पिछले दिनों एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी का फर्जी वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हुआ। पहली नजर में यह वास्तविक प्रतीत हो रहा था, लेकिन उसमें किए गए दावे और उसकी भाषा संदेह पैदा करने वाले थे। विडंबना यह रही कि वीडियो के फर्जी होने के बावजूद विपक्ष के कुछ नेताओं ने इसे साझा किया। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े किसी वीडियो को बिना सत्यापन प्रसारित करना महज राजनीतिक चूक नहीं, बल्कि देश की सामरिक विश्वसनीयता, सेना के मनोबल और जनविश्वास के लिए गंभीर चुनौती है।
लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व सरकार से सवाल पूछना है। चीन की गतिविधियों, सीमाओं की सुरक्षा, सैन्य तैयारियों और सैनिकों को उपलब्ध सुविधाओं पर सवाल उठाना उसका अधिकार है। सरकार की नीतियों में कमी हो तो उसे सामने लाना भी जरूरी है, लेकिन सरकार की आलोचना और अपुष्ट सामग्री को प्रमाण की तरह प्रसारित करना दो अलग बातें हैं। पहली लोकतांत्रिक जवाबदेही का हिस्सा है, जबकि दूसरी सार्वजनिक विमर्श को गलत सूचना की गिरफ्त में ले जा सकती है।
समस्या तब गंभीर हो जाती है, जब किसी सूचना की सत्यता से अधिक उसके राजनीतिक उपयोग को महत्व मिलने लगता है। सरकार को कठघरे में खड़ा करने की जल्दबाजी में क्या यह देखना जरूरी नहीं कि वीडियो वास्तविक है या फर्जी? क्या किसी वरिष्ठ सैन्य अधिकारी के नाम से प्रसारित बयान को केवल इसलिए सच मान लिया जाए कि वह राजनीतिक आरोपों को बल देता है?
किसी गंभीर आरोप को सार्वजनिक करने से पहले मूल वीडियो, संबंधित अधिकारी का वास्तविक बयान और आधिकारिक स्पष्टीकरण देखना सामान्य सावधानी होनी चाहिए। राजनीतिक दलों के पास संसाधन, शोधकर्ता और संचार तंत्र उपलब्ध हैं। इसलिए उनसे तथ्य-जांच के मामले में अधिक जिम्मेदारी की अपेक्षा स्वाभाविक है।
भारत के खिलाफ पाकिस्तान की ओर से दुष्प्रचार की आशंकाएं नई नहीं हैं। दोनों देशों के बीच तनाव के दौरान सोशल मीडिया पर भ्रामक दावे, पुराने वीडियो और कथित सैन्य घटनाओं से जुड़ी झूठी सामग्री प्रसारित होती रही है। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों और सरकारी फैक्ट-चेक इकाइयों ने समय-समय पर ऐसी सामग्री का खंडन किया है।
डीपफेक तकनीक ने इस चुनौती को और जटिल बना दिया है। अब किसी वास्तविक सैन्य अधिकारी के चेहरे और आवाज का इस्तेमाल करके ऐसा बयान तैयार किया जा सकता है, जो उसने कभी दिया ही नहीं।
ऐसे दुष्प्रचार का उद्देश्य केवल झूठी खबर फैलाना नहीं होता। इसके जरिए सेना की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने, सरकार के प्रति अविश्वास पैदा करने और जनता के मन में देश की सैन्य स्थिति को लेकर भ्रम पैदा करने की कोशिश की जा सकती है।
यदि ऐसी सामग्री को देश के भीतर प्रभावशाली राजनीतिक आवाजों का सहारा मिल जाए, तो उसकी पहुंच और विश्वसनीयता का भ्रम दोनों बढ़ सकते हैं। विदेशी दुष्प्रचार तंत्र के लिए इससे अनुकूल स्थिति और क्या होगी कि उसके संदेश को आगे बढ़ाने के लिए घरेलू राजनीतिक मंच भी उपलब्ध हो जाए?
यहीं विपक्षी नेताओं की भूमिका पर गंभीर सवाल उठते हैं। यदि कोई नेता बिना सत्यापन ऐसी सामग्री साझा करता है, तो इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वह जानबूझकर पाकिस्तान या किसी विदेशी एजेंसी के एजेंडे पर काम कर रहा है। किसी की नीयत पर आरोप लगाने के लिए ठोस प्रमाण चाहिए। लेकिन उसकी राजनीतिक और सार्वजनिक जिम्मेदारी का मूल्यांकन जरूर किया जाना चाहिए।
क्या वीडियो साझा करने से पहले उसकी प्रामाणिकता जांची गई थी? यदि नहीं, तो क्या गलती सामने आने पर उसे स्वीकार किया गया? क्या लोगों को बताया गया कि साझा की गई सामग्री भ्रामक निकली?
प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तियों की सोशल मीडिया पर व्यापक पहुंच होती है। उनके एक संदेश को लाखों लोग देख सकते हैं, जबकि उसका खंडन शायद उतने लोगों तक कभी न पहुंचे। इसलिए किसी गलत दावे को साझा करने के बाद केवल पोस्ट हटा देना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। सार्वजनिक सुधार और स्पष्ट स्पष्टीकरण भी जरूरी हैं। राजनीतिक जवाबदेही का अर्थ केवल आरोप लगाना नहीं, बल्कि अपनी गलती सामने आने पर उसे सुधारना भी है।
पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की भूमिका को लेकर भी तथ्यों और आरोपों के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है। किसी फर्जी वीडियो का पाकिस्तान से जुड़े खातों पर प्रसारित होना और उसके निर्माण में आईएसआई का प्रत्यक्ष हाथ होना अलग-अलग दावे हैं।
इसके लिए वीडियो के मूल स्रोत, खातों के आपसी संबंधों और सामग्री के प्रसार की जांच जरूरी है। हर फर्जी वीडियो के पीछे बिना प्रमाण किसी एजेंसी का नाम जोड़ना उचित नहीं, लेकिन प्रमाण मिलने पर संगठित विदेशी दुष्प्रचार की पहचान और उसका खुलासा भी उतना ही आवश्यक है। राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर सटीकता ही विश्वसनीयता का आधार है।
डीपफेक का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि वह आंखों देखी पर भरोसा करने की हमारी आदत को चुनौती देता है। किसी वीडियो में चेहरा वास्तविक हो सकता है, लेकिन आवाज कृत्रिम; फुटेज असली हो सकता है, लेकिन उसके साथ जोड़ा गया संदेश झूठा। ऐसी तकनीक का इस्तेमाल करके किसी अधिकारी के नाम से ऐसे बयान प्रसारित किए जा सकते हैं, जो उसने कभी दिए ही नहीं। इसलिए अब किसी वीडियो को देखकर ही उसकी सत्यता तय करना जोखिम भरा है।
सैन्य मामलों में इसका प्रभाव विशेष रूप से गंभीर हो सकता है। सैनिकों के मनोबल पर सवाल उठाने, सीमाओं की स्थिति को लेकर भ्रम पैदा करने और भारत की सामरिक क्षमता के बारे में गलत धारणा बनाने के लिए ऐसी सामग्री का इस्तेमाल किया जा सकता है।
संकट के समय भ्रामक सूचना जनता में अनावश्यक आक्रोश पैदा कर सकती है और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है। इससे भी बड़ी चिंता यह है कि लगातार फर्जी वीडियो सामने आने पर लोग वास्तविक सूचनाओं पर भी संदेह करने लगते हैं। इस तरह दुष्प्रचार केवल झूठ नहीं फैलाता, बल्कि सच को पहचानने की क्षमता को भी कमजोर करता है।
इस चुनौती से निपटने के लिए राजनीतिक दलों को अपने सोशल मीडिया तंत्र में तथ्य-जांच की स्पष्ट व्यवस्था बनानी चाहिए। सेना, सीमा या रक्षा मामलों से जुड़ी किसी सामग्री को साझा करने से पहले उसका मूल स्रोत, आधिकारिक बयान और विश्वसनीय जांच रिपोर्ट देखी जानी चाहिए। मीडिया संस्थानों को भी सनसनी से अधिक सत्यापन को प्राथमिकता देनी होगी। नागरिकों को भी किसी वीडियो को केवल इसलिए आगे नहीं बढ़ाना चाहिए कि वह उनकी राजनीतिक धारणा के अनुकूल है।
यह मामला केवल एक वीडियो या किसी एक राजनीतिक नेता तक सीमित नहीं है। यह उस राजनीतिक संस्कृति की परीक्षा है, जिसमें कई बार सूचना की सत्यता से पहले उसकी सनसनी और राजनीतिक उपयोगिता देखी जाती है। भारत के खिलाफ कोई विदेशी दुष्प्रचार अभियान चल रहा हो, तो उसका प्रभाव तब बढ़ सकता है, जब देश के भीतर उसकी सामग्री बिना पर्याप्त जांच के प्रसारित होने लगे। इस खतरे को समझना सभी राजनीतिक दलों और नागरिकों का साझा दायित्व है।
विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना है, लेकिन सवालों की विश्वसनीयता तथ्यों से बनती है, फर्जी वीडियो से नहीं। राष्ट्रीय सुरक्षा न तो सत्ता पक्ष की राजनीतिक संपत्ति है और न विपक्ष के लिए आरोप लगाने का सुविधाजनक विषय। यह पूरे देश का साझा हित है। राजनीतिक मतभेद अपनी जगह रह सकते हैं, लेकिन सेना की प्रतिष्ठा, देश की सामरिक विश्वसनीयता और नागरिकों के विश्वास को तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए दांव पर लगाने से सभी दलों को बचना चाहिए।
डीपफेक के इस दौर में चुनौती केवल झूठ को पहचानने की नहीं, बल्कि राजनीतिक सुविधा के कारण उसे सच मान लेने से बचने की भी है। सूचना के मोर्चे पर भारत की सुरक्षा इस बात पर निर्भर करती है कि हम किसी संदेश को कितनी तेजी से साझा करते हैं, उससे कहीं अधिक इस बात पर कि उसे साझा करने से पहले कितनी गंभीरता से उसकी सत्यता जांचते हैं।
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