अद्भुत लेखन क्षमता और विद्वता के मालिक
कहा जाता है कि महात्मा गांधी को सरदार पटेल से अधिक नेहरू इसलिए भी पसन्द थे क्योंकि धारा प्रवाह अंग्रेजी और हिन्दी बोलने के साथ ही उनमें लेखन की अद्भुत क्षमता भी थी और इसके लिए वह बहुत अध्ययन करते थे। इसी वजह से वह भारत से बाहर भी सबसे लोकप्रिय भारतीय नेता थे।
नेहरू जी ने कई ग्रन्थ भी लिखे जिनमें डिस्कवरी ऑफ इंडिया, एन ऑटोबायोग्रफी ( टुवार्ड्स फ्रीडम), ए ग्लिम्पसेज ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री, लेटर फाॅर नेशन, लेटर फ्रॉम अ फादर टु हिज डाॅटर एवं द युनिटी ऑफ इंडिया जैसे कालजयी ग्रन्थ शामिल हैं।
इनमें से एन ऑटोबाइग्राफी की शुरुआत उन्होंने देहरादून जेल से ही की थी। इस ग्रन्थ में उन्होंने पहाड़ के नैसर्गिक सौंदर्य और देहरादून का भी उल्लेख किया है। भारत के लिए नेहरू की जेल की कोठरी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नेहरू को अपनी विख्यात पुस्तक ”डिस्कवरी आफ इण्डिया“ लिखने की यहीं सूझी थी और उस पुस्तक के अधिकांश हिस्से इसी कोठरी में लिखे गए थे। नेहरू को उनकी पुत्री इन्दिरा गांधी इसी वार्ड में मिलने आती थीं।
नेहरू के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान चरम पर
नेहरू के बारे में आज जिस तरह दृष्प्रचार हो रहा उससे लगता है जैसे नेहरू ने स्वाधीनता संग्राम के दौरान अपने बाप-दादा के वैभव का लुत्फ उठाने के सिवा कुछ नहीं किया और जो कुछ किया भी वह देशहित में नहीं किया। सच है कि पैतृक वैभव की उनके पास कमी नहीं थी। इलाहाबाद का आनन्द भवन इसका गवाह है, जिसे बाद में कांग्रेस को दे दिया गया। उनके पिता मोती लाल देश के चोटी के वकील थे और दादा गंगाधर नेहरू दिल्ली के अंतिम कोतवाल थे। लेकिन सच्चाई की गवाह लखनऊ, देहरादून, अल्मोड़ा आदि की खामोश जेलें बिन कहे सच्चाई बयां करती हैं।
राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान नेहरू 3,259 दिन तक जेल में रहे। उन्होंने सबसे पहले लखनऊ जेल में 6 दिसम्बर 1921 से लेकर 3 मार्च 1922 तक कुल 88 दिन काटे। उनको जब नवीं बार गिरफ्तार किया गया तो कुल 1041 दिन अल्मोड़ा जेल में रखा गया। देहरादून की पुरानी जेल के एक वार्ड में स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान पण्डित नेहरू को 4 बार कैद कर रखा गया था।
राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान नेहरू को सबसे पहले 1932 में देहरादून जेल के इस वार्ड में रखा गया था। उसके बाद 1933,1934 और फिर 1941 में उन्हें यहां रखा गया था।
‘‘इण्डिपेंडेंट पार्टी’’ की नींव भी देहरादून में ही रखी
नेहरू ही नहीं पूरे नेहरू परिवार को देहरादून-मसूरी से विशेष लगाव रहा। देखा जाए तो कांग्रेस में होते हुए भी मोतीलाल नेहरू ने अपनी ‘‘इण्डिपेंडेंट पार्टी’’ की नींव भी देहरादून में ही रखी थी। गया कांग्रेस में जाने से पहले इस पार्टी के सभी नेता देहरादून में एकत्र हुए थे और मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुई बैठक में नई पार्टी के गठन का प्रस्ताव पारित हुआ था।
मसूरी के लोग मोतीलाल को शायद ही कभी भूलें। सर्वविदित है कि मसूरी के माॅल रोड पर हिन्दुस्तानियों का प्रवेश वर्जित था। सड़क के प्रवेश द्वारा पर ही बोर्ड लटका हुआ होता था जिसमें लिखा होता था कि ‘‘इंडियन्स एण्ड डाॅग्स आर नाॅट अलाउड’’।
मोतीलाल नेहरू मसूरी प्रवास के दौरान सदैव जुर्माना भर कर माॅल रोड की प्रातः कालीन सैर कर अंग्रेजों के गुरूर पर प्रहार करते थे। नेहरू के नाती राजीव और संजय गांधी दून स्कूल के छात्र रहे। राहुल गांधी और प्रियंका का भी काफी वक्त दून स्कूल में गुजरा। प्रियंका बाड्रा ने भी अपने बच्चे इसी इसी स्कूल में पढ़ाए। नेहरू के दोनों नाती राजीव और संजय गांधी देहरादून के ही दून स्कूल में पढ़े थे। नेहरू की बहन श्रीमती विजय लक्ष्मी पण्डित और करीबी रिश्तेदार बी.के.नेहरू ने देहरादून के राजपुर रोड स्थित आवासों पर जीवन की अंतिम सांसें ली थी।
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