क्या अब लोकतंत्रों का भविष्य सड़कों पर अराजकता से तय होगा? यह प्रश्न इसलिए उठ रहा है, क्योंकि श्रीलंका, बांग्लादेश के बाद भारत के सबसे करीबी पड़ोसी नेपाल में युवाओं का आक्रोश फूट कर संसद तक पहुंच गया है। संसद में घुसकर युवाओं ने आग लगाई है। पैटर्न श्रीलंका और बांग्लादेश वाला है। नेपाल की घटना को हल्के में नहीं लिया जा सकता है।
नेपाल में पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक अस्थिरता चली आ रही है। वहां सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे हैं। अब सोशल मीडिया साइट्स पर बैन ने जनता के गुस्से पर आग में घी डालने का काम किया है। भारत को अपने पड़ोस की इन गतिविधियों को लेकर अति सतर्क रहने की आवश्यकता है।
नेपाल में सोशल मीडिया पर बैन को लेकर प्रदर्शन
पहले नेपाल के घटनाक्रम को समझते हैं। नेपाल सरकार ने पिछले सप्ताह 3 सितंबर को सोशल मीडिया की 26 साइट्स पर बैन लगाने का फैसला किया था, जिनमें युवाओं में बेहद प्रचलित फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब भी शामिल हैं। दरअसल, नेपाल के संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय का स्पष्ट कहना था कि इन प्लेटफॉर्म्स ने मंत्रालय में रजिस्ट्रेशन नहीं कराया है। सभी को 28 अगस्त से 7 दिन की समय सीमा दी थी, जो 2 सितंबर को खत्म हो गई।
जैसे ही सोशल साइट्स पर बैन लगा, जेनरेशन जेड (16 से 30 साल) के युवा 8 सितंबर को राजधानी काठमांडू की सड़कों पर उतर आए, जिनकी संख्या 12,000 से अधिक बताई जा रही है। इन्होंने संसद में घूसकर जमकर बवाल काटा। सेना की फायरिंग में 16 से ज्यादा युवाओं की मौत हो गई है।
'सोशल मीडिया नहीं भ्रष्टाचार रोको' के नारे
नेपाल में युवा 'Stop the ban on social media, stop corruption not social media' (सोशल मीडिया से रोक हटाओ, सोशल मीडिया नहीं भ्रष्टाचार रोको) नारे लगा रहे हैं। नेपाल में पिछले कुछ दशकों में राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार और लोकतांत्रिक हताशा को स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। जब से नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना हुई है, तब से 13 प्रधानमंत्री आए-गए हैं।
देश भ्रष्टाचार, आर्थिक मंदी, बेरोजगारी और कमजोर सार्वजनिक सेवाओं से गुजर रहा है। राजशाही और हिंदू राष्ट्र की पुनर्स्थापना की मांग को लेकर भी नेपाल में सरकार के विरोध में प्रदर्शन चल रहे हैं। बीते मार्च-अप्रैल में इन प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया था।
पहले भी सरकारों के खिलाफ प्रदर्शन
वर्ष 2011 में अरब स्प्रिंग के दौरान कई अरब देशों में सरकारों के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन हुए थे। वहां भी भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और आर्थिक संकट बड़े मुद्दे थे। अब एशिया में जैसे प्रदर्शन हो रहे हैं, उन्हें एशिया स्प्रिंग कहा जा सकता है। श्रीलंका में जुलाई 2022 में युवाओं ने श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे को सत्ता से बेदखल कर दिया था। राष्ट्रपति भवन में घुसे प्रदर्शनकरियों ने वहां लूटपाट तक मचाई थी। पिछले वर्ष अगस्त में बांग्लादेश में शेख हसीना को प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़कर अपनी जान बचाने के लिए भारत भागकर आना पड़ा था।
विश्वविद्यालय के छात्रों के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री आवास को लूट लिया था। तब से आज तक बांग्लादेश में स्थिरता नहीं आई है। अल्पसंख्यक हिंदू-बौद्धों पर हमले हो रहे हैं। अस्थाई सरकार ने भले वहां चुनाव की घोषणा कर दी है, लेकिन असंतोष बरकरार है। इंडोनेशिया में पिछले सप्ताह सांसदों की सैलरी बढ़ाने पर प्रदर्शन शुरू हो गए थे।
प्रदर्शनकारियों ने संसद को जला दिया। पाकिस्तान में 9 मई 2023 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान के समर्थकों ने कई शहरों में उत्पात काटा था और सेना के कार्यालयों तक को आग लगा दी थी।
भारत पर क्या होगा इसका असर
क्या भारत पर इन प्रदर्शनों का असर होगा? क्योंकि यहां पर भी पिछले कुछ वर्षों में ऐसी कोशिशें बार-बार देखने को मिल रही हैं। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ देशभर में जिस तरीके से सड़कों को रोका गया। राजधानी दिल्ली में शाहीन बाग समेत देश के कई शहरों में सड़कें लंबे समय तक रोके रखी गईं। किसान आंदोलन के समय दिल्ली को चारों तरफ से ब्लॉक कर दिया गया था। प्रदर्शनकारी लाल किले तक पहुंच गए थे।
आए दिन भारत में ऐसे प्रयास करने की कोशिशें होती नजर आती हैं। जेल में बंद शरजील इमाम, जिसकी जमानत याचिका को हाल में हाईकोर्ट ने निरस्त किया है, उसने तो सीएए के समय उत्तर पूर्वी राज्यों को चिकन नेक (सिलीगुड़ी) को ब्लॉक कर बाकी देश से काटने का भड़काऊ भाषण दिया था। ऐसे मंसूबे बाकी अराजक तत्व नहीं पाल रहे होंगे, ये कहना मुश्किल है।
भारत बड़ा लोकतांत्रिक देश है, लेकिन जैसा श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में देखने को मिल रहा है, यदि कुछ हजार की भीड़ सड़कों पर उतर आए तो पूरी शासन व्यवस्था के लिए कठिन परिस्थितियों पैदा कर सकती हैं। भारत में ऐसे तत्वों पर सरकार को बेहद कड़ी नजर रखने की आवश्यकता है, जो सड़कों पर उतर कर सरकारी तंत्र को पुंग बनाने की मंशा रखते हैं। ऐसे तत्वों से कड़ाई से निपटने की आवश्यकता है।
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