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अस्कल मुर्ग: भारत का रंगीन तीतर और इसकी दुनिया

सार

अस्कल मुर्ग का वैज्ञानिक नाम गैलोपेरडिक्स लुनुलता है। यह पक्षी तीतर परिवार का सदस्य है और इसकी पहचान इसके चमकदार रंगों से होती है। नर अस्कल मुर्ग के शरीर पर सफेद धब्बे होते हैं, जबकि मादा का रंग हल्का भूरा होता है। 
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अस्कल मुर्ग: भारत का रंगीन तीतर - फोटो : Himanshu Gupta
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विस्तार
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क्या आप जानते हैं कि भारत में एक ऐसा तीतर भी है जो अपने सुंदर रंगों और अनोखी आदतों के लिए जाना जाता है? यह है अस्कल मुर्ग, जिसे अंग्रेजी में पेंटेड स्परफाउल कहते हैं। यह पक्षी मुख्यतः भारत के पथरीले और झाड़ीदार जंगलों में पाया जाता है। नर अस्कल मुर्गा के पंख काले, हरे और भूरे रंग के होते हैं, जिन पर सफेद धब्बे होते हैं, जो इसे बहुत ही आकर्षक बनाते हैं। मादा अस्कल मुर्गा भूरे रंग की होती है और नर जितनी रंगीन नहीं होती।

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रंग-रूप और पहचान

अस्कल मुर्ग का वैज्ञानिक नाम गैलोपेरडिक्स लुनुलता है। यह पक्षी तीतर परिवार का सदस्य है और इसकी पहचान इसके चमकदार रंगों से होती है। नर अस्कल मुर्ग के शरीर पर सफेद धब्बे होते हैं, जबकि मादा का रंग हल्का भूरा होता है। नर के पैरों पर दो से चार नुकीले स्पर (कंट) होते हैं, जबकि मादा के पैरों पर एक या दो स्पर हो सकते हैं।

इसकी पूंछ काली होती है और शरीर के निचले हिस्से में गहरे भूरे और लाल रंग का मिश्रण होता है। इसके सिर और गर्दन पर हरे रंग की चमक होती है, जो इसे और भी आकर्षक बनाती है। मादा पक्षी नर की तुलना में हल्की होती है और उसके शरीर पर सफेद धब्बे नहीं होते।
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अस्कल मुर्ग मुख्य रूप से भारत के दक्षिणी और मध्य भागों में पाया जाता है। यह अरावली पर्वत श्रृंखला, मध्य भारत के पठारी क्षेत्रों और दक्षिण भारत के पथरीले जंगलों में रहता है। इसकी पसंदीदा जगहें सूखी झाड़ियां और चट्टानी इलाके होते हैं, जहां यह आसानी से छिप सकता है।

यह पक्षी आमतौर पर झाड़ीदार और चट्टानी जंगलों में पाया जाता है, जहां यह आसानी से शिकारियों से बच सकता है। यह नल्लमाला पहाड़ियों और आंध्र प्रदेश के पूर्वी घाटों में भी देखा गया है।

जीवनशैली और खान-पान का तरीका

अस्कल मुर्ग आमतौर पर छोटे समूहों या जोड़ों में देखा जाता है। यह पक्षी उड़ने की बजाय तेजी से दौड़कर खतरे से बचता है। इसकी खान-पान की आदतें भी रोचक हैं। यह जंगली फल, कीड़े-मकोड़े और फूलों को खाकर अपना जीवनयापन करता है।

इसका प्रजनन काल जनवरी से जून तक होता है, और नर पक्षी मादा को चोंच में खाना देकर रिझाने की कोशिश करता है। यह पक्षी आमतौर पर एक चट्टान के नीचे या झाड़ियों में घोंसला बनाता है, जहां मादा तीन से चार अंडे देती है।

इसकी आवाज

अस्कल मुर्ग की आवाज तेज और विशिष्ट होती है। इसे अक्सर "चुक-चुक" या "चुगुक" ध्वनि के रूप में वर्णित किया जाता है। जब यह खतरा महसूस करता है, तो इसकी आवाज़ और तेज हो जाती है। नर पक्षी प्रजनन काल के दौरान एक बुलबुलाने वाली आवाज निकालता है, जिससे वह मादा को आकर्षित करता है। यह पक्षी आमतौर पर सुबह और शाम के समय अधिक सक्रिय होता है और इसी समय इसकी आवाज़ जंगल में गूंजती है।

अस्कल मुर्ग को अभी गंभीर खतरा नहीं है, लेकिन इसके प्राकृतिक आवास में कमी आ रही है। जंगलों की कटाई और शिकार इसके अस्तित्व के लिए चुनौती बन सकते हैं। हमें इसके संरक्षण के लिए जंगलों को बचाने और इसके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने की दिशा में काम करना चाहिए।

इसके अलावा, स्थानीय समुदायों को जागरूक करना भी आवश्यक है ताकि वे इस पक्षी के महत्व को समझें और इसके संरक्षण में योगदान दें। सरकार और वन्यजीव संगठनों को संरक्षण योजनाएँ बनानी चाहिए ताकि अस्कल मुर्ग की संख्या स्थिर बनी रहे।

अस्कल मुर्ग भारत की जैव विविधता का एक अनमोल हिस्सा है। इसकी सुंदरता और अनोखी जीवनशैली इसे खास बनाती है। हमें इस अद्भुत पक्षी को बचाने और इसके संरक्षण में योगदान देने की ज़रूरत है।

तो अगली बार जब आप किसी पथरीले जंगल में जाएं, तो ध्यान दें- शायद कहीं झाड़ियों में अस्कल मुर्ग छिपा हो!


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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