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न्यू पुलिसिंग का मंत्र: ''सज्जनों के साथ पुष्प सा कोमल, दुष्टों के साथ वज्र सा कठोर''

सार

एसआई भागवत प्रसाद पाण्डेय का मानना है कि लाठी मारकर आप लोगों को डरा सकते हैं, इसमें दोबारा उसके गलती करने की आशंका होती है, पर बोली से समझाना दिल तक असर करता है। लाठी एलोपैथी है और बोली होम्योपैथी, दूसरी वाली का प्रभाव पहली वाली से भले ही थोड़ी देर से होता है पर टिकता लंबा है। 
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सूबेदार भागवत प्रसाद पाण्डेय - फोटो : Amarujala
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विस्तार
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'गर्व' और 'दबंग' में सलमान खान और ओटीटी के इस जमाने में आईपीएस नवनीत सिकेरा के फिल्मी किरदार वाले वेबसीरीज 'भौकाल' जैसे रील लाइफ के पुलिस अफसरों को छोड़ दिया जाए तो पुलिस का नाम सुनते ही आपके मन मस्तिष्क में कैसे छवि बनती है? एक अनफिट शख्स, शर्ट का बटन तोड़ बाहर आने को आतुर पेट, बड़ी मूंछें और लुक से इतर इंसान होते हुए भी क्रूरता का पर्याय एक वर्दीधारी व्यक्ति जो बिना बात के किसी को भी लाठी मार देता है, गरीबों को परेशान करता रहता है, भ्रष्टाचार जिसका नौकरी के साथ-साथ चलने वाला दूसरा काम है।

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पर, क्या आपने सूबेदार भागवत प्रसाद पाण्डेय को देखा? इनका व्यक्तित्व और काम करने का तरीका, पुलिस को लेकर आपके मन में बनी छवि से बिल्कुल उलट है। एमपी पुलिस (जिला सीधी) में दारोगा भागवत प्रसाद पाण्डेय को सोशल मीडिया पर आपने जरूर देखा होगा। ये वीडियो देखिए आप इनके बारे में बेहतर समझ पाएंगे...



यातायात विभाग में कार्यरत भागवत पाण्डेय, अपने ठेठ देसी अंदाज में लोगों को समझाते हैं, हंसी-मजाक करते हैं, लोगों से प्रेम से पेश आते हैं

इनका मानना है कि लाठी मारकर आप लोगों को डरा सकते हैं, इसमें दोबारा उसके गलती करने की आशंका होती है, पर बोली से समझाना दिल तक असर करता है। लाठी एलोपैथी है और बोली होम्योपैथी, दूसरी वाली का प्रभाव पहली वाली से भले ही थोड़ी देर से होता है पर टिकता लंबा है। 
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इनके पुलिसिंग का अंदाज निराला है, कुछ वैसे जैसे दबंग फिल्म में चुलबुल पाण्डेय का। भागवत प्रसाद पाण्डेय रियल लाइफ के चुलबुल पाण्डेय हैं।

'' जनता के लिए सरकार का मतलब पुलिस''

सरकारें, राजधानी में बैठकर विकास के लिए योजनाएं बनाती हैं, क्षेत्रीय स्तर पर विधायक-सांसद के रूप में सरकारों के प्रतिनिधि होते हैं, पर आम जनता के लिए इनतक सहज पहुंच अब भी कठिन है, ऐसे में प्राथमिक स्तर पर लोगों के लिए सरकार का मतलब पुलिस ही होता है।
 
भागवत पाण्डेय कहते हैं, हमारे मौलिक अधिकारों की रक्षा हो, इसके लिए पुलिस की तैनाती की गई है। कोई शिकायत लेकर अगर आप थाने पहुंचें और अधिकारी आपकी बिना बात सुने-बिना संतोषात्मक कार्रवाई के आपको वहां से भगा दें (जैसे अक्सर ग्रामीण स्तर पर लोगों की पुलिस से शिकायत रहती है) तो इसके दो प्रभाव होते हैं। पहला- प्रताड़ित करने वाला निडर हो जाता है कि कुछ भी करो पुलिस कुछ करेगी नहीं और दूसरा आपके मन में पुलिस को लेकर खीझ वाली भाव बनती है।

वहीं नैतिक तौर पर अगर प्राथमिक स्तर पर पुलिस दोनों पक्षों को बुलाकर समझा दे तो इससे न सिर्फ पुलिसिंग पर भरोसा बढ़ता है, साथ ही यह छोटा सा प्रयास अप्रत्यक्ष तौर पर भविष्य में किसी बड़े घटना को रोकने के लिए अपने आप में काफी है।

हमारी टीम के साथी न्याय-यातायात दोनों व्यवस्था में इस बात पर गंभीरता से ध्यान दे रहे हैं। पुलिस की छवि सुधार के लिए यह सबसे पहली कड़ी है। कोरोना काल ने इस तरीके को और बेहतर ढंग से समझाने में मदद की।

भागवत प्रसाद पाण्डेय परिवार के साथ - फोटो : Amarujala

कोरोना का दहशत और जीवन की सीख

कोरोना का पहला दौर सभी के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है, हम एक अनजान-अनदेखे दुश्मन से मुकाबला कर रहे थे। भागवत प्रसाद पाण्डेय इसी दौरान सोशल मीडिया के माध्यम से पहली बार चर्चा में आए। जिस समय कोरोना के डर के कारण हम सभी घरों में कैद थे, भागवत पाण्डेय ने लोगों के बीच जाकर मास्क और जरूरत के सामान पहुंचाएं। इससे इतर, विपरीत परिस्थितियों में उनका लोगों से बात करने का अंदाज और घरों में ही रहने का आग्रह ध्यानाकर्षण वाला था।



भागवत पाण्डेय बताते हैं, ''कोरोना के दौरान हमने 'पंखा चलता रहे, चूल्हा जलता रहे' टैगलाइन के साथ अभियान चलाया जिसमें लोगों से आग्रह किया गया कि आप घरों में रहिए, जो भी जरूरी सामान हो वो हम आपतक पहुंचाएंगे। इसकी कामयाबी ये रही कि बिना किसी दंड-सख्ती किए भी लोग अपने घरों में रहे और ऐसे विकट समय को हमने आसानी से काट लिया।

कोरोना के हालात ने मेरी इस सोच को और मजबूती दी कि आप बिना लाठी के भी लोगों को कंट्रोल कर सकते हैं, बस उनके दिलों में जगह बनाइए, सबकुछ आसानी से हो जाएगा।'

यातायात विभाग में होने के नाते मेरा ज्यादातर वक्त परिवहन सुधार में बीतता है, इस दौरान भी मेरा और टीम का यही लक्ष्य होता है कि राह चलने वाले परेशान न हों बल्कि उन्हें समझाया जाए कि उनकी लापरवाही उन्हीं पर भारी पड़ सकती है। पर वर्षों से चले आ रहे पुलिसिंग तरीके के चलते पुलिस-जनता के बीच थोड़ी दूर जरूर है, जिसे ठीक किया जा रहा है।
 

चेकिंग लगाने का मतलब टारगेट पूरा करना नहीं

एसआई भागवत पाण्डेय कहते हैं, पुलिसिंग को लेकर लोगों में कई प्रकार की भ्रांतियां हैं, इसकी मुख्य वजह यह है कि कुछ वर्षों पहले तक पुलिस, आम लोगों से सीधे मुंह बात नहीं करती थी, ऐसे में संवाद की कमी के कारण लोगों के मन में कई तरह की गलत अवधारणाओं ने जन्म ले लिया। उसमें से एक यह भी है कि कहीं अगर चेकिंग लगी है तो इसका मतलब पुलिस वालों को चालान काटने का टारगेट दिया गया है। जबकि यह बिल्कुल ऐसा नहीं है।

चेकिंग टारगेट का मतलब असल में यह होता है कि अगर आप 2-3 घंटे गंभीरता से वाहनों की चेकिंग कर रहे हैं तो निश्चित ही उसमें 10-20 वाहन ऐसे मिलेंगे जो नियम तोड़ रहे होते हैं। उनपर कार्रवाई और चालान के डर से बाकी लोग भले ही कुछ दिनों के लिए ही सही, पर नियमों का पालन करने लगते हैं। इसी तरह अलग-अलग क्षेत्रों में चेकिंग लगाकर एक स्तर पर यातायात नियमों का पालन सुनिश्चित कराने की कोशिश की जाती है।

भागवत पाण्डेय कहते हैं, दुनिया की कोई भी पुलिस यातायात नियमों का पालन नहीं करा सकती है, यह व्यक्ति का स्वविवेक और समझ है कि वह स्वयं इसका पालन करे। हेलमेट और सीटबेल्ट आपकी ही सुरक्षा के लिए हैं, आप नहीं लगाएंगे तो दुर्घटना में चोट आपको ही लगेगा। इसे पुलिस से बचने के लिए नहीं बल्कि अपनी जान बचाने के लिए प्रयोग में लाएंगे तो ज्यादा बेहतर होगा। 

 
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भागवत प्रसाद पाण्डेय और टीम - फोटो : Amarujala

गाड़ियों पर 'प्रेस, एडवोकेट' मत लिखाइए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता

अक्सर आपने भी गाड़ियों पर प्रेस-एडवोकेट लिखा देखा होगा, इसके पीछे सोच ये होती है कि चेकिंग के दौरान पुलिस इन्हें छोड़ देगी या चालान नहीं काटेगी। पर असल में ये सोच सुरक्षात्मक कम हास्यास्पद ज्यादा है। भागवत पाण्डेय कहते हैं, अगर आप नियमों का सही तरीके से पालन कर रहे हैं, गाड़ी के दस्तावेज, लाइसेंस, हेलमेट और सीटबेल्ट लगाकर सही गति से चल रहे हैं तो इतना ही आपके लिए काफी है। चालान उनका भी कटता है जो गाड़ियों पर शक्ति प्रदर्शन करते हैं।

भागवत पाण्डेय एक मामले का जिक्र करते हुए बताते हैं कि एक बार राज्यसभा सांसद की गाड़ी का भी उन्होंने चालान काटा था, अगला दिन रविवार होने के कारण गाड़ी दो दिन थाने में रही। नियम सभी के लिए हैं, वह कोई भी हो। सभी को इसका पालन भी करना चाहिए। दुर्घटना, गाड़ियों पर चस्पा आपकी शक्ति देखकर नहीं टलेगी।

भागवत पाण्डेय ने निश्चित तौर पर पुलिस को लेकर लोगों के मन में बनी 'क्रूर अवधारणा' में बदलाव किया है। उनके निराले और शायराना अंदाज के लोग कायल हैं। कविता लिखने और पढ़ने का शौक रखने वाले भागवत जी का ये अवतार उनके वीडियो में भी अक्सर दिख जाता है।



स्वस्थ समाज के लिए न्याय व्यवस्था का चुस्त होना आवश्यक है, इसके लिए सख्ती जरूरी है, पर सख्ती में स्नेह का जो मिश्रण भागवत पाण्डेय जी करते हैं, वह सभी पुलिस साथियों के लिए सीखने और व्यवहार का विषय है। ऐसा करके न सिर्फ आप आमजन के असली हीरो बनते हैं, साथ ही व्यवस्था को भी सहज बनाते हैं।

आप सभी को भागवत जी की लिखी एक कविता के साथ छोड़ जाते हैं। कभी कोई पुलिस गलत व्यवहार करे तो उन्हें भागवत पाण्डेय का उदाहरण दीजिएगा।

अदब से काम लेने का सलीका छोड़ मत देना।
पुराने वक्त से रिश्ता पुराना तोड़ मत देना॥
न भूलो क्या थे,कैसे थे,कहां थे तुम कभी हरगिज।
तुम्हे जो प्यार करते हैं दुखाना न किसी का दिल।
ऊंचाई, कामयाबी से न बदले शख्सियत तेरी।
मेरे भाई तेरे खातिर दुआ है बस यही मेरी॥
ऊंचाई लाख हो लेकिन न भूलो बात ए ऊंची।
कोई काबिज नहीं रहता हमेशा ही मुकामों में॥
जमीं पर ही जगह मिलती है प्यारे ठौर मिलता है,
परिंदे तक जगह पाते नहीं हैं आसमानों में।




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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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