न्यूयॉर्क सिर्फ गगनचुंबी इमारतों, सबवे की गूंज या टाइम्स स्क्वायर की रोशनी का शहर नहीं है। यह दुनिया की भाषाई आत्माओं का संगम भी है। यहां सात सौ से अधिक भाषाएं सांस लेती हैं। यह शहर आज भी दुनिया का सबसे भाषाई रूप से विविध महानगर है। पर सवाल है क्या यह भाषाई विशिष्टता आने वाले वर्षों तक टिक पाएगी?
न्यूयॉर्क सिटी में आज 700 से अधिक भाषाएं बोली जाती हैं, जो दुनिया की कुल भाषाओं का लगभग 10 प्रतिशत हैं। लेकिन प्रवास नीतियों में सख्ती, शहर में बढ़ती जीवन-लागत और भाषाओं के प्राकृतिक क्षरण ने इस विविधता को खतरे में डाल दिया है। एंडेंजर्ड लैंग्वेज अलायंस के सह-निदेशक रॉस परलिन बताते हैं कि इतिहास में पहले कभी इतनी भाषाएं एक ही भौगोलिक स्थान पर, एक ही समय में एकत्र नहीं हुईं और इसके लुप्त होने की गति भी उतनी ही तेज हो सकती है। इस भाषाई विविधता ने न्यूयॉर्क को न केवल सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनाया है, बल्कि वैज्ञानिक, कलात्मक और आर्थिक दृष्टि से भी अनोखा बना दिया है। क्वींस के शेफ व कवि इरविन सांचेज अपने व्यंजनों के जरिये अपनी मातृभाषा नहुआटल को जिंदा रखे हुए हैं। यह भाषा कभी प्राचीन एजटेक साम्राज्य की पहचान थी। ताजिकिस्तान की हुस्निया खुजमयोरोवा वाखी भाषा में बच्चों के लिए किताबें तैयार कर रही हैं। गिनी से आए इब्राहिमा ट्राओरे एन’को नामक पश्चिम अफ्रीकी लिपि को डिजिटल दुनिया में ले जाने की कोशिश कर रहे हैं और मॉल्डोवा से आए यिडिश (यहूदी साहित्य) लेखक बोरिस सैंडलर इस शहर में यिडिश साहित्य का पुनर्जन्म कर रहे हैं। यह विविधता न केवल भाषाओं में, बल्कि विचारों, संगीत, भोजन और कला में भी एक नई चेतना ला रही है। जहां बेबेल अब भ्रम नहीं, बल्कि एक जीवित व संवादशील वास्तविकता है। बेबेल, यानी एक ऐसा स्थान, जहां बहुत सारी भाषाएं बोली जाती हैं, जहां हर आवाज अलग है, पर सब साथ मौजूद हैं।
ब्रुकलिन की गलियों में कुछ कदम चलते ही दुनिया बदल जाती है। जहां एक ओर घाना के चर्चों में त्वी की प्रार्थनाएं गूंजती हैं, वहीं दूसरी ओर अजरबैजान के नाई जुहुरी में बात करते हैं। उबर ड्राइवर उज्बेक में गपशप करते हैं और सड़क किनारे अफ्रीकी, एशियाई, यूरोपीय व लैटिन अमेरिकी भाषाएं एक साथ सुनाई देती हैं। रश्मिना गुरूंग ने पिछले सात वर्षों में सेके भाषा को सैकड़ों घंटों की रिकॉर्डिंग, लिप्यंतरण और शब्दकोश के रूप में दर्ज किया है।
न्यूयॉर्क जैसे शहरों में यह भाषाई प्रयोगशाला अब अपने सबसे नाजुक मोड़ पर है और अलगाव की शिकार हो रही है। पर अब भी वक्त है इस जीवित बेबेल को समझने, सराहने और बचाने का। न्यूयॉर्क की हर आवाज चाहे वह सेके हो, लनापे हो या यिडिश इस बात की गवाही देती है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि स्मृति, पहचान और अस्तित्व की धड़कन है। और जब तक यह शहर सांस लेता रहेगा, सात सौ भाषाएं भी उसकी धड़कनों में गूंजती रहेंगी।