लोकतांत्रिक देश होने के साथ-साथ जिस पड़ोसी नेपाल के साथ हमारा रोटी-बेटी का रिश्ता रहा हो, उस नेपाल की संसद को धू-धू जलते देखना बेटी का मायका अपनी आंखों से राख में बदलते देखने जैसा है। जो हुआ और हो रहा है, वह इस बात की चेतावनी है कि अगर जनता अपनी वाली पर आ जाए तो कोई माई का लाल सत्ता और सत्ताधीशों को नहीं बचा सकता।
भारत और उसके तीन पड़ोसी देशों में बीते दो वर्षों में सत्ता परिवर्तन का जो तरीका रहा है, उसमे एक खास पैटर्न, आक्रोश की अभिव्यक्ति का तरीका, सत्ता परिवर्तन और उसके बाद की स्थितियों को देखना जरूरी है। इन तीनों मामलों में नायक जनता थी, भले ही उसके पीछे कुछ धूर्त विदेशी या स्वदेशी शक्तियां रही हों। मुद्दे कमोबेश समान ही थे।
लोग जनप्रतिनिधियों के भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, अपनो को रेवड़ी बांटने, बेरोजगारी, महंगाई और सत्ता द्वारा जनता का मुंह बंद करने की चालों से भड़के हुए थे।
श्रीलंका से हुई शुरुआत
इसका पहला लावा श्रीलंका में फूटा, जहां आम लोगों ने राष्ट्रपति भवन लूट लिया और राष्ट्रपति को देश छोड़ने पर विवश किया। बांग्लादेश में छात्रों की नाराजी से शुरू हुआ आंदोलन इस्लामिक कट्टरपंथियों ने हाई जैक कर अपने ही राष्ट्रपिता की प्रतिमाएं तोड़ डालीं। विरोधियों और हिंदुओं के घर जला दिए। अब नेपाल में जनाक्रोश इससे भी एक कदम आगे जाकर उस लोकतंत्र के मंदिर को ही जला बैठा है, जहां जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को भेजती रही है। जहां से नेपाल का समूचा तंत्र नियंत्रित होता है।
लोगों का गुस्सा अपनी जगह है, लेकिन इसकी परिणति संसद को चिता में तब्दील करने में हो तो यह हर लोकतांत्रिक मन को खिन्न करने वाला है। अब सवाल यह है कि नेपाल के युवा और बाकी जनता संसद को ही खत्म करने पर खुश है तो वह चाहती क्या है? क्या राजशाही की वापसी? क्या फिर कोई निरंकुश सत्ता अस्तित्व को न्यौता?
अगर वह एक ओली की जगह किसी दूसरे ओली की आस में सड़कों पर निकली है तो जिस बदलाव की उम्मीद वह पाले हुए है, वह कैसे पूरी होगी? बांग्लादेश में आंदोलन की आड़ में छात्रों को कैसे ठग लिया गया, हम देख रहे हैं।
कई सवाल जिसके जवाब आने बाकी
सवाल यह भी है कि आखिर नेपाल के युवाओं का मात्र 16 साल में लोकतांत्रिक व्यवस्था पर से इतना विश्वास क्यों उठ गया? इसका एक कारण तो यह है कि नेपाल में बहुदलीय लोकतंत्र अचानक ही आ गया। हालांकि भारत की आजादी के बाद नेपाल में राणाओं के सामंती शासन के खिलाफ जनता ने आवाज उठाना शुरू कर दिया था। बाद में राजा ने अपने हाथ में सत्ता ले ली और संवैधानिक राजतंत्र चलाने की कोशिश की।
नेपाल की जनता तब भी बहुत सुखी नहीं थी और लोकतंत्र के नाम पर वहां जो मजाक डेढ़ दशक से चल रहा था, उसने लोगों का लोकतंत्र से पूरी तरह मोहभंग कर दिया। हालांकि राजतांत्रिक नेपाल में लोकतंत्र लाने की कोशिशों में भारत की भी अहम भूमिका रही है। लेकिन लोकतंत्र को लागू करने और उसे आत्मसात करने के पहले जिस तरह के सामाजिक जागरण, उदात्त और परिपक्व सोच तथा लोकतांत्रिक साक्षरता की जरूरत होती है, नेपाल में वह उतनी शिद्दत से कभी नहीं हुई। क्योंकि लोकतंत्र भी धीरे धीरे परिपक्व होता है।
नेपाल में राजशाही को हटाने के लिए लोकतांत्रिक आंदोलन और कम्युनिस्टों के सशस्त्र विद्रोह जैसे कई प्रयास समय-समय पर होते रहे, लेकिन नेपाल के सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक अंतर्विरोधों के कारण ज्यादा सफल नहीं हो पाए। वहां पारिवारिक अंतर्कलह के कारण राजतंत्र का खात्मा भी एकाएक हो गया।