बुजुर्गों को अकेलेपन की नहीं शांति की जरूरत
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आप जिस द्वंद्व से गुजर रही हैं, वह केवल काम के बोझ का नहीं, बल्कि जीवन की उस अवस्था का भी है, जहां व्यक्ति अपने लिए कुछ शांति, सम्मान व निजी समय चाहता है। अक्सर भारतीय परिवारों में यह मान लिया जाता है कि सेवानिवृत्ति या वृद्धावस्था का अर्थ है कि माता-पिता घर और बच्चों की जिम्मेदारियों के लिए पूरी तरह उपलब्ध रहेंगे। लेकिन बढ़ती उम्र के साथ शरीर की अपनी सीमाएं होती हैं, जिन्हें नजरअंदाज करने की कीमत कभी-कभी स्वास्थ्य और मन की शांति से चुकानी पड़ती है। ऐसा लगता है कि आपके भीतर कहीं अपराधबोध भी है। आप शायद सोचती हों कि यदि आपने काम करने से मना किया या अलग रहने की इच्छा जताई, तो लोग इसे स्वार्थ समझेंगे। लेकिन अपनी क्षमता के अनुसार जीने की इच्छा स्वार्थ नहीं है।
जिस तरह आपके बेटे और बहू का अपना पेशेवर जीवन है, उसी तरह आपको भी अपने जीवन को अपनी जरूरतों के अनुसार जीने का अधिकार है। फिलहाल कोई बड़ा निर्णय लेने से पहले अपने मन की थकान और वास्तविक परिस्थितियों को अलग-अलग समझने की कोशिश कीजिए। कई बार हमें घर छोड़ने की नहीं, बल्कि अपनी भूमिका बदलने की जरूरत होती है। हो सकता है कि आप बच्चों के साथ कुछ समय बिताने को तैयार हों, लेकिन पूरे दिन की जिम्मेदारी उठाना आपके लिए कठिन हो। यह बात बेटे-बहू को स्पष्ट और शांत ढंग से बताई जा सकती है। लोग अक्सर हमारी सीमाएं तभी समझते हैं, जब हम उन्हें बिना शिकायत और बिना आरोप के व्यक्त करते हैं। यदि बातचीत के बाद भी आपकी जरूरतों को महत्व नहीं मिलता और लगातार दबाव बना रहता है, तब अलग रहने के विकल्प पर विचार करना उचित हो सकता है। लेकिन यह निर्णय नाराजगी में नहीं, बल्कि सोच-समझकर लिया जाना चाहिए।
अलग रहना तभी सुखद होता है, जब आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक जुड़ाव मौजूद हो। केवल शांति की तलाश में लिया गया निर्णय कभी-कभी अकेलेपन में भी बदल सकता है। अपने आप से एक प्रश्न पूछिए—यदि घर के काम की जिम्मेदारी कम हो जाए, तो क्या आप उसी घर में संतोषपूर्वक रह सकती हैं? यदि उत्तर 'हां' है, तो समस्या संबंधों में नहीं, अपेक्षाओं में है। यदि उत्तर 'नहीं' है और आपको सचमुच अपने लिए एक अलग जीवन-स्थान चाहिए, तो उस इच्छा को भी सम्मान दीजिए। जरूरी है कि परिवार आपकी सीमाओं, आपकी थकान और आपकी शांति की आवश्यकता को समझे। सम्मानजनक वृद्धावस्था कोई उपहार नहीं, बल्कि हर व्यक्ति का अधिकार है। अपनी एक रोजाना की दिनचर्या बना लें, जिसमें शारीरिक गतिविधि और रोज घर से बाहर निकल कर पड़ोस के लोगों से बातचीत जरूर शामिल हो। अपने लिए समय निकालें और अपने सामाजिक संपर्कों को जिंदा रखें। अपने पोते-पोतियों के साथ मजेदार गतिविधियों में शामिल होने की कोशिश करें। घर बदल कर अलग रहना आसान लगता है, पर अलग रहने की अपनी समस्याएं भी होती हैं। ध्यान रखिए, जो बुजुर्ग ओल्ड-एज होम में रहते हैं, वे अपने बच्चों और नाती-पोतों के साथ रहने का सपना देखते हैं।