मुकेश 27 साल का है और पिछले एक से भी ज्यादा साल से मेरी सोसायटी में गार्ड की नौकरी कर रहा है।
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मैं वापस फ्लैट की तरफ लौटा और भीतर से नया ज्ञानोदय और कथादेश पत्रिका लाकर उसे दे दी।' जब मैं डेढ़ घंटे बाद लौटा, तो सुमन पत्रिका खोलकर एक कहानी पढ़ रहा था। मैंने बस एक नज़र देखा और सीढ़ियां चढ़कर फ़्लैट की तरफ बढ़ गया। जबकि मैं सोचकर आया था कि उससे और ज्यादा बात करूंगा, लेकिन उसकी तन्मयता को देखकर मैंने डिस्टर्ब करना उचित नहीं समझा। शायद इसलिए कि मैं नहीं चाहता था कि कहानी में उसके पात्रों की लय गड़बड़ाए।
सुमन को देखते ही मुझे अचानक मुकेश की याद आ गई और मैंने रात में ही तय किया कि रविवार को जाकर उससे मिलूंगा। मैं जब आज मुकेश से मिलने गया, तो वो 'सेज पर संस्कृत' का आखिरी पेज पलट रहा था। मुझे देखते ही पहचान गया और मैंने भी पूछ डाला कि उपन्यास खत्म हो गया। उसने कहां- हां सर बस आखिरी पेज है। एक हफ्ते में ही पढ़ डाला।
मुकेश 27 साल का है और पिछले एक से भी ज्यादा साल से मेरी सोसायटी में गार्ड की नौकरी कर रहा है। उसने बताया कि बिसरख के पास अपने एक रिश्तेदार के साथ झुग्गी में रहता है। बदायूं का रहने वाला है। परिवार की आर्थिक तंगी की वजह से बारहवीं से आगे नहीं पढ़ पाया।
दीदी की शादी के बाद पिता पर कर्ज को बोझ चढ़ गया था इसलिए, नौकरी के लिए घर से बाहर निकलकर शहर की तरफ आ बढ़ा। गांव में आठ-नौ बीघा जमीन है। अब परिवार की आर्थिक स्थिति एकदम ठीक है। पर पढ़ाई जो एक बार छूट गई तो छूट ही गई। लेकिन साहित्य पढ़ने के साथ ही गाने का भी बहुत शौक है।
साहित्य के असल पाठक ये ही हैं
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मैंने उससे पूछा कैसा लगा उपन्यास? ' यह उपन्यास बेहद मार्मिक है, सर। इसे पढ़ते हुई कई बार मेरी आंखों में आंसू तक छलक आए। किसी भी उपन्यास और कहानी को ऐसे पढ़ना चाहिए कि उसके किरदार आंखों के आगे दिखाई दे।
मैंने पूरी लगन से इसे पढ़ा और संघमित्रा और छुटकी मेरी आंखों के आगे-आगे चलने लगे।' वह एक ही सांस में पूरी बात कह गया। मैं मुकेश की बातों को बड़े ही ध्यान से सुनते गया। उसके मन में धर्म के नाम पर होने वाले कर्मकांडों के प्रति रोष था। अचानक उसने मुझसे कहा- 'सर इस उपन्यास की तरह ही हर व्यक्ति के जीवन की कहानी होती है।'
मैंने उसके पास खड़े रहकर उसकी कहानी सुनी जिसे मैं लिखना नहीं चाहता। हर व्यक्ति के जीवन की एक त्रासदी होती है जो निजी होती है। अक्सर कंधा खोजने के लिए व्यक्ति उन त्रासदियों को भावुकता से कह डालता है। मैंने मुकेश से बस इतना कहा कि अगर उसे पढ़ने का इतना ही शौक है, तो आगे की पढ़ाई ओपन से जारी रख सकता है। उसने बस हां मैं सिर हिलाया।
मुकेश और सुमन जैसे व्यक्तियों से मुझे इसलिए मोहब्बत होती है, क्योंकि साहित्य के असल पाठक ये ही हैं। कविता, कहानी और किस्से इनके ही संघर्षों से निकलती है। इनकी जिजीविषा सम्मान की हकदार है। बड़ी-बड़ी गगनचुंबी इमारतों में रहने का मतलब, स्नेह, प्रेम व सम्मान का खत्म होना नहीं होता। पैसा और समृद्धि अभिमान खरीद सकती है, मनुष्यता और सहजता नहीं।
पुनश्च:
सुमन से बात करना बाकी है। मैं जरूर उससे पूछूंगा कि उसको इन पत्रिकाओं में क्या अच्छा लगा। किताबों का होना, किताबों को बांटने व उन पर संवाद करने का अपना ही सकूं है, जो इजहार नहीं किया जा सकता।
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