वैसे तो कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी की राजनीति में धार्मिक प्रतीकों की मौजूदगी कोई नई बात नहीं है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उनके सार्वजनिक व्यवहार को देखें तो एक दिलचस्प बदलाव जरूर दिखाई देता है।
कभी मंदिरों में दर्शन, कभी स्वयं को शिवभक्त बताना, कभी जनेऊधारी हिंदू होने का उल्लेख और अब अपने सरकारी आवास पर कांग्रेस के सौ से अधिक नेताओं के साथ दिवाली मिलन। इन गतिविधियों को केवल व्यक्तिगत आस्था का विषय मानकर छोड़ देना शायद राजनीतिक घटनाक्रम की पूरी तस्वीर नहीं होगी। इनके पीछे कांग्रेस की राजनीतिक चुनौतियों और हिंदू समाज के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश को भी समझना होगा।
बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस बहुसंख्यक समाज के बीच अपनी खोई राजनीतिक जमीन तलाश रही है?
दरअसल, 6 नवंबर को राहुल गांधी ने अपने आवास पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के लिए दिवाली मिलन आयोजित किया। इसमें सोनिया गांधी, प्रियंका वाड्रा, पार्टी के महासचिव, कार्यसमिति के सदस्य, मुख्यमंत्री और कई पूर्व मुख्यमंत्री शामिल हुए। अपने 21 वर्ष के सक्रिय राजनीतिक जीवन में राहुल गांधी का अपने आवास पर इस स्तर का पहला दिवाली आयोजन था।
पार्टी के नेताओं ने इसे आपसी मेल-मिलाप और संगठन की एकजुटता का अवसर बताया। हालांकि, आयोजन ऐसे समय हुआ, जब कांग्रेस एसआईआर और कथित वोटचोरी के मुद्दे पर सरकार के खिलाफ अपना अभियान तेज कर रही है। जाहिर है, इस मुलाकात का संगठनात्मक महत्व भी था।
राहुल गांधी की मंदिर यात्राएं
राहुल गांधी की मंदिर यात्राओं का राजनीतिक संदर्भ वर्ष 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव से जुड़ता है। उस समय कांग्रेस ने उनके मंदिर दर्शन को चुनाव प्रचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। द्वारकाधीश, अंबाजी, सोमनाथ, अक्षरधाम और अन्य प्रमुख मंदिरों में उनकी यात्राएं लगातार सुर्खियों में रहीं।
कांग्रेस की कोशिश भाजपा के उस राजनीतिक विमर्श का जवाब देने की थी, जिसमें हिंदुत्व और सांस्कृतिक पहचान प्रमुख मुद्दे थे। राहुल गांधी की इन यात्राओं को राजनीतिक विश्लेषकों ने सॉफ्ट हिंदुत्व की रणनीति के रूप में देखा।
सोमनाथ मंदिर में गैर-हिंदू आगंतुकों के रजिस्टर को लेकर विवाद हुआ तो कांग्रेस ने राहुल गांधी को जनेऊधारी हिंदू बताते हुए उनकी धार्मिक पहचान का बचाव किया। इस प्रकरण ने यह भी दिखाया कि कांग्रेस के लिए राहुल गांधी की धार्मिक पहचान चुनावी राजनीति में कितनी महत्वपूर्ण हो चुकी थी। इसके बाद वर्ष 2018 में कैलाश मानसरोवर यात्रा और नवंबर 2023 में केदारनाथ दर्शन ने उनके शिवभक्त होने की सार्वजनिक छवि को और प्रमुखता दी।
राहुल गांधी कई अवसरों पर भगवद्गीता और उपनिषदों का अध्ययन करने की बात भी कह चुके हैं। हालांकि, यहां यह कहना उचित नहीं होगा कि उनकी सभी धार्मिक यात्राएं चुनावी उद्देश्य से ही प्रेरित थीं, लेकिन जब किसी नेता की धार्मिक गतिविधियों को पार्टी चुनाव प्रचार का हिस्सा बनाती है, तब उनके राजनीतिक संदेश पर चर्चा स्वाभाविक है।
इफ्तार पार्टी की मेजबानी
राहुल गांधी की राजनीतिक सक्रियता का दूसरा पहलू इफ्तार पार्टियों से जुड़ा है। जून 2018 में कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने दिल्ली में इफ्तार पार्टी की मेजबानी की थी। इसमें पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, प्रतिभा पाटिल और पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी सहित कई प्रमुख हस्तियां शामिल हुई थीं।
इसके बाद सात वर्षों तक राहुल गांधी किसी इफ्तार पार्टी में शामिल नहीं हुए। मार्च 2025 में वे कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी की इफ्तार पार्टी में पहुंचे। उसी महीने सोनिया गांधी ने इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के इफ्तार कार्यक्रम में भाग लिया।
कांग्रेस की राजनीतिक संस्कृति में इफ्तार आयोजनों की एक पुरानी परंपरा रही है, पर राहुल गांधी की ओर से अपने आवास पर इतने बड़े स्तर पर दिवाली मिलन आयोजित करना एक नई पहल है।
इफ्तार में शामिल होना या दिवाली मनाना किसी भी नेता का व्यक्तिगत और सामाजिक अधिकार है। सवाल तब उठता है, जब धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों की सक्रियता राजनीतिक परिस्थितियों के साथ बदलती दिखाई देती है। क्या कांग्रेस को अब यह एहसास हो रहा है कि हिंदू समाज के साथ उसका संवाद पर्याप्त नहीं रहा है? क्या राहुल गांधी अपनी राजनीतिक छवि को उस वर्ग के बीच अधिक स्वीकार्य बनाना चाहते हैं, जहां भाजपा ने लंबे समय से मजबूत जनाधार बनाया है?
भाजपा कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाती रही है। कांग्रेस इन आरोपों को खारिज करती है, लेकिन चुनावी राजनीति में केवल वास्तविकता नहीं, धारणा भी महत्वपूर्ण होती है। राहुल गांधी की मंदिर यात्राएं, जनेऊधारी हिंदू होने का उल्लेख और अब दिवाली मिलन को इस धारणा को बदलने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
इसे सॉफ्ट हिंदुत्व की रणनीति कहना राजनीतिक विश्लेषण है। हालांकि, इसके पीछे केवल वोट हासिल करने का उद्देश्य है, ऐसा कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है।
कांग्रेस के सामने असली चुनौती इससे कहीं बड़ी है। हिंदू समाज के साथ जुड़ाव केवल मंदिरों में दर्शन करने, धार्मिक प्रतीक धारण करने या त्योहार पर नेताओं को आमंत्रित करने से नहीं बनता। इसके लिए भारतीय संस्कृति, परंपराओं, तीर्थस्थलों और सभ्यतागत विरासत के प्रति स्पष्ट और निरंतर दृष्टिकोण चाहिए। राहुल गांधी को यह समझना होगा कि धार्मिक प्रतीकों के माध्यम से राजनीतिक संदेश देना आसान है, लेकिन सामाजिक विश्वास हासिल करना कठिन।
हिंदू समाज की सांस्कृतिक चेतना किसी चुनावी कार्यक्रम या कुछ मंदिर यात्राओं तक सीमित नहीं है। वह हजारों वर्षों की परंपरा, आस्था और जीवन-पद्धति से जुड़ी है। उसे समझने के लिए निरंतर संवाद और व्यवहार में सम्मान दिखाई देना चाहिए। कांग्रेस के लिए चुनौती केवल हिंदू मतदाताओं तक पहुंच बनाने की नहीं, बल्कि उनके बीच विश्वास पैदा करने की है।
मंदिरों में दर्शन और दिवाली पर मिलन समारोह राजनीतिक सुर्खियां तो बना सकते हैं, लेकिन सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रमाण तभी बनेंगे जब यह सक्रियता चुनावी अवसरों से आगे भी दिखाई देगी।
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