम मेघवाल, जोधपुर में गजेंद्र सिंह शेखावत और अलवर में भूपेंद्र यादव जीत की ओर हैं। कोटा में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला भी बढ़त लिए हुए हैं, लेकिन इन सीटों पर कोई बहुत बड़ी जीत दिखाई नहीं दे रही है।
कांग्रेस ने भाजपा की कमजोरी का फायदा उठाया और मजबूती से प्रचार किया। खासकर शेखावाटी और पूर्वी राजस्थान में कांग्रेस का प्रदर्शन बता रहा है कि पार्टी ने काफी अच्छी ताकत इलाकों में झोंकी है। पार्टी जाट वोटों को भी साधने में कामयाब रही है। आदिवासी वोटों के लिए भारत आदिवासी पार्टी (बाप) के प्रत्याशी राजकुमार रोत को अंतिम क्षण में बांसवाड़ा सीट पर समर्थन दिया, जबकि कांग्रेस अपना प्रत्याशी घोषित कर चुकी थी। इसका भी लाभ पार्टी को हुआ।
हनुमान बेनीवाल को भी पार्टी ने साधे रखा और नागौर की सीट छोड़ दी। वामदल के लिए सीकर सीट को छोड़ा। यहां इंडी गठबंधन के अमराराम चौधरी बढ़त ले रहे हैं। भले पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सुपुत्र वैभव गहलोत जालोर से चुनाव हार रहे हैं, लेकिन इंडी गठबंधन का राजस्थान में प्रदर्शन बहुत ही जबरदस्त है।
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