फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

हिमालय की ऊंचाइयों तक पहुंचा प्रदूषण, उत्तराखंड से एवरेस्ट तक प्रदूषण के मिले गंभीर संकेत

सार

अधिक चौंकाने वाले प्रमाण नेपाल के एवरेस्ट क्षेत्र से मिले हैं। शोधकर्ताओं को खुंबू घाटी में 2,860 से 5,364 मीटर तक किए गए माप में आठ घंटे की ओजोन सांद्रता कुछ अवसरों पर 100 पीपीबी से ऊपर मिली। एवरेस्ट के निकट 5,079 मीटर ऊंचाई पर स्थित नेपाल क्लाइमेट ऑब्जर्वेटरी-पिरामिड में मानसून-पूर्व अवधि में ओजोन का औसत 60.9 पीपीबी पाया गया।
विज्ञापन
हिमालय की ऊंचाइयों तक पहुंचा प्रदूषण (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : AI Generated
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

हिमालय को हम बर्फीली चोटियों, घने जंगलों, निर्मल नदियों और स्वच्छ हवा से जोड़कर देखते आए हैं। इसलिए महानगरों के धुएं और उद्योगों से दूर पहाड़ों की हवा को स्वाभाविक रूप से शुद्ध मान लिया जाता है। लेकिन उत्तराखंड से नेपाल के एवरेस्ट क्षेत्र तक हुए वैज्ञानिक अध्ययन इस धारणा को चुनौती दे रहे हैं कि हिमालय अब केवल जलवायु परिवर्तन की मार नहीं झेल रहा, बल्कि मैदानों से पहुंच रहे प्रदूषण और पहाड़ों के भीतर तेजी से बढ़ते वाहनों, पर्यटन, तीर्थाटन, निर्माण और जंगल की आग का दबाव भी उसकी हवा को प्रभावित कर रहा है।

विज्ञापन


इस चिंता को नया आधार गढ़वाल विश्वविद्यालय के हालिया अनुसंधान से मिला है। विश्वविद्यालय के अध्ययन में 19 दिसंबर 2025 को जमीन के निकट ओजोन की आठ घंटे की औसत सांद्रता 634.13 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर दर्ज हुई, जबकि एक घंटे का स्तर 880 माइक्रोग्राम से ऊपर चला गया। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भी ओजोन के लिए आठ घंटे का मानक 100 और एक घंटे का 180 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर निर्धारित किया है।

यह केवल एक असाधारण दिन की कहानी नहीं है। विश्वविद्यालय के 15 सितंबर 2025 से 15 सितंबर 2026 तक 339 दिनों के आंकड़ों में 26 दिन ओजोन ने आठ घंटे की सीमा पार की। इसी अवधि में पीएम 2.5 का वार्षिक औसत 73.30 और पीएम 10 का 100.48 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर रहा।
विज्ञापन


पीएम 2.5 ने 169 और पीएम 10 ने 146 दिनों में निर्धारित 24 घंटे की सीमा पार की। पृथ्वी से काफी ऊपर समतापमंडल में मौजूद ओजोन सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से जीवन की रक्षा करती है, लेकिन जमीन के आसपास बनने वाली ओजोन प्रदूषक है। यह सीधे किसी वाहन या चिमनी से नहीं निकलती। नाइट्रोजन ऑक्साइड और वाष्पशील कार्बनिक यौगिक सूर्य के प्रकाश में रासायनिक क्रिया करके इसे बनाते हैं।

इसीलिए साफ दिखाई देने वाला नीला आसमान हमेशा स्वच्छ हवा का प्रमाण नहीं होता है। गढ़वाल विश्वविद्यालय के अलावा भी दूसरे अध्ययनों को देखने पर तस्वीर व्यापक हो जाती है। नैनीताल में लगभग 1,958 मीटर की ऊंचाई पर हुए अध्ययनों में वसंत और गर्मियों में सतही ओजोन में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई। शोधकर्ताओं ने स्थानीय कारणों के साथ सिंधु-गंगा मैदान से लंबी दूरी तय कर आने वाले प्रदूषण और ऊपरी वायुमंडल से नीचे आने वाली ओजोन की भूमिका भी पाई है।

अधिक चौंकाने वाले प्रमाण नेपाल के एवरेस्ट क्षेत्र से मिले हैं। शोधकर्ताओं को खुंबू घाटी में 2,860 से 5,364 मीटर तक किए गए माप में आठ घंटे की ओजोन सांद्रता कुछ अवसरों पर 100 पीपीबी से ऊपर मिली। एवरेस्ट के निकट 5,079 मीटर ऊंचाई पर स्थित नेपाल क्लाइमेट ऑब्जर्वेटरी-पिरामिड में मानसून-पूर्व अवधि में ओजोन का औसत 60.9 पीपीबी पाया गया।

ब्लैक कार्बन और सूक्ष्म कण भी यहां पहुंचे। वैज्ञानिकों के अनुसार घाटियों में ऊपर चढ़ने वाली गर्म हवाएं प्रदूषित वायु को पांच हजार मीटर से अधिक ऊंचाई तक पहुंचा सकती हैं।

मैदानों से पहाड़ की ओर आ रहे प्रदूषण के अलावा स्वयं हिमालय में भी मानवीय दबाव अभूतपूर्व ढंग से बढ़ा है। इसका उदाहरण उत्तराखंड की चारधाम यात्रा है। इस वर्ष सितंबर के तीसरे सप्ताह तक तीर्थयात्रियों की संख्या करीब 52 लाख पहुंचने की ओर है। यात्रा नवंबर तक जारी रहेगी और मानसून की विदाई के बाद इसका दूसरा व्यस्त चरण शुरू हो चुका है।

मौजूदा रफ्तार बनी रही तो यात्रियों की संख्या 60-65 लाख के आसपास या उससे अधिक पहुंच सकती है। जबकि दो दशक पहले तक यात्रियों की यह संख्या बमुश्किल 25 लाख तक पहुंचती थी। लाखों यात्री लाखों वाहनों के जरिए उन उच्च हिमालयी घाटियों तक पहुंच रहे हैं, जिनके आसपास गंगोत्री और सतोपन्थ जैसे हिमनद क्षेत्र हैं।

उपलब्ध परिवहन आंकड़ों के अनुसार इस यात्रा सीजन में करीब साढ़े पांच लाख वाहनों की आवाजाही का पैमाना सामने आता है। सड़क यातायात के साथ डीजल-पेट्रोल का दहन, जाम और निर्माण गतिविधियां स्थानीय उत्सर्जन का दबाव बढ़ाती हैं। पहले चरण में चारधाम क्षेत्र में प्रतिदिन लगभग 400 हेलीकॉप्टर उड़ान गतिविधियां भी दर्ज की गई थीं।

यह स्थिति केवल उत्तराखंड की नहीं है। हिमाचल, लद्दाख, कश्मीर, सिक्किम, नेपाल और दूसरे हिमालयी पर्यटन क्षेत्रों में सड़क पहुंच, निजी वाहनों, होटल निर्माण और पर्यटकों की संख्या लगातार बढ़ी है। अमरनाथ यात्रा और पर्यटकों की अनियंत्रित भीड़ के कारण सिन्धु नदी घाटी की स्थिति और भी चिन्ताजनक है।

इसलिए हिमालयी वायु प्रदूषण को अब केवल “मैदानों से आया प्रदूषण” कहकर समझना अधूरा होगा। स्थानीय उत्सर्जन और दूर से आने वाला प्रदूषण मिलकर पर्वतीय वायुमंडल पर दबाव बना सकते हैं। जंगलों की आग इसमें एक और गंभीर परत जोड़ती है। हिमालय में गर्मियों और मानसून-पूर्व महीनों में बड़े वन क्षेत्र आग की चपेट में आते हैं। उनसे निकलने वाला धुआं, ब्लैक कार्बन और सूक्ष्म कण स्थानीय हवा को खराब करने के साथ ऊंची पर्वतीय घाटियों तक पहुंच सकते हैं।

सिंधु-गंगा मैदान के वाहन, उद्योग, ताप बिजलीघर, ईंट भट्टे, पराली और घरेलू ईंधन से निकले प्रदूषक सैकड़ों किलोमीटर दूर पहुंच सकते हैं। दूसरी ओर हिमालय के भीतर वाहन, पर्यटन, निर्माण, कचरा और जैव पदार्थ जलाना तथा जंगल की आग स्थानीय प्रदूषण पैदा करते हैं।

हिंदूकुश-हिमालय के आठ देशों में काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय पर्वतीय विकास केंद्र (आइसीमोड) के अनुसार इस क्षेत्र को प्रदूषण अपने भीतर के स्रोतों के साथ सिंधु-गंगा मैदान और एशिया के दूसरे हिस्सों से भी मिलता है जिसमें ब्लैक कार्बन विशेष चिंता है। जीवाश्म ईंधन और जैव पदार्थ के अधूरे दहन से निकला यह महीन काला कण सूर्य की ऊर्जा सोखता है और बर्फ या हिमनद पर जमकर उसकी प्रकाश लौटाने की क्षमता घटा सकता है, जिससे पिघलने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

ओजोन का खतरा भी फेफड़ों तक सीमित नहीं है। यह पत्तियों में प्रवेश कर प्रकाश संश्लेषण और पौधों की वृद्धि को प्रभावित कर सकती है। इस तरह हिमालयी वायु प्रदूषण मानव स्वास्थ्य के साथ जंगलों, खेती, जैव विविधता, हिमनदों और जल सुरक्षा से भी जुड़ जाता है।

फिर भी वैज्ञानिक सावधानी जरूरी है। अलग-अलग केंद्रों के अध्ययनों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरे हिमालय में प्रदूषण समान है। हिंदूकुश और कश्मीर से हिमाचल, उत्तराखंड, नेपाल, सिक्किम, भूटान और पूर्वी हिमालय तक भूगोल, मौसम और प्रदूषण स्रोत अलग हैं। समस्या यह है कि इतने विशाल पर्वतीय क्षेत्र में दीर्घकालीन निगरानी केंद्र अभी पर्याप्त नहीं हैं।

इसीलिए गढ़वाल विश्वविद्यालय से आया नया संकेत किसी एक राज्य की खबर नहीं है। पूरे हिमालय में अलग-अलग ऊंचाइयों पर दीर्घकालीन वायु गुणवत्ता केंद्र, मौसम संबंधी आंकड़े, उपग्रह प्रेक्षण और प्रदूषण स्रोतों की पहचान को जोड़ना होगा। हिमालय साझा करने वाले देशों के बीच आंकड़ों का सहयोग भी जरूरी है, क्योंकि हवा राजनीतिक सीमाएं नहीं पहचानती।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें