दिवंगत पंडित अमिया रंजन बंद्योपाध्याय
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विष्णुपुर घराने की परंपरा को आगे बढ़ाया
21 फरवरी, 1927 को कोलकाता के एक प्रतिष्ठित संगीत परिवार में जन्मे पं. अमियो रंजन बंद्योपाध्याय बिष्णुपुर घराने की गौरवशाली परंपरा के प्रतिनिधि थे। उनके पिता संगीताचार्य सत्य किंकर बंद्योपाध्याय उनके प्रथम गुरु थे। बचपन से ही संगीत उनके लिए केवल कला नहीं, बल्कि जीवन का संस्कार था। वे घंटों रियाज करते, बंदिशों के अर्थ पर विचार करते और रागों की सूक्ष्मताओं को आत्मसात करते। उनके लिए संगीत भारतीय दर्शन, साहित्य और आध्यात्मिक चेतना का विस्तार था। बिष्णुपुर घराने की पहचान राग की शुद्धता, ध्रुपदांग की गंभीरता और प्रस्तुति के संतुलन से होती है। पंडित जी ने इस परंपरा को पूरी निष्ठा से आगे बढ़ाया। उनके गायन में राग का विस्तार अत्यंत धैर्य के साथ विकसित होता था। वे मानते थे कि कलाकार का दायित्व राग पर अपनी छाप छोड़ना नहीं, बल्कि उसके स्वभाव को पूरी ईमानदारी से प्रकट करना है।
हमेशा जीवंत रहेगी उनकी संगीत परंपरा
स्वर साधना के इस शताब्दी पुरुष के सौ वर्ष का जीवन यह सिखाता है कि कलाकार केवल अपनी कला से महान नहीं बनता। उसकी महानता विचारों, अनुशासन, जिज्ञासा और आत्मसंवाद से निर्मित होती है। अपने सौवें जन्मदिन को संगीत के उत्सव में बदलने वाले इस महापुरुष ने गुरु पूर्णिमा के पावन दिन शांत भाव से इस नश्वर संसार को विदा कहा। उनके स्वर थम गए, पर उनकी साधना भारतीय संगीत की परंपरा में दीर्घ काल तक गूंजती रहेगी।
परंपरा के दृढ समर्थक होते हुए भी अमियो रंजन बंद्योपाध्याय कभी जड़ता के पक्षधर नहीं रहे। उनका विश्वास था कि परंपरा तभी जीवित रहती है, जब उसमें सीखने और बदलते समय से संवाद करने का साहस हो।