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रियलिटी शोज और मासूमियत खोता बचपन

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हाल ही में बॉलीवुड की गायिका रेखा भारद्वाज ने रियलिटी शोज़ में ड्रामा डाले जाने को लेकर अपनी तल्खी पेश की। - फोटो : सोशल मीडिया
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कागज की नांव, मिट्टी के घरौंदे, बालू के पहाड़, गुड्डे-गुड़ियों की शादियां आज इन सब से बचपन कहीं ज्यादा आगे निकल चुका है। यह गुजरे जमाने की बातें हुआ करती थीं। आज तो ग्लैमर, टेलीविजन, रियलिटी शोज़ की दुनिया की बातें बच्चे करते हैं। आज का बचपन परिपक्व बचपन है। इन दिनों बच्चों में जैसे ही थोड़ा समझ विकसित होना शुरू होती है वह ग्लैमर वर्ल्ड की चकाचौंध, मोबाइल, टीवी, वीडियो गेम्स की दुनिया में जीने लगते हैं।

हाल ही में बॉलीवुड की गायिका रेखा भारद्वाज ने रियलिटी शोज़ में ड्रामा डाले जाने को लेकर अपनी तल्खी पेश की। एक बहुत अहम बात रेखा भारद्वाज की तरफ से कही गई कि इन शोज़ के जरिए बच्चों से उनका बचपन और मासूमियत छीनी जा रही है, गंभीरता से विचार करें कहीं तो यह बात सही भी है।

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बाल मस्तिष्क पर इन सब का दबाव बढ़ता जा रहा है। - फोटो : Social Media

जिसतरह से इन रियलिटी शोज़ में बच्चों की संवेदनाएं उनकी भावनाएं टीआरपी के हिसाब से परोसी जाती हैं वो बेहद चिंताजनक है। बच्चों के साथ उनके मां बाप का रोना-धोना उनका बच्चों पर अच्छे प्रदर्शन का दबाव ये सब सही सामाजिक ढांचे का हिस्सा नहीं है। किसी ने एकबार यूंही कहा कि रियलिटी शोज़ में रियलिटी के अलावा सब होता है इस बात से सहमति से एक लेखक के तौर पर मुझे कोई गुरेज़ नहीं है।

कुछ चर्चित टीवी के बाल कलाकार ये कहते हैं कि सुबह से शाम तक वह शूटिंग में यह में व्यस्त होते हैं तो पढ़ाई के लिए उन्हें वक्त निकालना पड़ता है। गाने, डांस, हास्य प्रस्तुति पर आधारित रियलिटी शोज़ में 4-5 बच्चों तक को प्रस्तुति के लिए पूरा-पूरा दिन रिर्हसल करवाई जाती है उन्हें तैयार किया जाता है। 

आप अंदाजा लगाइए कि बाल मस्तिष्क पर इन सब का दबाव किस हद तक पड़ता होगा। रेखा भारद्वाज ने एक और बात कही की बच्चों को संगीत या कोई प्रतिभा सिखाने से कहीं ज्यादा प्रतियोगिता करना और वोट मांगना सिखाया जाता है। रेखा भारद्वाज के समर्थन में कई लोग उतर आए उनमें से किसी ने कहा इन प्रतिभागियों को कोई देखता नहीं अगर ये रोते नहीं या ये नहीं बताते कि कितनी मुश्किलों से वो यहां पहुंचे हैं।
 

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आंकड़ों के अनुसार 18 वर्ष से कम के बच्चों में आत्महत्या की प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ रही है। - फोटो : फाइल फोटो

हर हफ्ते अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव, प्रतियोगिता में बनें रहने कि होड़, ये सब बच्चों में मासूमियत खत्म कर रहे हैं। कई टीवी चैनलों पर चल रहे कई हास्य कार्यक्रमों में बच्चों के हास्य वक्तव्य वयस्कों के स्तर के होते हैं जो यह स्पष्ट करते हैं कि ये बाल्यावस्था से यह कहीं ज्यादा दूर जा चुके हैं।

मानसिक तौर पर परिपक्वता निश्चित ही आवश्यक है किंतु इतिहास रहा है कि कुछ भी यदि समय से पहले होता है तो उसका दुरगामी परिणाम अच्छा नहीं होता। निश्चित तौर पर आज के बच्चे पहले के बच्चों की तुलना में ज्यादा तेज़ और स्मार्ट है किंतु उनकी सही उम्र से पहले उन्हें दुनियादारी की भट्टी में झोंक देना कहां तक जायज है। बच्चों पर बढ़ रहा इस तरह दबाव ही शायद आजकल आत्महत्या जैसी प्रवृत्ति को मासूम बच्चों में तेजी से बढा रहा है।

आंकड़ों के अनुसार 18 वर्ष से कम के बच्चों में आत्महत्या की प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ रही है। आजकल बच्चे आसानी से अपने जीवन में बढ़ रहे दबावों से छुटकारे का मार्ग आत्महत्या को समझते हैं। इन दिनों आत्महत्या की प्रवृत्ति बच्चों के भीतर एक विकल्प की तरह घर कर रही है कि यदि जीवन के अन्य विषयों में असफलता मिले तो यह अंतिम विकल्प है जो उनकी सारी समस्याओं को खत्म कर देगा।

इस तरह के मनोवृति स्वस्थ मस्तिष्क का परिचायक नहीं है। हर अवस्था का व्यक्ति के जीवन में अलग महत्व होता है। शैशवस्था से लेकर वृद्धावस्था तक के सफर को ही जिंदगी कहा जाता है। यदि कोई भी अवस्था जीवनकाल में अपना अस्तित्व खो दे तो व्यक्ति और उसका व्यक्तिव दोनों ही असंभव है।

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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