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देव की डायरी: यह छेदों का स्वर्णकाल है, जो जितना छिद्रयुक्त है वह उतना बड़ा भविष्यदृष्टा है..!

सार

अब तक हम केवल थाली में छेद, व्यवस्था में छेद और जेब में छेद के अभ्यस्त थे। पर विकास और बाजार की महिमा देखिए, अब हम गर्व से कह सकते हैं कि हमारे पास 'ईंटों में भी तीन छेद' हैं। इन तीन छेदों वाली ईंटें से घर 'डबल मजबूत' हो रहे हैं। 
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ईंटों में भी तीन छेद - फोटो : Amarujala.com/AI
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विस्तार
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पहले छेद बदनामी की चीज हुआ करते थे। किसी व्यवस्था में छेद हो तो जांच बैठती थी। जेब में छेद हो तो आदमी परेशान रहता था। छत में छेद हो तो बरसात में बाल्टी रखनी पड़ती थी। लेकिन समय बदल गया है। अब छेद प्रगति का प्रतीक है। बाजार में तीन छेद वाली ईंटें खूब बिक रही हैं। इंजीनियर कह रहे हैं कि इनसे घर ज्यादा मजबूत बनते हैं।

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अपने देश में उल्लास की ऊंचाई को दर्शन की गहराई से जोड़कर देखने वाले लोग सदियों से कह रहे हैं, “शून्य में ही सब कुछ समाया है!” अब बाजार भी यही कह रहा है। हम हमेशा से सत्य की खोज में लगे रहे, पर अंततः हमें जो मिला, वह है छेद,  जिसे दार्शनिक भाषा में हम और आप शून्य ही कहते हैं।

अब तक हम केवल थाली में छेद, व्यवस्था में छेद और जेब में छेद के अभ्यस्त थे। पर विकास और बाजार की महिमा देखिए, अब हम गर्व से कह सकते हैं कि हमारे पास 'ईंटों में भी तीन छेद' हैं। इन तीन छेदों वाली ईंटें से घर 'डबल मजबूत' हो रहे हैं। यानी पहले जिस मजबूती के लिए ठोस इरादों और भारी-भरकम ईंटों की जरूरत होती थी, अब वह काम 'खालीपन' कर रहा है। दर्शनशास्त्र सही ही कहता है कि शून्य में ही सब कुछ समाया है।
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मैंने खबर सुनी तो लगा ईश्वर ने आखिरकार मध्यमवर्ग की पुकार सुन ली। अब तक हम अपनी बनियान के छेदों और किस्मत के छेदों को छुपाने में ही जीवन खपा रहे थे, पर अब छेद होना ही 'मजबूती' की गारंटी है।

मैं एक ठेकेदार के पास गया। तीन छेद वाली ईंटों को गौर से देखा। उन तीन छेदों को देखकर मुझे लगा,  जैसे ये हमारे जीवन के तीन बुनियादी संकटों के प्रतीक हों। रोटी, कपड़ा और मकान। इन तीनों में पहले से ही इतने छेद हैं कि इनके आर-पार पूरी व्यवस्था को बिना किसी बाधा के देखा जा सकता है।

ठेकेदार ने बताया कि ये ईंटें आम ईंटों से पंद्रह प्रतिशत हल्की हैं। मुझे तो लगता है कि इन्हें और हल्का होना चाहिए। जब हमारी थाली हल्की हो चुकी है, बैंक अकाउंट हल्का हो चुका है और हमारा नागरिक बोध भी हर चुनाव के बाद हल्का हो जाता है, तो फिर हमारी दीवारें भारी होकर क्या करेंगी?  लोग इन छिद्रयुक्त ईंटों से 'डबल मजबूत' घर बनवा रहे हैं। मुझे डर है कि कहीं आने वाले समय में चलन और समझदारी की परिभाषा भी न बदल जाए। कल को कोई लड़की वाला लड़के के पिता से कहेगा, "लड़का तो ठीक है, पर इसके चरित्र में कोई छेद है कि नहीं? सुना है, आजकल बिना छेद वाले लड़के जिंदगी में आगे नहीं बढ़ पाते हैं!"

इसपर  मैंने आज अपने गांव के गुजरी गुरु से लंबी चर्चा की।  उनका आयुर्वेदिक ज्ञान उबाल मारने लगा। उन्होंने इस पर एक वैद्यराज की तरह टिप्पणी की, " चिंता की कोई बात नहीं। यह आयुर्वेद के सिद्धांत का ही व्यावहारिक रूप है।

ईंटों में छेद का 'वात' कनेक्शन
ईंटों का यह छिद्रयुक्त होना वास्तव में 'वात' विकार को नियंत्रित करने की विधा है। विशेषज्ञ तो कह ही रहेे हैं कि इन छेदों में हवा भर जाती है, जिससे गर्मियों में घर ठंडा रहता है। हमारे देश के दफ्तरों में भी तो यही नियम लागू है। वहां भी हर योजना के भीतर इतनी हवा भरी होती है कि जनता गर्मी से चाहे मरे या जिए, बड़े बाबू का कमरा हमेशा 'कूल' रहता है। "

गुजरी गुरु की बातों से मुझे कुछ तसल्ली हुई। लेकिन त्रि-छिद्र ईंट पर मेरा मनन नहीं रुका। एक और कमाल की बात इंजीनियर बता रहे हैं कि सीमेंट का मसाला इन छेदों के भीतर तक घुस जाता है, जिससे भूकंप-रोधी ढांचा तैयार होता है। अद्भुत ! हमारे समाज में भी तो यही होता है। जब तक कोई व्यक्ति आपके निजी जीवन के 'छेदों' में यानी आपकी कमजोरियों में अपनी नाक न घुसा दे, तब तक सामाजिक रिश्ते मजबूत कहां होते हैं?

पड़ोसी का असली सुख इसी में है कि वह आपके घर के सुराखों से झांक सके। अब तो खुद ईंटें पड़ोसियों को न्योता दे रही हैं कि “आओ और हमारे खालीपन को भरो। ”

दूसरा लाभ यह बताया गया कि मसाला छेदों के भीतर तक चला जाता है और पकड़ मजबूत हो जाती है। यह बात भी हमारी राष्ट्रीय संस्कृति से मेल खाती है। यहां भी जहां-जहां छेद मिलता है, वहां-वहां कोई न कोई मसाला पहुंच ही जाता है। फिर वह राजनीतिक मसाला हो, प्रशासनिक मसाला हो या चुनावी मसाला। पकड़ इतनी मजबूत हो जाती है कि पीढ़ियां गुजर जाती हैं और संबंध नहीं टूटते।

इस देश में हर चीज का वजन बढ़ रहा है। पेट्रोल के दाम का, बच्चों के स्कूल बैग का और जीएसटी  की लिस्ट का। ऐसे में अगर कोई चीज स्वेच्छा से अपनी मर्जी से हल्की हो रही है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। जो हवा कल तक नेताओं के भाषणों और सरकारी वादों में भरी होती थी, अब वह सीधे आपके बेडरूम की दीवारों में निवास करेगी। जब बाहर चिलचिलाती धूप होगी, तब आप अपनी खोखली ईंटों की तरफ देखकर मुस्कुरा सकते हैं कि बाहर भले ही महंगाई की आग लगी हो, पर हमारी दीवारों के छेद में ठंडी हवा का 'बजट' सुरक्षित है।

खैर, जब से मैंने यह समाचार सुना है, खुश हूं। अब मैं अपने जीवन के सभी छेदों को नए सम्मान से देख रहा हूं। जेब का छेद, बजट का छेद, छत का छेद, यहां तक कि अपनी याददाश्त के छेद को भी। मैंने जीवन में कभी नहीं सोचा था कि एक दिन छेद का भी इतना सम्मान होगा।

छिद्रान्वेषण- जीवन का नया उद्देश्य
बचपन से हमें यही सिखाया गया था कि जहां छेद दिखे, उसे भर दो। बाल्टी में छेद हो तो पानी भाग जाता है। जेब में छेद हो तो पैसा भाग जाता है। छत में छेद हो तो बरसात का  पानी भीतर आ जाता है। लेकिन अब पता चला है कि असली समझदार लोग तो छेद बनाते हैं।

अब जब भी कोई मुझसे पूछेगा कि "भाई साहब, आपके जीवन का उद्देश्य क्या रह गया है?" तो मैं बिना झिझक कह सकूंगा, " छिद्रान्वेषण! क्योंकि यह नया जमाना गवाह है कि मजबूती सिर्फ और सिर्फ छेद से ही आती है। "

अब मुझे लगता है कि भविष्य में केवल ईंटों में ही नहीं, हर चीज में छेद अनिवार्य कर दिए जाएंगे। स्कूलों में पढ़ाई के लिए छेद, अस्पतालों में इलाज के लिए छेद, सड़कों पर आवागमन के लिए छेद और बजट में विकास के लिए छेद। फिर विशेषज्ञ आएंगे और बताएंगे कि छेद दरअसल कमजोरी नहीं, आधुनिकता का प्रतीक है।

लोग अपने घरों के बाहर गर्व से लिखवाएंगे, "इस आशियाने का निर्माण आधुनिक त्रि-छिद्र तकनीक से हुआ है।" और शायद एक दिन ऐसा भी आए जब कोई व्यक्ति बिना किसी छेद के दिखाई दे तो लोग उसे पुराना मॉडल मान लें। 

इसलिए याद रखें, यह छेदों का स्वर्णकाल है। जो जितना छिद्रयुक्त है, वह उतना ही आधुनिक, वैज्ञानिक और भविष्यदर्शी है। बाकी मजबूत तो हम पहले से ही हैं।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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