प्रत्येक स्तर पर लगभग पूरी शैक्षणिक व्यवस्था तात्कालिक है, कामचलाऊ और तदर्थ वास्तव में निरर्थक तथा निष्पक्ष- सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
कानूनी तौर पर वांछित संसाधनों से रहित शैक्षणिक संस्थानों, बहुतायत में धन संचय में तल्लीन अमेधावी शिक्षकों, अयोग्य छात्रों, पाठ्यक्रमों एवं अधिकांश रूप में प्रयुक्त अव्यावहारिक शिक्षा व्यवस्था ने राष्ट्र का जो शैक्षणिक तथा अनुसन्धानात्मक परिदृश्य नवीन शिक्षा नीति के नियामकों के समक्ष प्रस्तुत किया है, वह भ्रामक व चिंताजनक है। इस दुखद स्थिति के निवारण का उपाय क्या है?
प्रत्येक स्तर पर लगभग पूरी शैक्षणिक व्यवस्था तात्कालिक है, कामचलाऊ और तदर्थ वास्तव में निरर्थक तथा निष्पक्ष। प्रत्येक सरकार ने भारी संख्या में सृजित पदों को रिक्त रखते हुए तदर्थ बहालियों को प्रोत्साहित किया है। पहले अपने कृपा पात्रों को नियुक्त कर रखा है, फिर उनका नियमितीकरण, तत्पश्चात उनकी कालबद्ध प्रोन्नति। मेधा क्षत-विक्षत है। तरह-तरह के दंश झेल रही इस दुव्र्यवस्था का क्या उपचार है?
समस्त कोटि के विश्वविद्यालयों एवं शिक्षण-संस्थाओं की प्रबंध-समितियों में सरकारी हस्तक्षेप के चलते नामजद प्रतिनिधियों का वर्चस्व बना रहता है। स्वायतत्ता के नाम पर सरकारी अधीनता स्थापित है, सरकार के हाथ में अपार वित्तीय एवं प्रशासकीय अधिकार संरक्षित हैं और सर्वोच्च पदाधिकारीगण इसके हाथों के कठपुतले तथा क्रीतदास।
आरक्षण का कानूनी प्रावधान व शिक्षा माफिया का दबाव, परिसर में अराजक तत्वों का दबदबा, छात्र व शिक्षक संघों का विनाशकारी प्रभाव तथा शीर्ष पदों पर आसीन प्राधिकार ने सारे अकादमिक परिदृश्य का सर्वनाश कर रखा है। इस विषम परिस्थिति का तत्काल तथा स्थायी समाधान खोजे बिना नवीन शिक्षा नीति को व्यावहारिक स्वरूप किस तरह प्रदान किया जा सकता है?
देश के तथाकथित श्रेष्ठ केंद्रीय विश्वविद्यालयों सहित तमाम प्रख्यात तकनीकी व प्रबंधन संस्थानों में से किसी की भी गिनती विश्व स्तर पर नहीं होती है जबकि प्रायः मृत्युपर्यन्त वहां अनेकानेक निहायत मानद पदों पर विशिष्ट सम्मानकी व सुविधाओं के साथ इमेरिटस प्रोफेसर काबिज रहते हैं। इस दुरह परिस्थिति का आकलन किस तरह किया जाएगा? इनके शोध-कार्यों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मूल्यांकन क्यों नहीं किया जाता? यह सब कब होगा, कैसे होगा और इसे करेगा कौन?
इसका लेखक के पास पर्याप्त अनुभव एवं प्रमाण है, जिसकी बुनियाद पर उसने लंबे अरसे तक देश के कुछ सर्वश्रेष्ठ शिक्षण व शोध संस्थानों में हुए भ्रष्टाचार के मामलों, उनकी कार्यप्रणालियों सहित नानाविध चयन समितियों का गहन अध्ययन किया है।
कुछेक प्रसंगों में तो लेखक ने लोकसभा की याचिका समिति के समक्ष, तो कुछ को उच्च तथा सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष भी रखा है। उसे संतोष है कि सर्वथा कदाचार के गैरकानूनी मामलों में उसका मूल्यांकन हमेशा सौ फीसदी सही एवं दुरुस्त साबित हुआ है।
नवीन शिक्षा नीति में क्या ऐसी कोई कानूनी व्यवस्था है जिसके अंतर्गत कसूरवार प्राधिकार को विधि व्यवस्था को भंग करने वाले अधिकारियों को दंडित किया जा सके? लेखक का सप्रमाण यह निष्कर्ष है कि समस्त प्रकरणों में कदाचार की गंगोत्री शिखर पदों पर आसीन प्राधिकार की कलम से ही निकली है, चाहे वह मंत्री हो या कुलपति, सचिव हो या स्वयं निदेशक।
देखना है कि शिक्षा मंत्रालय किस रूप में समस्त घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत धन अपने प्रयोजन के लिए उपलब्ध कराता है? नौकरशाही और राजनीतिक नेतृत्व की मिलीभगत ने पूरे देश के तमाम विकासक्रम को बाधित किया है।
अब देखना है कि आकस्मिक तौर पर वर्तमान में उच्च शिक्षा से संदर्भित इस दूषित परिदृश्य को ये दोनों कारक तत्व किस तरह परिमार्जित करने में सहायक सिद्ध होंगे? यह भी देखना है कि सर्वोच्च स्तरीय समस्त पाठ्यक्रम निर्धारित समिति सहित भारतीय शिक्षा आयोग, राष्ट्रीय अनुसंधान संगठन और अन्यान शिखर स्तरीय समितियों के गठन में किस तरह के मानद विद्वानों एवं चिंतकों का निर्विवाद योगदान प्राप्त किया जाएगा?
प्रस्तुत शिक्षा नीति उच्च शिक्षा से सम्बद्ध संपूर्ण प्रबंधन एवं संचालक मंडल के गठन के बारे में पूर्णतः खामोश है। इनके कार्यों का मूल्यांकन किस तरह होगा? दलीय प्रतिबद्धता, वैचारिक पूर्वाग्रहों एवं राजनीतिक प्रभुत्व के आभामंडल से अप्रभावित रहने वाले राष्ट्रप्रेमी तथा शिक्षाप्रेमी एवं प्रकांड विद्वतजनों की खोज आसान उपक्रम नहीं है।
अब तक का अनुभव तो यही बताता है कि शीर्ष पदों पर नियुक्ति, पाठ्यक्रम निर्धारण व लेखन, चयन समिति व विश्वविद्यालय के शाषी निकाय का गठन सरकारी तंत्र के कुचक्रों के चक्रव्यूह से निकल ही नहीं पाया है। मूल्यांकन से लेकर नामांकन, नियुक्ति से लेकर प्रोन्नति - कोई भी प्रक्रिया दोष मुक्त किए बिना क्या नवीन शिक्षा नीति कारगर साबित होगी?
देखना होगा कि व्यावहारिकता की कसौटी पर यह किस तरह धरातल पर उतरती है? शुरुआत तो होने दीजिए।
लेखक लंबे समय तक मॅास्को, लंदन, हल, ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड और जेएनयू से सम्बद्ध रहे हैं। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में इतिहास विभागाध्यक्ष भी रहे हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।