दरअसल, 1973 में जापान की एक कंपनी ने आलू के चिप्स के साथ बेसबॉल खिलाड़ियों के चित्र वाले कार्ड्स मुफ्त में देने शुरू किए। देखते ही देखते बच्चों में इन्हें इकट्ठा करने की होड़ मच गई। इस क्रेज ने आगे चलकर मंगा (कॉमिक्स) और एनीमे (कार्टून) की एक नई दुनिया को जन्म दिया। इसी माहौल में पले-बढ़े 12 साल के सातोशी ताजिरी। सातोशी को बचपन में कीड़े-मकोड़े पकड़ने और दोस्तों के साथ उन्हें बदलने का अनोखा शौक था। इसी शौक से उनके दिमाग में एक गेम का विचार आया, जहां खिलाड़ी काल्पनिक जीवों को पकड़ सकें और आपस में खरीद-बेच सकें। फिर, 1996 में जन्म हुआ ‘पॉकेट मॉन्स्टर्स रेड’ और ‘पॉकेट मॉन्स्टर्स ग्रीन’ का। इसके मुख्य किरदार का नाम सातोशी ही रखा गया। 151 मॉन्स्टर्स में से एक पिकाचू, देखते ही देखते इस पूरे साम्राज्य का चेहरा बन गया। 1998 में जब इसे अंग्रेजी में ‘पोकेमॉन’ नाम से लॉन्च किया गया, तो कुछ पात्रों के नाम बदले गए। ‘सातोशी बन गया ‘ऐश’। ‘न्यार्थ’ बना ‘म्याऊथ’। पर, ‘पिकाचू’ का जादू ऐसा था कि उसका नाम नहीं बदला गया! जल्द ही दुनियाभर के लोग एक साझी ‘पोकेमॉन संस्कृति’ से जुड़ गए। 2010 के दशक में ‘पोकेमॉन गो’ ने गेमिंग इंडस्ट्री में तहलका मचा दिया। लोग एक दुर्लभ पोकेमॉन को पकड़ने के लिए सात समंदर पार तक यात्रा करने लगे! इसके बाद ‘पोकेमॉन टीसीजी पॉकेट’ ने इस पूरे अनुभव को डिजिटल रूप देकर नई पीढ़ी के हाथों में सौंप दिया। कोविड के दौरान लोगों को एहसास हुआ कि ये कार्ड्स अब खजाना बन चुके हैं! कार्ड्स की मांग आसमान छूने लगी, विशेषकर ‘पिकाचू इलस्ट्रेटर’ की, जिसे दुनिया का सबसे दुर्लभ व प्रतिष्ठित कार्ड माना जाता है।
लेकिन, इस दीवानगी का एक स्याह पहलू भी सामने आया। चूंकि, ये कार्ड छोटे हैं, जेब में आ जाते हैं और दुनिया में कहीं भी बेचे जा सकते हैं, इसलिए बाजार में इनकी चोरी और तस्करी के अपराध बढ़ने लगे। आज पोकेमॉन कार्ड्स अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक मुद्रा बन चुके हैं, एक ऐसा अनमोल खजाना, जिसे संभाल कर रखना पड़ता है! -द कन्वर्सेशन