भारतीय राजनीति की विडंबना और राजनीतिक नेताओं की कमजोरी हमेशा खेलबाजों के हाथ की कठपुतली बन जाती है। विजय माल्या जी फिलहाल इसका भरपूर लुत्फ उठा रहे हैं। ढाई साल से भगोड़े की जिंदगी जी रहे विजय माल्या की हाल में उम्मीदों को नया पंख लग चुका है। ऐशो-आराम की लत के मालिक माल्या ने देश में रखकर सिस्टम का भरपूर लाभ लिया। शानदार अय्याशी से भरा कलेंडर, बेटे के जन्मदिन पर किंगफिशर एयरलाइंस का गिफ्ट, संसद सदस्यों को शानदार केस में नायाब तरह का लिक्विड का तोहफा, बिजनेस क्लास के टिकट सब उनके नामदार होते जाने के लिए अपनाए गए नमूने रहे। इसी की बिनाह पर वह लोन पर लोन, दर लोन लेकर घी पीते रहे। अब माल्या की लुक आऊट नोटिस का चिट्ठा खुल रहा है। लंदन की अदालत में भारतीय बैंक और राजनेताओं की कारस्तानी खुल रही है। दिल्ली में हमने ही नहीं तुमने भी मदद का खेल खुल रहा है। रायसीना हिल्स का यह तापमान देखकर माल्या के देश में पैरोकारों को अब सब कुछ उम्मीद के अनुसार लग रहा है। वहीं ऐजेंसी के अधिकारियों के होठ सिले हुए हैं। शानदार चुप्पी छाई है। कुछ नया अवसर पाने के खेल में व्यस्त हैं और कुछ आगे की राह बना रहे हैं। मानना यही है कि 2019 के प्रस्तावित लोकसभा चुनाव से पहले माल्या के भारत आने की फिलहाल संभावना बस चर्चा के बराबर है।
फूट डालो, राज करो
अंग्रेज इस कूटनीति को पहले सिखा गए हैं। उनके जाने के बाद भारतीय राजनीति से लेकर हर स्तर पर इसका अच्छा खासा प्रयोग हुआ। भाजपा के मौजूदा रणनीतिकारों की टीम भी इसे करीब से समझ रही है। समझ ही नहीं रही है, बल्कि महसूस भी कर रही है। बताते हैं इसी रणनीति से समाजवादी पार्टी कुनबे का कबाड़ा कर दिया। लोगों को तब यह बात तेजी से समझ में आई, जब प्रधानमंत्री जी ने खुद अपने एक कार्यक्रम में अमर सिंह का नाम ले लिया। नाम लिए जाने के बाद से ही अमर सिंह हरकत में आ गए। भाजपा को उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक तौर पर लोगों की कुंडली मिलाने वाला सूत्रधार मिल गया है। इतना ही नहीं अब तो शिवपाल सिंह यादव की नई पार्टी बन गई है। यह पार्टी बनते ही अखिलेश यादव का महागठबंधन की बारगेन संभावना में वजन भी कम होने लगा है। रालोद के चौधरी अजीत सिंह थोड़ा अश्वस्त जरूर चल रहे हैं, लेकिन राजनीति की बिसात पर बिछ रहे सभी मोहरों को समझ रहे हैं। इस गाड़ी का यही आखिरी रेलवे स्टेशन तो है नहीं। अभी हाल में भीम आर्मी के चंद्रशेखर रावण छूट गए हैं। बसपा की मायावती आने वाले पैंतरे को बखूबी समझ रही हैं। तेलंगाना में चंद्र शेखर राव और केटीआर, आंध्र प्रदेश में चंद्र बाबू नायडू, जगन मोहन रेड्डी, ओड़ीसा में नवीन पटनायक, तमिलनाडु में ओपीएसईपीएस, डीमके के अलागिरी सच पूछिए तो संभावनाएं अपार हैं। महागठबंधन की कोशिश भी चल रही है, लेकिन नया प्रयोग भी तरीके से अपना काम कर रहा है।
वसुंधरा जी समझिए
राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को रेगिस्तान के जहाज ऊंट की सही ऊंचाई थोड़ा समझ में आने लगी है। दिन में गरम और शाम होते ही ठंडी तासीर वाले जयपुर समेत आधे राजस्थान के मिजाज को भाजपा अध्यक्ष धीरे-धीरे बताने में कामयाब होते नजर आ रहे हैं। राजस्थान में एंटी वसुंधरा वेव है, लेकिन इसकी तुलना में एंटी मोदी वेव नहीं है। वसुंधरा के पार्टी में विरोधियों की कमी नहीं है, लेकिन सब मोदी -शाह की भाजपा के नीचे उम्मीद के साथ ठंडक महसूस कर रहे हैं। ऐसे में शाह यह समझाने में सफल हो रहे हैं कि पहले सत्ता में आओ। मिलकर आओ। सत्ता में रहने पर ही कुछ हो सकेगा, होमगार्ड भी सैल्यूट मारेगा। यह प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे और टीम वसुंधरा की मेहनत से ही संभव है। बताते हैं राख के नीचे तो आग लंबे समय तक जिंदा रहती है। भाजपा का वसुंधरा विरोधी खेमा इसे बखूबी समझ रहा है। वसुंधरा जी को भी पता है। इसलिए आगे की लाइन तय करने के लिए वसुंधरा का रह-रहकर विरोध भी जरूरी है। मानवेन्द्र सिंह और उनकी पत्नी, घनश्याम तिवाड़ी का कुनबा, भैरो सिंह शेखावत की लिगेसी उठाने वाले लोग, लोकेन्द्र सिंह कलवी जैसे शख्स, गजेन्द्र सिंह शेखावत, अर्जुन राम मेघवाल....ओम माथुर...यह सूची भी कोई छोटी सी तो है नहीं।