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स्मृति शेष: पीयूष पांडे गए नहीं हैं, हर “जुड़ गया तो छूटेगा नहीं” में बस गए हैं

सार

पीयूष पांडे के प्रति लोगों का जुनून कुछ ऐसा था कि उनके विज्ञापन जैसे ही स्क्रीन पर चलते, हॉल तालियों से गूंज उठता। उन्होंने उस दिन क्रिएटिविटी और भारतीयता पर लंबा वक्तव्य दिया।
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पीयूष पांडे - फोटो : amarujala.com
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विस्तार
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वर्ष 1998 की बात है। उन दिनों मैं इंदौर के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में बैचलर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन का छात्र था। शहर के एक बड़े समाचार समूह ने साप्ताहिक उत्सव का आयोजन किया था। उसी उत्सव के एक दिन का आकर्षण था- पीयूष पांडे का शो।

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तब तक मुझे पीयूष पांडे के विषय में बहुत अधिक जानकारी नहीं थी। वैसे भी उस समय गूगल नहीं था। उनके विषय में जो जाना, वह अपने साथियों और हमारे शिक्षक प्रेमजीत सिंह से बातचीत के माध्यम से जाना। इंदौर के एक बड़े ऑडिटोरियम में उनका व्याख्यान था। जब हम वहां पहुंचे तो भीड़ देखकर चौंक गए।

बामुश्किल ऑडिटोरियम में प्रवेश मिला। जितने लोग भीतर थे, उससे अधिक लोग बाहर खड़े थे। बाहर बड़े-बड़े स्क्रीन लगाए गए थे, जबकि उस दौर में ऐसी स्क्रीन आम बात नहीं थी। हम छात्रों को ऑडिटोरियम के फर्श पर बैठने की जगह मिली।
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पीयूष पांडे के प्रति लोगों का जुनून कुछ ऐसा था कि उनके विज्ञापन जैसे ही स्क्रीन पर चलते, हॉल तालियों से गूंज उठता। उन्होंने उस दिन क्रिएटिविटी और भारतीयता पर लंबा वक्तव्य दिया। वो केवल विज्ञापन की बात नहीं कर रहे थे, बल्कि कहानियों, संवेदनाओं और समाज की बात कर रहे थे।

उस समय तक भी पीयूष पांडे स्टार बन चुके थे, मात्र 15–16 वर्षों के एडवरटाइजिंग करियर में उन्होंने जो ऊंचाई हासिल की, वह असाधारण थी।

भारत में टेलीविजन की शुरुआत 1959 में हुई थी, तब 15 सितंबर को दिल्ली में यूनेस्को और अमेरिका की फोर्ड फाउंडेशन की मदद से एक छोटा-सा प्रयोगात्मक केंद्र स्थापित हुआ था। तब टेलीविजन का उद्देश्य केवल शिक्षा और सूचना देना था, न मनोरंजन, न विज्ञापन।

1 जनवरी 1976 को पहली बार भारत सरकार ने विज्ञापन एजेंसियों को प्रसारण की अनुमति दी, लेकिन असली बदलाव वर्ष 1982 में आया, जब रंगीन टेलीविजन और एशियाई खेल, दोनों भारत में पहुंचे।

रंगीन प्रसारण ने न केवल टेलीविजन, बल्कि विज्ञापनों को भी रंगीन बना दिया। यही वह दौर था, जब पीयूष पांडे ने बंबई (अब मुंबई) में विज्ञापन की दुनिया में कदम रखा।

1980–90 के दशक में भारतीय विज्ञापन विदेशी शैली की नकल होते थे। मॉडल गोरे, संवाद अंग्रेजी में और भावनाएं नकली। ऐसे में पीयूष पांडे ने यह रुझान तोड़ा। उन्होंने कहा था, “विज्ञापन वही बोले जो भारत बोले।” उन्होंने हिंदी की मिठास, लोकगीतों की आत्मा, देसी मुहावरों की गर्माहट और आम आदमी के अनुभवों को विज्ञापनों में उतारा।

उन्होंने विज्ञापन को बिक्री का माध्यम नहीं, बल्कि संवाद का माध्यम बना दिया। उनके कुछ यादगार अभियान आज भी लोगों की जुबान पर हैं, फेविकोल : “जुड़ गया तो छूटेगा नहीं”,  एशियन पेंट्स : “हर घर कुछ कहता है”, कैडबरी : “कुछ खास है ज़िंदगी में”। 

पीयूष पांडे ने भारतीय विज्ञापन को वह आत्मा दी, जिससे वह सिर्फ एक बाजार की भाषा न रहकर, भारतीय जनमानस की अभिव्यक्ति बन गया।

इस वर्ष की शुरुआत में मुझे प्रयागराज के महाकुंभ में चार महीने रहने का अवसर मिला। वहीं एक मुलाकात हुई ओगिल्वी एंड मेथर इंडिया (Ogilvy & Mather India) की क्रिएटिव टीम से।

वे कंपनियों के अभियानों के लिए आए थे, फिटकरी से बनी अगरबत्ती - जले तो आस्था और जलशुद्धीकरण भी, कूड़ा उठाओ, चाय का कप पाओ... जैसे उनके हर विचार में भारतीय जीवन की गंध थी। यह वही विचार-धारा थी, जो पीयूष पांडे ने रोपी थी।

उन्होंने केवल भारतीय विज्ञापन को नया चेहरा नहीं दिया, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के क्रिएटिव दिमागों को तैयार किया। आज भारतीय विज्ञापन उद्योग में जितने भी बड़े नाम हैं, उनमें से अधिकांश किसी न किसी रूप में पीयूष पांडे के विचारों से प्रभावित रहे हैं।

संयोग देखिए, इसी सप्ताह जयपुर के जाने-माने अभिनेता असरानी का निधन हुआ। पीयूष पांडे भी जयपुर के थे। असरानी और पीयूष पांडे, दोनों ने अपने-अपने क्षेत्र में हास्य और रचनात्मकता को नई पहचान दी। अब पीयूष पांडे का जाना, जयपुर और भारतीय रचनात्मक जगत, दोनों के लिए एक बड़ी क्षति है।

पीयूष पांडे केवल विज्ञापन जगत के स्तंभ नहीं थे, वे भारतीय समाज के शब्द-शिल्पी थे। उन्होंने हमें सिखाया कि ब्रांड बनाना केवल लोगो या टैगलाइन नहीं, बल्कि भावना जगाने की कला है।

वे अब इस दुनिया में नहीं हैं, पर उनके बनाए विज्ञापन, उनके शब्द, उनके विचार और उनकी भारतीयता आने वाली पीढ़ियों को सृजन की प्रेरणा देते रहेंगे। वे गए नहीं, हर “जुड़ गया तो छूटेगा नहीं” में बस गए हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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