एक समय था जब सार्वजनिक विमर्श कॉफी हाउसों, चौपालों, विश्वविद्यालयों के प्रांगणों और समाचार पत्रों के संपादकीय पृष्ठों के गेटकीपर संपादकों से छनकर आकार लेता था। लेकिन आज की डिजिटल दुनिया ने इस पूरी व्यवस्था को उलट दिया है। हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार अंजना ओम कश्यप की एक टिप्पणी पर ऑनलाइन शिक्षकों और कोचिंग जगत की तीखी प्रतिक्रिया ने देश के डिजिटल परिदृश्य को हिलाकर रख दिया। देखते ही देखते एक एंकर बनाम शिक्षक विवाद लाखों विद्यार्थियों, शिक्षकों और आम नागरिकों के सामूहिक स्वाभिमान का मुद्दा बन गया।
यह घटना कोई अकेला अपवाद नहीं है, बल्कि यह हमारे समय के उस नए सामाजिक-संचार तंत्र (Social Communication Ecosystem) का साक्ष्य है, जिसमें कोई एक वाक्य, कोई एक कटाक्ष या कोई एक 15-सेकंड की असंतुलित वीडियो क्लिप मिनटों में ध्रुवीकरण पैदा कर सकती है। सवाल यह नहीं है कि किसने क्या कहा, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि भारतीय समाज का एक विशाल हिस्सा अब किसी सूचना को सिर्फ सुनता नहीं है, बल्कि तत्काल डिजिटल मोर्चेबंदी में तब्दील हो जाता है। इंटरनेट अब केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं रहा, वह त्वरित संगठन निर्माण और सामूहिक आक्रोश का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है।
शिक्षा का लोकतंत्रीकरण बनाम व्यावसायिक साम्राज्य
इस विवाद की जड़ों को समझने के लिए हमें पिछले एक दशक में भारत के शैक्षणिक ढांचे में आए युगांतकारी बदलाव को देखना होगा। ऐतिहासिक रूप से, दिल्ली के मुखर्जी नगर, करोल बाग या कोटा जैसे शहरों में स्थित महंगी ऑफलाइन कोचिंग व्यवस्था निम्न-मध्यमवर्गीय और ग्रामीण परिवेश के बच्चों की पहुँच से बाहर थी।
कोविड काल का बदलाव: महामारी के संकट काल में जब देश के सभी भौतिक संस्थान बंद थे, तब यूट्यूब और विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स ने शिक्षा के नए द्वार खोले। इन डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने भारत के सुदूर कस्बों के उन लाखों विद्यार्थियों को देश की सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं की रेस में ला खड़ा किया जो महंगी फीस नहीं दे सकते थे।
इसलिए, जब किसी मुख्यधारा के मीडिया मंच से पूरे ऑनलाइन शिक्षक समुदाय को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश होती है, तो प्रतिक्रिया का हिंसक या आक्रामक होना स्वाभाविक है। यह रोष या प्रतिक्रिया केवल अपनी नौकरी अथवा रोजगार बचाने का नहीं है, बल्कि यह उस 'शैक्षणिक अस्मिता' और शिक्षा के लोकतंत्रीकरण (एजुकेशन डेमोक्रेटाइजेशन) की रक्षा का प्रयास भी है, जिसने पारंपरिक अभिजात्यवर्गीय शैक्षणिक एकाधिकार को तोड़ा है।
परीक्षा व्यवस्था का ढहता ढांचा और युवाओं का अविश्वास
लेकिन इस चमकती तस्वीर का एक स्याह और डरावना पहलू भी है, जिसे नज़रअंदाज़ करना आत्मघाती होगा। भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं का ढांचा इस समय अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रहा है। राष्ट्रीय स्तर से लेकर विभिन्न राज्यों की परीक्षाओं में लगातार हो रहे पेपर लीक, साल्वर गैंग की सक्रियता, दलालों का संगठित नेटवर्क और तकनीकी सेंधमारी ने देश के करोड़ों युवाओं के भरोसे को तोड़कर रख दिया है। युवा वर्षों तक पसीना बहाते हैं, और अंत में परीक्षा निरस्त होने की खबर आती है।
इस पृष्ठभूमि में, यदि कोई खोजी पत्रकार या विश्लेषक इस बात पर सवाल उठाता है कि क्या इस अरबों रुपये के कोचिंग उद्योग का कोई हिस्सा इस संगठित भ्रष्टाचार नेटवर्क में शामिल है, तो उस प्रश्न को पूरी तरह गलत नहीं ठहराया जा सकता। अग्निपथ योजना के विरोध के दौरान भी कुछ कोचिंग संस्थानों द्वारा युवाओं की असुरक्षा और गुस्से को भड़काने के आरोप जांच एजेंसियों ने लगाए थे। संकट तब शुरू होता है जब पत्रकारिता अपनी भाषाई मर्यादा खो देती है। जब सवाल किसी 'संस्थागत जवाबदेही' पर न होकर पूरे 'शिक्षक समुदाय' की अवमानना में बदल जाता है, तो निष्पक्ष विमर्श की जगह केवल डिजिटल युद्ध शेष रह जाता है।
डिजिटल आक्रोश का मनोविज्ञान
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो डिजिटल मंचों पर आक्रोश अब सिर्फ एक मानवीय भावना नहीं रह गया है, यह एक 'प्रदर्शन' (Performance) बन चुका है। सोशल मीडिया के इस दौर में व्यक्ति सिर्फ नाराज नहीं होता, वह अपनी नाराजगी को 'लाइक', 'शेयर', 'रीपोस्ट' और 'कमेंट' के जरिए सामाजिक स्वीकृति दिलाना चाहता है।
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक संघ (APA) के विभिन्न शोध बताते हैं कि सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म इस तरह डिज़ाइन किए गए हैं जो नकारात्मकता, गुस्से और ध्रुवीकरण वाले कंटेंट को सबसे अधिक दृश्यता (Visibility) प्रदान करते हैं। इसे जनसंचार की भाषा में 'फ्रेमिंग' (Framing) और 'एजेंडा सेटिंग' (Agenda Setting) का नया दौर कहा जाता है। पहले संपादक तय करता था कि देश क्या सोचेगा (Gatekeeping); आज इन्फ्लुएंसर्स, ट्रोल्स, ट्रेंड्स और अदृश्य एल्गोरिद्म तय करते हैं कि समाज किस मुद्दे पर चौबीसों घंटे लड़ेगा। परिणाम यह होता है कि मुद्दे का मूल संदर्भ पीछे छूट जाता है और भावनात्मक गुटबाजी जीत जाती है।