फास्ट ट्रैक कोर्ट का मतलब त्वरित प्रक्रिया से है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि न्याय की गुणवत्ता से समझौता किया जाए। अदालतों में लंबित मामलों की भरमार है। अक्सर देखा गया है कि जनता की तीव्र भावना को शांत करने के लिए त्वरित फैसले लिए जाते हैं, लेकिन बाद में उच्च न्यायालयों में वे टिक नहीं पाते।
साल 2000 से अब तक रिपोर्टिंग के दौरान नाबालिगों के साथ बलात्कार की अनगिनत दिल दहला देने वाली घटनाएं सामने आई हैं। दुधमुंही बच्चियों से लेकर किशोरियों तक, यौन हिंसा, हत्या और ब्लैकमेलिंग जैसे जघन्य अपराधों ने समाज को बार-बार झकझोरा है। इन अपराधों पर लगाम लगाने के लिए 2012 में ‘पॉक्सो एक्ट’ (POCSO Act) अस्तित्व में आया, जो बच्चों के यौन शोषण के मामलों में त्वरित न्याय देने के उद्देश्य से लाया गया था।
फास्ट ट्रैक कोर्ट का मतलब त्वरित प्रक्रिया से है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि न्याय की गुणवत्ता से समझौता किया जाए। अदालतों में लंबित मामलों की भरमार है। अक्सर देखा गया है कि जनता की तीव्र भावना को शांत करने के लिए त्वरित फैसले लिए जाते हैं, लेकिन बाद में उच्च न्यायालयों में वे टिक नहीं पाते।
भारतीय न्याय प्रणाली की मूल भावना यह है कि "दोषी भले छूट जाए, लेकिन निर्दोष को सजा न मिले।"
यही कारण है कि आरोपी के पास जिला कोर्ट के बाद हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार होता है। ऐसे में ‘त्वरित न्याय’ अक्सर सिर्फ एक परिभाषा बनकर रह जाता है- वास्तविकता नहीं।
पॉक्सो अधिनियम भारत के सबसे संवेदनशील और आवश्यक कानूनों में से एक है, लेकिन यदि इसका क्रियान्वयन धीमा, ढीला और असंगठित हो, तो यह बच्चों के साथ अन्याय ही कहलाएगा। मध्यप्रदेश में फास्ट ट्रैक कोर्ट में पॉक्सो मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है, लेकिन उनका निपटारा वर्षों तक लटकता है। यह राज्य की न्याय प्रणाली की एक गंभीर चुनौती है।
आज जरूरत है कि सरकार, न्यायपालिका, समाज और मीडिया- सभी एक साथ मिलकर यह सुनिश्चित करें कि "बचपन की रक्षा सिर्फ कानून से नहीं, बल्कि समय पर न्याय से होती है।"
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