दिल्ली के संगीत प्रेमियों के घरों में आज घर का काम-काज चौगुनी गति से निपटाया जा रहा है, क्योंकि मशहूर नेहरू पार्क में आज मां शारदे के वरद् पुत्र 'पंडित जसराज जी ' का गायन है। कुछ घरों का काम पूरा हुआ, कुछ घरों में जो जैसे था वैसे ही उसे छोड़कर, लोग समय से पूर्व वहां पहुंच रहे हैं ताकि कार्यक्रम का कोई भाग ना छूटे।
मंच सजा हुआ है उनके साथ उनके साजिंदे और उनके बाईं ओर उनके प्रिय शिष्य रतन मोहन शर्मा, उनकी पुत्री दुर्गा जसराज जी और पीछे तानपूरे पर दो और शिष्य-शिष्याएं बैठी हैं।
पंडितजी मंच पर आते हैं और बैठने से पहले श्रोताओं का 'जय हो' के उद्द्घोष से अभिवादन करते हैं, मानों हर चेहरे में उन्हें 'वासुदेव' नजर आ रहे हों, फिर मंच पर आसीन होते हैं। चेहरे की चमक 'मार्तंड' या सूर्य की भांति दैदीप्यमान है।
सबसे पहले ख्याल गायन शुरू हुआ। उनके गायन में गाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की 'ख्याल शैली' की विशिष्टता को झलकाता है।
पंडितजी की आवाज का फैलाव साढ़े तीन सप्तक तक था। 14 वर्ष की आयु तक वे अपने बड़े भाई मणिराम जी के साथ तबला वादन करते थे और उनकी रुचि और साजिंदों के साथ निम्न व्यवहार ने उन्हें तबले से विमुख कर दिया और अपने बड़े भाई मणिराम जी की छत्र-छाया में 'मेवाती घराने' का ख्याल सीखने लगे। पंडितजी कई बार कहते थे कि बेगम अख्तर साहिबा के गायन ने मुझे शास्त्रीय गायक बना दिया।
उनके पिता मोतीराम जी स्वयं मेवाती घराने के एक विशिष्ट संगीतज्ञ थे। पंडित जसराज जी को प्राथमिक शिक्षा अपने पिता से ही मिली थी परंतु जब जसराज जी 4 वर्ष के थे तभी उनका निधन हो गया था।
28 जनवरी 1930 को पंडित जसराज जी का जन्म हरियाणा के हिसार जिले के एक ऐसे परिवार में हुआ जिसने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को एक- से - बढ़कर एक शिल्पी दिए।
अपने बड़े भ्राता से संगीत की शिक्षा लेने के बाद उन्होंने मेवाती घराने के दिग्गज महाराणा जसवंत सिंह बाघेला तथा इसी घराने के संगीतज्ञ गुलाम कादिर खां साहब से भी शिक्षा प्राप्त की। इन्होंने आगरा घराने के बल्लभदास दामूलजी से भी शिक्षा ली थी।
अब हम आज की शाम के कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हैं। ख्याल गायकी समाप्त हो चुकी है और श्रोताओं की तरफ से राग भीमपलासी पर आधारित भजन 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय' की फरमाइश हो रही है मानोंं 'नारायण' श्रोताओ के रूप में खुद कह रहे हैं अब ये सुनाओ। उनके भजन पर उनके अनुसंधान का काफी प्रभाव दिखता है।
उन्होंने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में 'हवेली संगीत' पर व्यापक शोध किया और कई नवीन बंदिशों की रचना की। 'हवेली संगीत' को मंदिरों से उठाकर मंच तक लाए।
ये विभूतियां शताब्दियों में एकाध बार जन्म लेती हैं। ये संगीत जगत के वाकई एक मार्तंड उपासक थे। खैर अब पंडितजी ने भजन गाना शुरू कर दिया है।