ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को हुआ नुकसान
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इस घनाघात से पाक का वह झूठ भी बेनकाब हो गया कि वह आंतकवाद को नहीं पालता। यही नहीं, इस हमले में पाक सेनाध्यक्ष और पाकिस्तानी सेना के अहम पर भी करारी चोट की। जिसका बदला पाक सेना ने 9 मई को भारत में कई ठिकानों पर ड्रोन व मिसाइल हमले से लेने की कोशिश की, जिनमें से ज्यादातर नाकाम कर दिए गए। पाकिस्तान का यह हमला नाक भी अपनी बचाने की नीयत से ज्यादा किया गया था, जिससे भारत के दो एयरबेस को मामूली नुकसान पहुंचा।
उधर भारत के कामयाब एयर डिफेंस सिस्टम ने पाक सेना के तीन लड़ाकू विमानों को मार गिराया। इससे बौखलाए पाकिस्तान ने भारत पर 26 स्थानों पर ड्रोन हमले किए। इसके उत्तर में भारत की वायुसेना ने 10 मई के तड़के पाकिस्तान के 6 एयरबेस बर्बाद कर दिए। इस लड़ाई ने हमारे शस्त्रास्त्रों की सटीकता, कारगरता और प्रामाणिकता पर भी मोहर लगा दी। जबकि पाक के पास मौजूद ज्यादातर चीनी हथियारों की मारक क्षमता ने यही साबित किया कि उनमें और चीनी पटाखों में बहुत अंतर नहीं है।
सबसे बड़ी बात इस समूचे वार-पलटवार में भारत की रणनीति में एक बुनियादी शिफ्ट नजर आ रहा है। वो ये कि अब भारत उस पर हुए आंतकी हमलों का बदला लेने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय का मुंह नहीं ताकता बल्कि अमेरिका और इजराइल की तर्ज पर खुद ही काम तमाम करने में भरोसा रखता है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ इसी सोच का नतीजा है। यह ऑपरेशन भारतीय स्त्री के सुहाग के प्रतीक सिंदूर की अमिटता से ओत-प्रोत है और अभी खत्म नहीं हुआ है।
आतंक के खिलाफ भारत की लड़ाई
दूसरे, भारत ने यह लड़ाई अभी तक आतंक के खिलाफ ही फोकस की हुई है। लेकिन पाकिस्तान ने इसको विस्तार दिया तो उसके नतीजे गंभीर होंगे। भारत उसी अनुपात में बड़ा पलटवार करेगा। वैसे भी भारत ने इस संघर्ष को ‘आधिकारिक युद्ध’ की संज्ञा नहीं दी है, जबकि पाकिस्तान ने इसे अपनी तरफ से ‘युद्ध’ का नाम दे दिया है। तैयारी दोनों तरफ से है।
फर्क इतना है कि पाक का यह कृत्य उसके लिए आत्मघाती हो सकता है तो भारत के लिए अपना पौरूष दिखाने की घडी एक बार फिर से आन पड़ी है। उसे फिर से अर्जुन बनना पड़ेगा। वही होता भी दिख रहा है।
वैसे इक्कीसवीं सदी में जन्मी जन जेड के लिए दो प्रतिद्वंद्वी देशों के बीच तनाव का यह स्तर, भीषण युद्ध की पूर्व पीठिका के साथ देशभक्ति का ज्वार रोमांचित करने वाला है, क्योंकि उन्होंने पाक के साथ पुराने युद्धों की सिर्फ कहानियां सुनी हैं या फिर मोबाइल में डूबी आत्मकेन्द्रित जिंदगी को ही जिया है। राष्ट्र के लिए प्राणोत्सर्ग का इको सिस्टम उनके लिए कुछ अनोखा और कुतूहल से भरा है। जीवन और इतिहास की तल्ख सच्चाइयों से रूबरू कराने वाला है।
अब सबसे सवाल यह है कि इस लड़ाई का अंजाम क्या होगा? यह संघर्ष कहां जाकर थमेगा? या और बढ़ेगा? इन सवालों के उत्तर अभी भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन इसके संकेत पहलगाम हमले के बाद नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस सम्बोधन में खोजे जा सकते हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘समय सीमित है, लक्ष्य बड़े हैं।‘ बड़े लक्ष्य से क्या तात्पर्य है?
क्या पाकिस्तान के साथ जारी संघर्ष का अंजाम इतिहास के साथ-साथ भूगोल बदलने में भी होगा? क्योंकि भारत सरकार जिस व्यापक और बहुआयामी स्तर पर तैयारियां कर रही है, उससे यही लगता है कि पहलगाम के धमाके दूर तक सुनाई देंगे। यह अनुगूंज किस रूप में होगी? क्या भारत पाकिस्तान को झटका देकर रूक जाएगा या फिर पाकिस्तान में 1971 फिर से दोहराया जाएगा?
भारत और पाक के बीच विवाद के मूल में कश्मीर है। तो क्या अब कश्मीर के संदर्भ में 1947 में हुई राजनीतिक भूल को सुधारा जाएगा? निश्चित रूप से क्या होगा कहना मुश्किल है। मगर पाकिस्तान के लिए जो होगा, वो ऐतिहासिक होगा।
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