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शपथ समारोह के लिए मोदी की अचूक रणनीति, विदेशनीति के मोर्चे पर चला अब तक का सबसे अलग दांव

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इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथग्रहण समारोह में बिम्सटेक के सदस्य देश आएंगे। - फोटो : अमर उजाला
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इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथग्रहण समारोह में बिम्सटेक के सदस्य देश आएंगे। पिछली बार प्रधानमंत्री ने सार्क देशों के नेताओं को अपने शपथग्रहण समारोह में बुलाया था। इस बार मोदी के शपथग्रहण समारोह में भाग लेने के लिए बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को तो आमंत्रण भेजा गया है, पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान इस बार आमंत्रण से वंचित है। 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री शपथ ली थी तो उस समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ आए थे। लेकिन इस बार शपथग्रहण समारोह में विदेशी मेहमानों के आमंत्रण को लेकर गहन चिंतन किया गया।

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क्या खास है मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में 
इस बार आमंत्रण को लेकर साउथ एशिया और पूर्वी एशिया की कुटनीति का खासा ख्याल रखा गया है। समुद्री नौवहन पर कब्जे को लेकर चल रही आपाधापी के बीच भारत ने इस बार बिम्सटेक के सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया है, क्योंकि बिम्सटेक के सदस्य देश पूर्वी एशिया और भारत के बीच सहयोग के पुल बन रहे है।

हालांकि भारत ने मध्य एशिया की कूटनीति पर खासा ख्याल रखा है, इसलिए शंघाई सहयोग संगठन के इस साल के मेजबान देश किर्गिस्तान को भी शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया गया है। पाकिस्तान से खराब संबंध भारत के लिए मध्य एशिया के इस्लामिक देशों को महत्वपूर्ण बनाता है।  
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बिम्सटेक का महत्व बढ़ा, सार्क गायब
प्रधानमंत्री के शपथग्रहण में पिछली बार सार्क के सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष आमंत्रित थे। इस बार सार्क  गायब है। हालांकि सार्क के कई सदस्य देश बिम्सटेक के बैनर तले आमंत्रित किए गए हैं। लेकिन सार्क में पाकिस्तान की सदस्यता ने सार्क के महत्व को खासा घटा दिया है। सार्क के कई सदस्य देशों को पाकिस्तान के आतंक समर्थक अड़ियल रवैये के कारण खासी परेशानी झेलनी पड़ी है। इससे सार्क का महत्व भी घटा है। वैसे में सार्क का विकल्प बिम्सटेक (बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी सेक्टरल टेक्निकल एंड इकनॉमिक को ऑपरेशन) बना है।

बंगाल की खाड़ी के आसपास के देश बिम्सटेक के सदस्य देश हैं, जिसमें थाईलैंड, म्यांमार, श्रीलंका, नेपाल और भूटान और भारत शामिल है। बिम्सटेक का महत्व इसलिए है कि बंगाल की खाड़ी विश्व नौवहन का एक प्रमुख रास्ता है, जो दक्षिण चीन सागर को अरब सागर और फारस की खाड़ी से जोड़ता है। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य तमाम महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आपसी सहयोग को बढ़ाना है। इसमें ऊर्जा, खेती, पर्यटन, स्वास्थ्य, गरीबी हटाओ, तकनीक, मछलीपालन आदि शामिल हैं। 
 

विश्व की 22 प्रतिशत आबादी बंगाल की खाड़ी के इलाके में पड़ने वाले 7 देशों में रहती है। - फोटो : PTI
मोदी के लिए महत्वपूर्ण है बिम्सटेक 
बंगाल की खाड़ी विश्व की बड़ी खाड़ी है। विश्व की 22 प्रतिशत आबादी बंगाल की खाड़ी के इलाके में पड़ने वाले 7 देशों में रहती है। इन देशों का कुल जीडीपी 2.7 ट्रिलियन डॉलर है। इन 7 देशों की खासियत यह है कि तमाम आर्थिक मंदी के बीच भी इनका आर्थिक विकास दर 3.5 प्रतिशत से लेकर 7.5 प्रतिशत के बीच रहा है। भारत के लिए ये देश इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इस इलाके में अपार प्राकृतिक संसाधन हैं। इन संसाधनों का दोहन अभी तक सही तरीके से नहीं हुआ है। लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण भारत के लिए यह है कि इसके सदस्य देशों के तटीय इलाके से दुनिया का बड़ा समुद्री व्यापार होता है।

इन देशों के पास अपार प्राकृतिक संसाधन है। इनकी भौगोलिक स्थिति महत्वपूर्ण है। इनके भूगोल को देखते हुए चीन बिम्सटेक के सदस्य देशों में भारी निवेश कर रहा है। भारत के लिए बिम्सटेक के सदस्य देश इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि भारत का पूर्वी एशिया में पहुंचने के द्वार ये सदस्य देश है।

बिम्सटेक के सदस्य देश क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग के ब्रिज बन चुके हैं। बिम्सटेक साउथ और साउथ ईस्ट एशिया को जोड़ता है। भारत के लिए बिमस्टेक इसलिए महत्वपूर्ण है कि मल्क्का जलडमरूमध्य के रास्ते बंगाल की खाड़ी तक चीन अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। इन इलाकों में चीन भारी निवेश कर रहा है। यही नहीं बेल्ट एंड रोड पहल के तहत चीन बिम्सटेक के सदस्य देशों में भारी निवेश कर चुका है।
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भारत की नजर सिर्फ पूर्वी एशिया पर नहीं है। भारत के लिए महत्पूर्ण मध्य एशिया भी है। - फोटो : PTI
किर्गिस्तान का महत्व
पर भारत की नजर सिर्फ पूर्वी एशिया पर नहीं है। भारत के लिए महत्पूर्ण मध्य एशिया भी है। मध्य एशिया में भारत भविष्य के भारतीय हितों को देख रहा है। मध्य एशिया तक भारत को पहुंचने का मुख्य प्लेटफॉर्म शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) है। इस बार शंघाई सहयोग संगठन का मेजबान देश किर्गिस्तान है। अगले महीने ही किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में एससीओ की बैठक होनी है। किर्गिस्तान बेशक मध्य एशिया का एक गरीब देश है, पर यह पुराने सिल्क रूट का महत्वपूर्ण रास्ता रहा है।

इस रूट का महत्व आज भी है। भारत सदस्य देश होने के नाते अगले महीने किर्गिस्तान में होने वाली शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में भाग लेगा। एससीओ के पीछे रूस और चीन जैसे देश है। मध्य एशिया तक भारत की पहुंच में मुख्य बाधा भौगोलिक रूप से पाकिस्तान है। वैसे में भारत मध्य एशिया के दूसरे देशों से संबंध प्रगाढ़ कर रहा है।

किर्गिस्तान के राष्ट्राध्यक्ष को शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित करने का साफ संकेत यही है कि भारत जितनी गंभीरता से पूर्वी एशिया को ले रहा है, उतनी ही गंभीरता से मध्य एशिया को ले रहा है। मध्य एशिया के देश उर्जा के बड़े स्रोत है। जबकि भारत को उर्जा की खासी जरूरत है। इन देशों का भूगोल कमाल का है। मध्य एशिया के देश साउथ एशिया को यूरोप से जोड़ते है। 

शपथग्रहण से पाकिस्तान आउट?
पिछली बार नरेंद्र मोदी के शपथग्रहण में तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पहुंचे थे। उस समय मोदी ने सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया था। इस बार भारत ने पाकिस्तान को आमंत्रण नहीं भेजा है। इसके पीछे भारत की अपनी मजबूरी है। चुनावों से पहले पाकिस्तान समर्थित आतंकियों के हमले में पुलवामा में सीआरपीएफ के जवान शहीद हो गए।

भारत ने जवाबी कार्रवाई की। पाकिस्तान के बालाकोट स्थित जैश-ए-मोहम्मद के ट्रेनिंग सेंटर पर हवाई हमला भारतीय वायुसेना ने किया। भारत में लोकसभा चुनावों के दौरान पाकिस्तान मुख्य मुद्दा था। भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध अभी सामान्य नहीं है, इसलिए शपथ ग्रहण से पाकिस्तान को आउट किया गया है। हालांकि दोनों देशों के बीच बातचीत शुरू होने के संकेत हैं।

किर्गिस्तान में शंघाई सहयोग संगठन के विदेश मंत्रियों की बैठक में भारतीय विदेश मंत्री सुष्मा स्वराज और पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी आसपास ही बैठे। हालांकि दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई, लेकिन दोनों ने एक दूसरे को अभिवादन जरूर किया। वैसे में अगले महीनें बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में मोदी और इमरान खान की बीच बैठक की उम्मीद की जा रही है।      

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
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