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स्वर में बसा एक शताब्दी का जीवन, हमेशा याद आएंगे पंडित अमियो रंजन बंद्योपाध्याय

Sun, 02 Aug 2026 08:07 AM IST
पूनम कंडारी एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला

सार

Pandit Amiya Ranjan Bandyopadhyay: सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक, संगीताचार्य पंडित अमियो रंजन बंद्योपाध्याय का जाना संगीत जगत के लिए गहरी क्षति है। अपने अंतिम समय तक भी उनके भीतर कुछ नया सीखने की ललक बरकरार थी। इस दिग्गज कलाकार के जीवन और व्यक्तित्व के पहलुओं से रूबरू करा रहे हैं, राजेंद्र शर्मा। 

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दिवंगत पंडित अमियो रंजन बंद्योपाध्याय - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जन्म का होना ही मृत्यु का निमंत्रण है, यह शाश्वत सत्य पंडित अमियो रंजन बंद्योपाध्याय ने बहुत पहले अपने अंतस में आत्मसात कर लिया था। शायद इसी गहरी स्वीकृति के कारण इस वर्ष फरवरी में अपना सौवां जन्मदिन उन्होंने किसी औपचारिक समारोह से नहीं, बल्कि एक जीवंत संगीत संध्या के रूप में मनाया।

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कोलकाता के रामकृष्ण मिशन संस्कृति संस्थान के विवेकानंद सभागार में धोती-कुर्ता पहने वह शतायु साधक मंच पर आए। एकताल में राग बिहाग के विलंबित ख्याल से गायन आरंभ हुआ। स्वर संयमित थे, पर उनमें सौ वर्षों की साधना का तेज चमक रहा था। द्रुत तीनताल की प्रस्तुति में भी वही सहज अधिकार झलकता रहा। बिना किसी प्रदर्शन या दोहराव के उन्होंने राग के विविध रंग ऐसे खोले कि श्रोता देर तक मंत्रमुग्ध बैठे रहे। 

कभी जड़ता के पक्षधर नहीं रहे 
परंपरा के दृढ़ समर्थक होते हुए भी वे कभी जड़ता के पक्षधर नहीं रहे। उनका विश्वास था कि परंपरा तभी जीवित रहती है जब उसमें सीखने और बदलते समय से संवाद करने का साहस हो। पचासी वर्ष की आयु में उन्होंने व्यवस्थित रूप से हिंदी सीखी और नब्बे वर्ष की अवस्था में कंप्यूटर का प्रशिक्षण लिया। यह उनकी जिज्ञासा और जीवटता का अद्भुत उदाहरण है। 

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दिवंगत पंडित अमिया रंजन बंद्योपाध्याय - फोटो : Website-amiyaranjanbandyopadhyay

विष्णुपुर घराने की परंपरा को आगे बढ़ाया 
21 फरवरी, 1927 को कोलकाता के एक प्रतिष्ठित संगीत परिवार में जन्मे पं. अमियो रंजन बंद्योपाध्याय बिष्णुपुर घराने की गौरवशाली परंपरा के प्रतिनिधि थे। उनके पिता संगीताचार्य सत्य किंकर बंद्योपाध्याय उनके प्रथम गुरु थे। बचपन से ही संगीत उनके लिए केवल कला नहीं, बल्कि जीवन का संस्कार था। वे घंटों रियाज करते, बंदिशों के अर्थ पर विचार करते और रागों की सूक्ष्मताओं को आत्मसात करते। उनके लिए संगीत भारतीय दर्शन, साहित्य और आध्यात्मिक चेतना का विस्तार था। बिष्णुपुर घराने की पहचान राग की शुद्धता, ध्रुपदांग की गंभीरता और प्रस्तुति के संतुलन से होती है। पंडित जी ने इस परंपरा को पूरी निष्ठा से आगे बढ़ाया। उनके गायन में राग का विस्तार अत्यंत धैर्य के साथ विकसित होता था। वे मानते थे कि कलाकार का दायित्व राग पर अपनी छाप छोड़ना नहीं, बल्कि उसके स्वभाव को पूरी ईमानदारी से प्रकट करना है। 

हमेशा जीवंत रहेगी उनकी संगीत परंपरा 
स्वर साधना के इस शताब्दी पुरुष के सौ वर्ष का जीवन यह सिखाता है कि कलाकार केवल अपनी कला से महान नहीं बनता। उसकी महानता विचारों, अनुशासन, जिज्ञासा और आत्मसंवाद से निर्मित होती है। अपने सौवें जन्मदिन को संगीत के उत्सव में बदलने वाले इस महापुरुष ने गुरु पूर्णिमा के पावन दिन शांत भाव से इस नश्वर संसार को विदा कहा। उनके स्वर थम गए, पर उनकी साधना भारतीय संगीत की परंपरा में दीर्घ काल तक गूंजती रहेगी।
परंपरा के दृढ समर्थक होते हुए भी अमियो रंजन बंद्योपाध्याय कभी जड़ता के पक्षधर नहीं रहे। उनका विश्वास था कि परंपरा तभी जीवित रहती है, जब उसमें सीखने और बदलते समय से संवाद करने का साहस हो।

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