ऐसे में सवाल उठता है कि इसका जिम्मेदार कौन? एनटीए, 2018 से परीक्षाएं आयोजित कर रही है, लेकिन हर साल कोई न कोई विवाद खड़ा हो ही जाता है। सरकार की भी जिम्मेदारी से इनकार नहीं किया जा सकता। क्योंकि एनटीए शिक्षा मंत्रालय के अधीन काम करती है। 2024 के बाद भी सुधार नहीं हुए। पब्लिक एग्जामिनेशन एक्ट लागू होने के बावजूद लीक जारी। विपक्ष की माँग है कि, एनटीए को भंग कर दो, परीक्षाएं विकेंद्रीकृत करो।
पहले बोर्ड और यूनिवर्सिटी खुद परीक्षाएं लेती थीं, अब एक केंद्रीय एजेंसी पर सब कुछ निर्भर है। परिणाम? एक लीक पूरे देश को प्रभावित कर देता है। ऐसे में क्या भ्रष्टाचार का नेटवर्क, कोचिंग माफिया, सॉल्वर गैंग, सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत के बिना संभव है? देखना यह होगा कि सीबीआई जांच करेगी, लेकिन जड़ तक पहुंचेगी या सिर्फ कुछ गिरफ्तारियां होंगी?
ऐसे में क्या इसका कोई समाधान है? सरकार चाहे तो सबसे पहले लीक की जड़ें उखाड़े। जैसे कि डिजिटल लॉक, ब्लॉकचेन तकनीक, हर केंद्र पर सीसीटीवी, रैंडमाइज्ड प्रश्न बैंक आदि। एनटीए में जवाबदेही तय की जानी चाहिए। हर लीक पर डायरेक्टर जनरल को ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देना चाहिए।
परीक्षाएं कई चरणों में हों, ताकि एक लीक पूरी परीक्षा को प्रभावित न करे। कोचिंग उद्योग पर लगाम लगे, जहां से अक्सर लीक की शुरुआत होती है। लेकिन सबसे जरूरी, सरकार को राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी। छात्रों को मुआवजा दिया जाए, मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग की जाए, फीस रिफंड हो, जैसे कड़े कदम उठाए जाएं।
नीट 2026 का लीक सिर्फ एक घटना नहीं, सिस्टम की विफलता है। लाखों छात्र जिन्होंने रात-रात भर जागकर सपने सजाए, आज बेरोजगार नहीं, बल्कि बेवजह की अनिश्चितता का शिकार हैं। अगर अभी सुधार नहीं हुए तो आने वाले वर्षों में युवा विद्रोह और गहरा होगा। सरकार, एनटीए और समाज, सबको समझना होगा कि परीक्षा सिर्फ पेपर नहीं, लाखों सपनों का आधार है। इन्हें तोड़ने का हक किसी को नहीं। समय आ गया है कि हम ‘परीक्षा सुधार’ की बातें छोड़कर ‘परीक्षा क्रांति’ लाएं। अन्यथा, हर साल एक नया लीक, हर साल नए आंसू और हर साल बर्बाद भविष्य।
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