सुभाषचंद्र बोस के विचार
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रोमां रोलां से मुलाकात
सुभाष बाबू की यथाशीघ्र भारत की आजादी हासिल करने की बेचैनी उन्हें किस कदर परेशान कर रह थी और जाने-अनजाने उन्हें जिस निष्कर्ष पर पहुंचा रही थी, उसकी एक बानगी सुपरिचित मनीषी- विचारक, भारत प्रेमी और नोबेल पुरस्कार विजेता फ्रांसीसी विद्वान रोमां रोलां के साथ उनकी अप्रैल 1935 में हुई मुलाकात में भी सामने आती है।
रोमां रोलां से सुभाष बाबू यह बताने की चेष्टा करते है कि भारत में गांधी के नेतृत्व में चल रहा अहिंसक आंदोलन किस कदर निर्जीव हो चला है। अगर भारत को स्वतंत्रता हासिल करना है, तो मौजूदा नेतृत्व को हटाना ही पड़ेगा। रोमां रोलां बताते है कि यह बात सुभाष बाबू भी ठीक से जानते है कि सशस्त्र युद्ध में भारत बहुत दिनों तक ब्रिटेन का मुकाबला नहीं कर पाएगा। फिर भी उन्हें आशा थी कि अगर यूरोप में युद्ध छिड़ जाए और इग्लैंड में कोई विदेशी शक्ति अधिकार कर लें, तो उस समय वह भारत की स्वाधीनता के लिए उसकी सहायता कर सकता है।
जब रोमां रोलां ने सुभाष बाबू को बताया कि इस तरह की कोई इच्छा हम लोगों के मन में नहीं हैं, तो वे थोड़े निराश हुए। महात्मा गांधी और सुभाष बाबू के विचारों के बीच यह मौलिक भेद ही भारत की आजादी के दो दीवाने को अन्य और बातों के अलावा दो भिन्न रास्ते पर ले गई, जिसका पूरा विवरण महात्मा गांधी और सुभाष बाबू के बीच हुए तमाम पत्र व्यवहारों में भी दृष्टिगोचर होता है।
द्वितीय विश्वयुद्ध और देश की राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव
एक सितंबर 1939 को यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध शरू होने के बाद भारत में भी राजनीतिक परिस्थितियों में बड़ी तेजी से बदलाव आया। महात्मा गांधी पर कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं का दबाव बढ़ रहा था कि वे इस युद्ध में मित्र राष्ट्रों को अपना समर्थन घोषित करें, पर महात्मा गांधी यह भली भांति जानते थे कि भारत के लिए जितना खतरा फासीवाद से है, उससे कम खतरा ब्रिटिश साम्राज्यवाद से नहीं है।
उधर नेताजी सुभाषचंद्र बोस अंग्रेजों की नजरबंदी से फरार होकर फासीवादी ताकतों की सहायता से भारत को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराने के मकसद से जापान के सैन्य सहयोग से रंगून पर फतह करते हुए इम्फाल तक पहुंचने में कामयाब हो गए। पर कई बार इतिहास में ऐसे क्षण आते हैं जब तमाम सैन्य ताकत, रणनीतिक कौशल और दुःसाहस धरी की धरी रह जाती हैं और परिस्थितियां पूरे घटनाक्रम को दूसरा ही मोड़ दे देती है।
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के साथ और कहना चाहिए कि महात्मा गांधी के साथ भी नियति ने कुछ ऐसा ही खेल किया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस आजाद भारत का सवेरा देखने के पहले ही गुमनाम हो गए और महात्मा गांधी के मौत की कीमत पर भारत को गांधी के सपनों की आजादी हासिल नहीं हुई।
भारत की आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर यह सबक लेने का भी अवसर है कि देश की आजादी के संघर्ष में कई बार सफलता की कहानी को अकसर याद किया जाता हैं। पर असफलताएं भी ऐसे कई दृष्टांत छोड़े जाती हैं, जिससे आने वाली पीढ़ियां युग-युगांतर तक प्रेरणा लेती रहेगी।
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के राजनीतिक जीवन संघर्ष का भी एक पहलू ऐसा भी है, जहां वे खुद दावा करते हैं कि-सफलता हमेशा असफलता के स्तम्भ पर ही खड़ी होती है।
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