फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आर्थिक तंगी से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए क्यों मजबूरी बना रक्षा बजट?

विज्ञापन
क्या इमरान खान पाकिस्तान का भविष्य देख रहे हैं? - फोटो : social media
विज्ञापन

इसे सामान्य फैसला न मानें। 11 जून को पाकिस्तानी नेशनल असेंबली में पेश किए गए राष्ट्रीय बजट में पाकिस्तानी सेना के रक्षा बजट में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। इमरान खान सरकार दवारा नेशनल असेंबली में वर्ष 2019-20 के लिए पेश किए गए बजट में रक्षा बजट के लिए 1152 अरब रुपये का प्रावधान किया गया है। यह 2018-19 के रक्षा बजट के मुकाबले मामूली बढ़ोतरी है।

विज्ञापन


2018-19 में पाकिस्तान का रक्षा बजट 1137 अरब रुपये का था। अगर डॉलर के नजरिए से देखेंगे पाकिस्तानी रक्षा बजट में भारी कटौती की गई है। इससे दुनिया भर के हथियार उद्याेग के कारोबारी मायूस हैं। डॉलर के नजरिए से पाकिस्तान का वर्ष 2019-20 का रक्षा बजट 2018-19 के रक्षा बजट से लगभग 2 अरब डॉलर कम है, क्योंकि पाकिस्तान रुपया का मूल्य डॉलर के मुकाबले खासा गिरा है। अगर डॉलर के नजरिए से देखें तो 2018-19 में पाकिस्तान का रक्षा बजट 9.6 बिलियन डॉलर का था जबकि 9 जून 2019 को पेश रक्षा बजट मात्र 7.6 अरब डॉलर है। क्योंकि पिछले एक साल में पाकिस्तानी रुपए का मूल्य गिरा है। इससे रक्षा उद्योग के कारोबारी मायूस है, क्योंकि इससे पाकिस्तान के रक्षा खरीद पर असर पड़ेगा।

सालों बाद पाकिस्तान ने रक्षा बजट में कोई बढ़ातेरी नहीं की। - फोटो : फाइल फोटो
आर्थिक हालात खराब हैं पाकिस्तान के
पाकिस्तान के खराब होते आर्थिक हालात के मद्देनजर इस बार के रक्षा बजट में पाकिस्तानी सरकार ने कोई इजाफा नहीं किया। भुगतान संतुलन की खराब होती स्थिति, पाकिस्तान का लगातार घटता विदेशी मुद्रा भंडार और इंपोर्ट बिल चुकाने में आ रही समस्या ने पाकिस्तानी सरकार को सैन्य खर्च घटाने के लिए मजबूर किया। इमरान खान सरकार ने खराब होती आर्थिक स्थिति के मद्देनजर सेना से पहले ही विचार-विमर्श कर लिया था।

पाकिस्तानी आर्मी ने खुद किया फैसला 
गौरतलब है कि पाकिस्तान का रक्षा बजट पाकिस्तान के कुल राष्ट्रीय बजट का लगभग 20 प्रतिशत होता है। पाकिस्तान सरकार ने पिछले कुछ सालों में अपने राष्ट्रीय बजट में रक्षा बजट की हिस्सेदारी कम की है।  किसी जमाने में रक्षा बजट की हिस्सेदारी कुल बजट में 50 प्रतिशत तक पहुंच जाती थी। सेना के भारी दबाव के कारण रक्षा बजट आवंटन में सेना की ही आजतक पाकिस्तान में चली है। इस बार खुद सेना रक्षा बजट में इजाफा न करने का प्रस्ताव लेकर आई।

सेना ने देश की खराब होती आर्थिक स्थिति के मद्देनजर अपने खर्च में कटौती करने का फैसला लिया। आने वाले वित्त वर्ष में सैन्य अधिकारियों के वेतन में बढ़ोतरी नहीं होगी। लेकिन इससे भी बड़ा अहम फैसला पाकिस्तानी सेना का यह है कि अगले वित्त वर्ष में पाकिस्तानी सेना हथियार खरीद से संबंधित कोई नया ऑर्डर नहीं देगी। पाकिस्तानी सेना के इस फैसले से हथियार उद्योग में चिंता है, क्योंकि पाकिस्तानी सेना अभी तक अपने सैन्य उपकरणों का बड़ा हिस्सा अमेरिकी रक्षा उद्योग से खरीदती रही है, लेकिन पिछले कुछ समय में पाकिस्तान ने चीन से सैन्य उपकरणों की खरीद बढ़ाई है।

पाकिस्तान की आर्थिक हालात काफी खराब है। पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार 10 अरब डॉलर के करीब रह गया है। - फोटो : Social Media

खराब होती आर्थिक स्थिति बनी कारण
पाकिस्तान की आर्थिक हालात काफी खराब है। पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार 10 अरब डॉलर के करीब रह गया है। पाकिस्तान पर 105 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज है, वहीं पाकिस्तान का सालाना विदेशी व्यापार घाटा 30 अरब डॉलर तक पहुंचा हुआ है। पाकिस्तान बड़े पैमाने पर तेल और गैस का आयात करता है। पाकिस्तान का आयात तेजी से बढ़ा है, जबकि निर्यात में विकास न के बराबर है। आयात में बढ़ोतरी के कारण पाकिस्तान को कई बार भुगतान संतुलन की खराब स्थिति से गुजरना पड़ा। इमरान खान ने जब कार्यभार सम्हाला था, उस समय पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति खासी खराब थी। इमरान खान को आर्थिक हालात सुधारने के लिए विदेश दौरे करने पड़े।

मौके पर पुराने दोस्त सऊदी अरब ने मदद की। सऊदी अरब ने 6 अरब डॉलर का बेल आउट पैकेज पाकिस्तान को देने की घोषणा की। संयुक्त अरब अमीरात ने भी 3 अरब डॉलर का बेल आउट पैकेज पाकिस्तान को देने की घोषणा की। खराब आर्थिक स्थिति के मद्देजनर चीन ने पाकिस्तान को 2.1 बिलियन डॉलर का बेल आउट पैकेज मार्च 2019 में दिया। पिछले साल ही पाकिस्तान ने कर्ज के लिए अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष से भी संपर्क साधा। 6 अरब डॉलर का बेल आउट पैकेज पाकिस्तान ने अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष से मांगा। लेकिन अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने पाकिस्तान के सामने कई शर्तें रख दीं।

बहुत मुश्किल रहा है यह साल भी 
इस साल मई में पाकिस्तान सरकार ने इन शर्तों को काफी मुश्किल से माना। शर्तो के मुताबिक पाकिस्तान सरकार ने टैक्स रिफॉर्म का वादा किया। टैक्स का दायरा बढ़ाने का वादा किया। कई खर्चो में कटौती के लिए भी पाकिस्तान तैयार हो गया। जनता को दी जाने वाली कुछ सब्सिडी भी पाकिस्तान खत्म करने को तैयार हो गया। हालांकि इससे इमरान खान के मंत्रालय में ही गतिरोध पैदा हो गया। वित्त मंत्री असद उमर को इस्तीफा देना पड़ा। उमर अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष की कड़ी शर्तों को मानने के लिए राजी नहीं थे। इमरान खान से उनका इस मामले पर मतभेद था। बताया जाता है कि अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तों को देखते हुए सेना भी आगे आई और सैन्य बजट को पिछले साल के बराबर ही रखने का प्रस्ताव सरकार को दिया।

सैन्य बजट की मजबूरी के क्या है वजह? 
पाकिस्तान के निर्माण के साथ ही पाकिस्तानी सेना के बजट को लेकर तमाम बहस होती रही है। किसी जमाने में पाकिस्तानी सेना का बजट पाकिस्तान के कुल बजट का 50 से 60 प्रतिशत तक होता था। लेकिन समय के साथ सैन्य बजट में कमी आई। पाकिस्तानी सेना का तर्क है कि पाकिस्तान तीन तरफ से दुश्मन मुल्कों से घिरा है। वैसे में सेना के बजट पर कोई समझौता नहीं हो सकता है। पाकिस्तान के पश्चिम में बसा देश अफगानिस्तान का डूरंड लाइन को लेकर पाकिस्तान से विवाद, पाकिस्तान के जन्म से ही है।इसलिए पाकिस्तान आज भी अफगान सीमा को सुरक्षित नहीं मानता।

अफगानिस्तान में सोवियत सेना की एंट्री, उसके बाद अफगानिस्तान में तालिबान के शासन ने पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा को खासा डिस्टर्ब रखा। 2007 के बाद अफगान तालिबान और पाकिस्तानी तालिबान की पश्चिमी सीमा पर आतंकी सक्रियता ने पाकिस्तानी सेना के खर्चे को और बढ़ाया। पाकिस्तानी सेना ने राह-ए-निज्जत, राह-ए-रश्त, जर्ब-ए-अज्ब से जैसे सैन्य अभियान पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तानी तालिबान समेत कई आतंकी संगठनों के खिलाफ चलाए।

भारत को बड़ा दुश्मन मानता है पाकिस्तान 
इसमें पाकिस्तानी सेना के लगभग 3 अरब डॉलर खर्च हुए। लेकिन पाकिस्तान का सैन्य बजट का बड़ा खर्च भारतीय सीमा पर भी होता है। पाकिस्तान का भारत से विवाद पाकिस्तान के जन्म से ही है। पाकिस्तान सेना का स्थायी दुश्मन भारत है। वैसे में पाकिस्तानी सेना के बजट निर्धारण में भारत सीमा की भारी भूमिका रहती है। हालांकि पाकिस्तान की उतरी सीमा चीन के कारण सुरक्षित है, पर दक्षिणी सीमा पर ईऱान से पाकिस्तान के संबंध लगातार खराब रहे हैं। इसका कारण सुन्नी इस्लामिक देश पाकिस्तान का ईरान के कट्टर दुश्मन सऊदी अरब से अच्छे संबंध होना है।

सऊदी अरब से नजदीकी संबंध होने के कारण ईऱान पाकिस्तान को शक के नजरिए से देखता है। दोनों मुल्क एक दूसरे पर आतंकी संगठनों को संरक्षण देने का आरोप लगाते हैं। ईऱान पाकिस्तान की सीमा पर बसे ईरानी राज्य सीस्तान-बलोचिस्तान और पाकिस्तानी बलोचिस्तान में लगातार आतंकी संगठन लगातार हमले करते हैं, इसलिए दक्षिणी सीमा पर भी पाकिस्तान को अपना सैन्य बजट का अच्छा हिस्सा खर्च करना पड़ता है।

विज्ञापन

सैन्य बजट में इजाफा न होना अच्छा संकेत, क्या कहते हैं एक्सपर्ट 
दक्षिण एशिया में शांति के समर्थकों की राय है कि पाकिस्तानी सैन्य बजट में इजाफा न होना भविष्य के लिए अच्छे संकेत है। क्योंकि बढ़ते सैन्य बजट से पूरे एशियाई क्षेत्र में हथियारों की रेस बढ़ी है। इससे दक्षिण एशिया को भारी नुकसान हुआ है। जबकि रूस, अमेरिका और पश्चिमी देशों के हथियार उद्योग को इसका भारी लाभ मिला है।

दुनिया में बढ़े हथियार खरीदार देश एशियाई क्षेत्र में ही हैं। एशियाई मुल्क जापान, सऊदी अरब, इराक, ईऱान, भारत, पाकिस्तान जैसे मुल्क बीते कई दशकों से सैन्यीकरण में लगे हैं। इसका सीधा लाभ पांच-सात देशों के हथियार उद्योग को मिला है।

भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव के कारण लगातार दोनों मुल्कों का रक्षा बजट बढ़ा है। पाकिस्तान के रक्षा बजट में 2009 से 2018 के बीच 73 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जो दुनिया में होने वाले सैन्य खर्चों में होने वाली बढ़ोतरी में एक तेज बढ़ोतरी थी। जबकि भारत के रक्षा बजट में 2009 से 2018 के बीच 29 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। आज भारत का रक्षा बजट 66 अरब डॉलर पहुंच गया है।

भारत और पाकिस्तान की मजबूरी 
भारत और पाकिस्तान दोनों अपने रक्षा बजट का काफी बड़ा हिस्सा हथियारों की खरीद पर लगाते हैं, जिसका लाभ अमेरिका, फ्रांस, रूस और चीन जैसे देश के रक्षा उद्योग उठा रहे हैं। पाकिस्तान अभी तक सबसे ज्यादा हथियार अमेरिका से खरीदता था। लेकिन अब चीनी रक्षा उधोग भी पाकिस्तान को हथियार बेच रहा है। अभी हाल ही में पाकिस्तान ने चीन से आठ सब मैरिन खरीद खरीदने का फैसला लिया है।

लड़ाकू विमान जेएफ-17 को पाकिस्तान में चीन के साथ मिलकर बनाने का फैसला भी पाकिस्तान ने लिया है। हालांकि अमेरिका और चीन के रक्षा बजट के मुकाबले भारत और पाकिस्तान का रक्षा बजट कुछ नहीं है। अमेरिका का रक्षा बजट जहां सलाना 649 अरब डॉलर पहुंच गया है, वहीं चीन का रक्षा बजट 250 अरब डॉलर सलाना पहुंच गया है। चीन ने भी 2009 के बाद अपने रक्षा बजट में खासी बढ़ोतरी की है। यह बढ़ोतरी 83 प्रतिशत तक है।

हालांकि पाकिस्तान के रक्षा बजट में बढ़ोतरी न होने और पाकिस्तान के उपर संभावित खतरों पर चर्चा हो रही है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चूंकि पाकिस्तान एक न्यूक्लियर स्टेट है, इसलिए परंपरागत रक्षा खर्चों में कुछ समय के लिए पाकिस्तान कटौती कर सकता है, क्योंकि न्यूक्लियर स्टेट होने के कारण पाकिस्तान के ऊपर फिलहाल कोई बड़ा खतरा नहीं है। हालांकि पाकिस्तान अपने सैन्य खर्च कम करने का स्थायी समाधान भी ढूंढ रहा है। पाकिस्तान ने सैन्य खर्च कम करने के लिए अफगानिस्तान और ईऱान सीमा पर कुछ प्रयास किए हैं। पाकिस्तान अफगान शांति वार्ता में अहम भूमिका निभा रहा है।

पाकिस्तान को होंगे ये फायदे 
अगर अफगानिस्तान में शांति होती है तो पाकिस्तानी सीमा के अंदर तालिबान और पाकिस्तानी तालिबान की गतिविधियां कम होगी। इससे पाकिस्तानी सेना के खर्च में वैसे ही काफी कमी आएगी, क्योंकि 2007 के बाद पाकिस्तानी सेना की बड़ी ताकत खैबर पख्तूनखवा और सात ट्राइबल एजेंसियों में आतंकियों को कंट्रोल करने में लग गई। इससे पाकिस्तानी सेना को खासा पैसा खर्च करना पड़ा है।

पाकिस्तानी तालिबान और अफगान तालिबान के संभावित खतरों को कम कर पाकिस्तान पश्चिमी सीमा के खर्च को कम करना चाहता है। हाल ही में ईरान जाकर इमरान खान ने पाकिस्तानी-ईरानी सीमा पर चल रहे सैन्य तनाव को कम करने की कोशिश की है। दोनों मुल्कों ने एक दूसरे को आतंकी संगठनों पर ठोस कार्रवाई के आश्वासन दिए हैं।

अगर ईऱान-पाकिस्तान सीमा पर तनाव कम होगा और पाकिस्तान का सैन्य खर्च कम होगा। अफगानिस्तान में ईऱान की खासी घुसपैठ है, इसलिए भी पाकिस्तान ईरान से संबंध सुधारने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि इससे भी अफगानिस्तान सीमा पर पाकिस्तान का सैन्य खर्च कम होगा।

अगर परिस्थितियां बदली तो पाकिस्तानी सेना की बड़ी परेशानी पाकिस्तान की पूर्वी सीमा ही रहेगी। हालांकि परंपरागत रक्षा बजट कम कर न्यूक्लियर हथियारों पर पाकिस्तान की निर्भरता भी एशियाई शांति के लिए लंबे समय में अच्छे संकेत नहीं होंगे। वैसे में भारत और पाकिस्तान के बीच शांति वार्ता भी पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति सुधार सकता है। इससे पाकिस्तान के सैन्य खर्च में कमी आएगी।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें