भारत-नेपाल का संबंध
ओली के प्रभाव के नाते भारत संग सीमा विवाद को हवा भी दिया जा सकता है। वहीं चीन समर्थक वामपंथी धरों के सत्ता साझीदार होने नाते पूर्व में बने एमिनेंट पर्सन ग्रुप प्रस्तावों पर भारत को सहमति हेतु पुनः दबाब दिया जा सकता है। इसके अंतर्गत भारत नेपाल रिश्तों की डोर सन् 1950 की द्विपक्षीय संधि के समापन तथा सीमा पर बाड़ लगाने की योजना है।
जहां लाखों नेपाली नागरिक भारत में सरकारी, निजी-नौकरी और व्यापार में हैं। वही यहां नेपाली भाषी नागरिकों की भी एक बड़ी आबादी है। अब तक दोनों देशों के नागरिक एक दूसरे के यहां बे-रोक-टोक धार्मिक यात्राएं और विवाह करते रहे हैं। ऐसा होने से सीमा के दोनों ओर होने वाली सहज यात्राएं, विवाह और व्यापार सभी कुछ प्रभावित होगा।किंतु ओली समर्थन पर टिकी सरकार में प्रचंड कितना कुछ इन बदलाव ला पाएंगे और कितना कुछ इन व्यर्थ के विवादों को दूर रख पाएंगे फिलहाल कहना कही अधिक कठिन है।
वैसे नेपाल के इस नई सरकार गठन के घटनाक्रम को चीन भारत के हवाले से देखें तो फिलहाल चीन कहीं अधिक सफल है। उसने पिछले अनुभवों से सीखते हुए बिना किसी शोर अपने लिए कहीं अधिक अनुकूलता प्राप्त किया है। इसके उलट भारतीय राजनयिक बेवजह सक्रिय दिख रहे थे। इस नाते चुनाव से लेकर चुनाव बाद तक की परिस्थितियों तक में यहां भारत को लेकर नकारात्मक खबरें चलती रहीं।
वैसे चुनाव से सरकार गठन तक में पैन हान संग पैन इस्लाम की महती भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता है। बिना शोर इनका पूरा जोर रहा है। जिस नाते संख्या बल में नेपाल कांग्रेस प्रथम होकर भी सरकार से बाहर है, इसके मत प्रतिशत में भी गिरावट आया है जबकि वामपंथी दलों का मत प्रतिशत ज्यों का त्यों है।
बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी का एकमुश्त वोट वाम दलों को गया है या फिर छदम प्रगतिशील पहचान के साथ बनी रास्वपा जैसी नई पार्टी को मिला है। नेपाली मूल के अप्रवासी अमेरिकी पत्रकार रवि लामे छाने की इस पार्टी को नेपाल में तेजी से बढ़ रहे मुस्लिम ईसाई समुदाय का भी भरपूर मत मिला है। अब वे नई सरकार के गृहमंत्री हैं।
इस सब के बीच उनकी नागरिकता पर सवाल है जिसकी सुनवाई अगले हफ्ते सर्वोच्च न्यायालय में होनी है।वैसे लोकतांत्रिक मूल्यों वाली नेपाली कांग्रेस का सत्ता में ना आ पाना भारत-अमेरिका जैसे उदार जनतांत्रिक देशों के साथ मधुर संबंधों के लिए अनुकूल नहीं जान पड़ रहा है। नेपाल के आर्थिक स्थिति का डांवरडोल होना महंगाई संग बैकों का खस्ता हाल भी भारत के पड़ोस में एक नई लंका को जन्म दे सकती है।
लबेरेज अर्थव्यवस्था और तेजी से मादकद्रव्यों के खेती एवं उत्पादन के नाते नेपाल पड़ोस का श्रीलंका अफगानिस्तान भी हो सकता है। ऐसे में भारत को इन स्थितियों पर भी नजर रखने और विचार करनते हुए फिलहाल नेपाल-भारत संबंध एवं हित-नाते पर गौर करने की जरूरत है।
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