मूर्तियों से यूरोपियन्स का खास लगाव है। इसके पीछे मूर्ति पूजा का हम हिन्दुस्तानियों जैसा भक्तिभाव नहीं।
- फोटो : अमर उजाला
इतिहास के आइने में चार्ल्स ब्रिज
कहते हैं इस पुल का पहला पत्थर चार्ल्स चतुर्थ ने 9 जुलाई 1357 की सुबह 5:31 बजे रखा था। वह बोहमिया हुकूमत का पहला राजा था, जो पवित्र रोमन सम्राट बना। उसकी मां चेक की थी। पवित्र रोमन साम्राज्य के लिए ये ब्रिज की नींव रखने का समय बहुत महत्वपूर्ण था, क्योंकि वो अंकशास्त्र में तकरीबन अंधविश्वास करते थे।
अंक शास्त्र में यह संख्या 1357 9, 7 5:31 बनी। इस संख्या को डिकोट कर अंकशास्त्रियों ने गणना की थी कि इस पुल के जरिए चार्ल्स चतुर्थ अमर हो जाएंगे और दुनिया में उनका नाम कायमत तक जिन्दा रहेगा। मुझे अंकगणित पर बहुत विश्वास नहीं है लेकिन अगर देखें तो वे गलत नहीं थे। ये पुल आज भी चार्ल्स ब्रिज के नाम पर जाना जाता है और दुनिया भर से करोड़ों लोग इसे देखने आते हैं और सम्राट चार्ल्स का नाम लेते हैं। शायद इसलिए कहते हैं सम्राट अपनी सल्तनत से नहीं, आपने किए गए कामों से याद किए जाते हैं।
ब्रिज के दोनों तरफ की दीवारों पर ईसा संप्रदाय व बाइबिल की कहानियों से जुड़ी करीब तीस मूर्तियां लगी हैं। कोई पत्थर की है तो कोई मूर्ति ब्रांस जैसे ठोस धातु की। कई मूर्तियां लकड़ी की भी हैं। ये सभी मूर्तियां, कला के लिहाज से बेजोड़ हैं। मैंने पाया प्राग ही नहीं तकरीबन पूरा यूरोप मूर्तियां गढ़ने में माहिर है।
मूर्तियों से यूरोपियन्स का खास लगाव है। इसके पीछे मूर्ति पूजा का हम हिन्दुस्तानियों जैसा भक्तिभाव नहीं। लेकिन मूर्तियों के पीछे छुपी कथाएं शायद यूरोपवासियों को जीवन की प्रेरणा देती हैं।
मैं पुल पर आगे बढ़ता हूं। नीचे वॉलदावा नदी और दोनों तरफ खूबसूरत शहर में लाल छतों की इमारतें एक कतार में दिख रही हैं। सैलानी, पुल के दोनों तरफ दीवार पर लगी मूर्तियों के साथ सेल्फी खींचने में मशगूल हैं। इन्हीं में एक मूर्ति जीसस को सूली से उतारने के बाद उनके शव को गोद में लेकर बिलखती उनकी संगनी मेरी मैगालिन और उनकी मां वर्जिन मेरी की है। ये मूर्ति इतनी जीवन्त है कि आपको उदासी घेर लेगी। एक अन्य प्रतिमा युवा जीसस के साथ सेंट जोसफ की है, जो जीजस के जैविक पिता थे। इसी तरह ईसाई संप्रदाय के तमाम संतों, पादरियों और विद्वानों की मूर्तियां आपको बरबस अपनी तरफ खींच लेगी।
कहानी एक मूर्ति की
एक मूर्ति ईसा को सूली पर लटकाने की है। इस मूर्ति की कहानी दिलचस्प है। मूल प्रतिमा 1361 में लकड़ी की थी। लेकिन सौ साल के अंदर ही उसे नष्ट कर दिया गया। 17वीं सदी में लकड़ी की नई प्रतिमा बनी। वह हूबहू पुरानी प्रतिमा की नकल थी। लेकिन 1696 के यूरोप के तीस वर्षीय युद्ध में यह प्रतिमा भी क्षतिग्रस्त हो गई।
1696 में प्राग अथारिटी ने एक स्थानीय यहूदी नेता एलिस बैकोफन को ईश निंदा का दोषी करार देते हुए उस पर भारी जुर्माना लगाया और आदेश दिया कि यहूदियों से चंदा एकत्र कर वह सोने की परत वाली हिब्रू शब्दों की पट्टिका बनवाए। जिस पर हिब्रू में लिखा गया-'होली, होली होली, द लॉड्स ऑफ होस्टस'। इसे सूली पर टंगे जीसस की गर्दन के पीछे अर्ध चन्द्रकार लगाया गया। सांकेतिक रूप से यह प्राग के यहूदियों के लिए अपमान का प्रतीक था। उन यहूदियों के लिए जिन्हें जीसस को सूली पर लटकाने का जिम्मेदार माना जाता है।
जैसा कि अब तक आप समझ गए होंगे कि ये सभी मूर्ति अब उतनी प्राचीन नहीं रहीं जितना कि ये पुल है। क्योंकि वॉलदावा नदी की बाढ़, कभी अंतरिक विद्रोह तो कभी विदेशी आक्रमणों से नष्ट होती रहीं। लेकिन चेक के महान कलाकारों ने ठीक उन्हीं प्रतिमाओं की हूबहू मूर्तियां फिर से बना दीं। इनमें ज्यादातर कलाकार प्राग की प्राचीन चार्ल्स यूनिवर्सिटी के थे।
ब्रिज की एक खास बात ये भी है कि यह कई लोगों को रोजगार देता है।
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चार्ल्स ब्रिज का नजारा
इस ब्रिज पर मुझे एक और दिलचस्प नजारा दिखा। सैलानी सेंट नीपोमेखो की मूर्ति को छूते हुए फोटो खिंचवा रहे हैं। ब्रांस की ये बड़ी प्रतिमा वक्त के साथ काली पड़ गई है। लेकिन इस मूर्ति के कुछ हिस्से आज भी सोने की तरह चमक रहे हैं। वजह मूर्ति के कुछ हिस्से को रोजाना हजारों लोग छूते हैं। उनके स्पर्श से ये ब्रांस आज भी चमकदार है, सोने जैसा। यही इस प्रतिमा का असली रंग है। लोग इसे क्यों छूते हैं? उन्हें सिर्फ इतना बताया जाता है कि इस प्रतिमा का स्पर्श जीवन में सौभाग्य लाता है। बाद में मैंने एडम से पूछा तो उसने बताया कि नीपोमेखो, बोहिमिया साम्राज्य का संत माना जाता था।
दरअसल, बोहिमिया, चेक रिपब्लिक का पुराना नाम है। ये कोई चौदहवीं सदी की घटना है। कहते हैं रोमन साम्राज्ञी ने इस संत के सामने अपने किसी अपराध के लिए प्रायश्चित किया था। रोमन सम्राट को पता चला तो उसे हैरत हुई कि साम्राज्ञी ने ऐसा कौन सा अपराध किया जो उससे छुपा है।
सम्राट ने संत नोपो से जानना चाहा कि रानी ने क्या कन्फेशन किया है। ईसाई धर्म में चर्च के पादरी से ये अपेक्षा की जाती है कि वह किसी के भी कन्फेशन को मरते दम तक सार्वजनिक नहीं करेगा। संत नीपो ने साफ मना कर दिया तो सम्राट ने उनकी हत्या कर उन्हें प्राग की जनता के सामने ही उसी जगह से वॉलदावा नदी में फेंक दिया। इस घटना के बाद वॉलदावा में ऐसी बाढ़ आई कि राजा के महल समेत आधा शहर पानी में डूब गया। शहर में 'शहीद संत' का सम्मान तब से और बढ़ गया। प्राग वासी उन्हें कभी नहीं भूल पाए।
शहर में संत नीपो की कई प्रतिमाएं हैं। इस ब्रिज पर भी उनकी प्रतिमा लगी है। यह प्रतिमा पहले लकड़ी की थी, बाद में ब्रांस की नई प्रतिमा बनाई गई। प्रतिमा के निचले हिस्से में उन्हें नदी में फेंके जाने की घटना चित्रित है। यह प्रतिमा सौभाग्य की प्रतीक है।
कहते हैं इस प्रतिमा को छून लेने भर से सभी इच्छाएं पूरी होती हैं। और प्राग उसे फिर अपने पास बुलाता है। मैं दोबारा प्राग आना चाहता हूं, इसलिए मैं भी उस मूर्ति के चमकदार हिस्से को छू लेता हूं।
कहते हैं सन् 1905 तक इस पुल पर घोड़ा गाड़ी चलती थी। फिर जल्द ही इस पर ट्रामें और बसें भी चलने लगीं। लेकिन भारी ट्रैफिक से ब्रिज लगातार कमजोर होता गया। तो दूसरे विश्वयुद्ध के बाद इस पर वाहनों की आवाजाही पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई। अब ये ब्रिज केवल दुनिया भर के सैलानियों के हवाले है।
इस ब्रिज की एक खास बात ये भी है कि ये पुल गरीब कलाकारों और शहर के प्रतीक चिन्ह बेचने वालों से लेकर भिखारियों तक को रोजगार देता है। प्राग की सड़कों पर आमतौर पर भिखारी नहीं मिलेंगे। लेकिन कहीं-कहीं आपको उकडू बैठे लोग दिख जाएंगे जिनके दोनों हाथ जमीन पर एक कैप लिए होंगे।
आप उनकी और वे आपकी आंखों में नहीं देख सकते क्योंकि उनका सिर जमीन में नीचे झुका होता है। सामने कैप होती है जिसमें आप चेक क्राउन या चेक क्रोना के सिक्के डाल कर आगे बढ़ सकते हैं। मुझे लगता है कि उनकी आंख शर्म में बंद रहती होगी, क्योंकि वह भिखारी कम और जरूरतमंद ज्यादा लगते हैं।
ब्रिज पर कहीं से वायलन की दर्दनाक धुन सुनाई देती है। सामने शांत-सी खड़ी दो लड़कियां आंखें बंद कर वायलेन बजा रही हैं। उनके सामने वायलन का खाली डिब्बा, खुला रखा है, जिसमें लोग सिक्के और चेक क्रोना डाल रहे हैं। इसे इन स्ट्रीट कलाकारों का मेहनताना कहिए या इनाम। इसे भीख मांगना तो कतई नहीं कहा जा सकता।
प्राग में आपको सड़क के किनारे ऐसे कई कलाकार मिल जाएंगे। कोई ओपरा सिंगर कहीं अकेली सीढ़ियों पर बैठी ओपरा गा रही होगी। कोई चित्रकार सड़क के किनारे ही तुरंत आपका प्रोट्रेट बनाकर आपको देने के लिए उत्सुक होगा।
चार्ल्स ब्रिज म्यूजियम
वक्त की यात्रा में चार्ल्स ब्रिज कई बार टूटा कई बार फिर बना। बगैर चार्ल्स ब्रिज म्यूजियम देखे चार्ल्स ब्रिज अधूरा है। इस म्यूजिम में इस ब्रिज का पूरा इतिहास दर्ज है। वह भी तस्वीरों के साथ। जहां मूल तस्वीरें नहीं वहां रेखा चित्रों की मदद से ब्रिज की परिकल्पना को दिखाया गया है।
इस म्यूजिम में आपको तस्वीरों में पुराने शहर की मध्याकालीन झलक भी देखने को मिल जाएगी। वक्त के साथ ये ब्रिज और शहर कैसे बदलता चला गया। म्यूजिम की ये इमारत ब्रिज के किनारे ही है।
मैं ओल्ड साइड टॉवर की तरफ से इस ब्रिज पर दाखिल हुआ था और अब लैसर टाउन की तरफ आगे बढ़ रहा हूं। पुल के खत्म होते ही एक गली नुमा सड़क शुरू हो जाती है जिसके दोनों तरफ दुकाने हैं। ये दुकानों में आपको चेक संस्कृति और परम्परा की झलक दिखेगी। उसके खानपान, और उसकी जीवन शैली से जुड़ी तमाम चीजें आपको यहां मिल जाएंगे।
मसलन ब्रिज खत्म होते ही आपको एक छोटी सी दुकान पर ' trdlo' बनते दिखेंगे। प्राग के लोग इसका स्लोवाक उच्चारण 'तरदुआं' करते हैं। ये स्लोविक व्यंजन है। 'तरदुआ' देखने और खाने, दोनों में लाजवाब है। आसान शब्दों में इसे आप कोण वाली पेस्ट्री कह सकते हैं। इसका कोण शक्कर और अखरोट के क्रिस्पी पाउडर से बनता है।
ये कोण आइसक्रीम के कोन से कुछ मोटे होते हैं। क्रीम रोल जैसे। इसे लाल सलाखों में एकदम गर्म-गर्म सिकते हुए आप अपने सामने देख सकते हैं। आपका ऑर्डर होते ही वे इसमें ठंडी चॉकलेट और ढेर सारी वनीला, मैंगो या आपकी मनपसंद कोई और क्रीम साथ में ड्राई फ्रूट और रेड चेरी से सजाकर आपके सामने हाजिर कर देंगे।
प्राग में कहीं-कहीं इसमें आइसक्रीम भी भर के बेची जाती है। ये वाकई ला-जवाब है। चार्ल्स ब्रिज की सैर के बाद 'तरदुआ' का लुत्फ। दूर ब्रिज से मुझे लड़कियों के वायलन की आवाज सुनाई दे रही है। इनकी वायलन कह धुन में ढेर सारा दर्द छुपा है। वॉलदावा नदी की लहरों के साथ वायलन का ये संगीत पूरे वातावरण को और उदास बना रहा है। सोच रहा हूं दो गर्मा-गर्म 'तरदुआं' और खरीद लूं और वायलन बजाने वाली उन दोनों लड़कियों को भेंट करूं। .....शायद लड़कियों की उदासी थोड़ी कम हो जाए। हां, ये ठीक रहेगा।
रुकिए मैं अभी आया।
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