नेशनल टेस्टिंग एजेंसी द्वारा आयोजित नीट परीक्षा के पेपर लीक के बाद परीक्षा का रद्द होना कई सवालों के साथ खोखली हो चुकी संस्थाओं का सच भी उजागर करता है। यह लगभग 23 लाख छात्रों के भविष्य से एक तरह का खिलवाड़ है। विगत 3 मई को देशभर में आयोजित इस परीक्षा में शामिल छात्रों के मानसिक उत्पीड़न की हद है, तब जब पिछले कई दिनों से मीडिया और इंटरनेट मीडिया पर नीट परीक्षा के लीक होने को लेकर लगातार सवाल उठ रहे थे तो इतना समय क्यों लिया गया। परीक्षा के पेपर लीक मामले की जांच अब सीबीआई को सौंपी गई है तब ये सवाल उठता है कि इस परीक्षा के पेपर लीक होने पुनरावृत्ति जब बार बार हो रही तब पहले से ऐसा शिकंजा क्यों नहीं कसा गया।
जांच के खुलासे और एनटीए की कार्यप्रणाली पर सवाल
एनटीए की शिकायत के बाद राजस्थान एसओजी ने जांच शुरू की और जांच में ये पाया गया कि एक सैंपल पेपर में से 100 से ज्यादा सवाल हू-ब-हू नीट परीक्षा में पूछा गया था। इस खुलासे ने न सिर्फ एनटीए की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़े किए हैं,बल्कि पूरी परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को भी कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। ऐसा भी नहीं है कि यह कोई पहली बार हो रहा अब तो बिना लीक हुए परीक्षा सम्पन्न करा लेने को एक खबर या घटना की तरह देखा जाता है।
मतलब साफ है कि इस तरह की परीक्षाओं में धांधली करने वालों की जड़ें गहरी हैं, ये सिर्फ एक संस्था की खामी नहीं है बल्कि पूरे सिस्टम को इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी। क्या शिक्षा माफियाओं के तार इतने गहरे हैं कि कोई जतन काम नहीं आ रहा। पिछले दिनों जब 2024 में एनटीए द्वारा आयोजित परीक्षाओं में लगातार लापरवाही का मामला सामने आया था तो बड़ी कार्रवाई देश के उच्चतम न्यायालय के कहने पर की गई थी पर उसका हासिल क्या रहा, ढाक के तीन पात।
निष्पक्ष मूल्यांकन और गुणवत्तापूर्ण पेशेवर तैयार करने की चुनौती
सनद रहे कि इन प्रतियोगी परीक्षाओं का उद्देश्य सिर्फ विद्यार्थियों की योग्यता, ज्ञान और परिश्रम का निष्पक्ष मूल्यांकन करना ही नहीं होता बल्कि देश को कुशल चिकित्सक, अभियंता, प्रशासक भी इन्हीं परीक्षाओं के माध्यम से मिलते हैं और ऐसे में यदि परीक्षा के प्रश्न पहले से किसी को सैंपल पेपर में उपलब्ध हों तो फिर किस बात की निष्पक्षता,कैसा अधिकारी,चिकित्सक और अभियंता हम समाज को दे रहे। यह कोई साधारण त्रुटि नहीं मानी जा सकती,क्योंकि सौ से अधिक प्रश्नों का मेल होना संयोग से कहीं अधिक गंभीर साजिश प्रतीत होता है।
इससे यह आशंका जाहिर होती है कि परीक्षा की गोपनीयता और प्रश्न निर्माण प्रक्रिया से लेकर उसके परीक्षा केंद्र तक पहुंचाए जाने में कहीं न कहीं बड़ी चूक हुई है।यह मामला केवल परीक्षा रद्द करने या पुनः परीक्षा आयोजित करने तक सीमित नहीं है। यह शिक्षा व्यवस्था में बढ़ती ठेकेदारी,निजी व व्यावसायिक प्रवृत्ति और भ्रष्टाचार की ओर भी संकेत करता है।
कोचिंग संस्थानों की व्यावसायिकता और छात्रों का शोषण
आज अनेक कोचिंग संस्थान और निजी एजेंसियां तथाकथित तौर पर 'गेस पेपर' और 'विशेष सैंपल सेट' बेचने के नाम पर छात्रों की मजबूरी का लाभ उठाती हैं और यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसे संस्थानों के कई निदेशक/प्रबंधक/मालिक/अध्यापक सेलिब्रेटी बनकर आए दिन लोगों को नैतिकता का पाठ पढ़ाते नजर आते हैं। ऐसे लोगों के सोशल मीडिया पर लाखों/हजारों फॉलोवर हैं, ये लोग और इनकी कोचिंग संस्थान छात्रों से मनमानी फीस लेते हैं।
क्या ऐसे लोगों और उनकी संस्थाओं/कोचिंग सेंटर्स पर शिकंजा कसने के लिए सरकार को कानून नहीं बनाना चाहिए। क्या कोचिंग इंडस्ट्री को रेगुलेट करने के लिए कोई कानून या ट्रिब्यून नहीं बनाया जाना चाहिए। एनटीए द्वारा आयोजित नीट और यूजीसी नेट, आईटेप जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं के प्रश्नपत्र पहले भी लीक और अनियमितताओं के आरोपों के कारण रद्द हुए हैं।
परीक्षा एजेंसियों की संचालन व्यवस्था में गहरी कमजोरी
देखा जाए तो अब यह एक पैटर्न सा बन चुका है, विशेष रूप से NEET परीक्षा को लेकर देशभर में व्यापक विरोध देखने को मिला था। स्पष्ट है कि समस्या सिर्फ एक परीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसी घटनाएं परीक्षा एजेंसीयों की संचालन व्यवस्था की गहरी कमजोरियों को भी उजागर कर रही है। प्रश्नपत्र लीक होना, सैंपल पेपर से प्रश्नों का मिलना, परीक्षा से पूर्व जानकारी का प्रसारित होना ये सब संकेत देते हैं कि कहीं न कहीं प्रशासनिक लापरवाही, भ्रष्टाचार और सुरक्षा तंत्र की विफलता मौजूद है।
आधुनिक तकनीक और डिजिटल सुरक्षा के दौर में भी अगर राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाएं सुरक्षित नहीं रह पा रही हैं,तो यह अत्यंत गंभीर स्थिति है। बार-बार होने वाली ऐसी घटनाएं सिर्फ छात्रों का नुकसान नहीं करतीं, बल्कि देश की शिक्षा व्यवस्था की साख को भी कमजोर करती हैं। अगर राष्ट्रीय परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर ही प्रश्न उठने लगें, तो योग्य प्रतिभाओं का चयन निष्पक्ष रूप से कैसे संभव होगा? शिक्षा व्यवस्था का आधार समान अवसर प्रदान करना और पारदर्शिता रखना है, जब वही प्रभावित हो जाए तो पूरे तंत्र की वैधता संकट में पड़ जाती है।
छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और वंचित तबके पर आर्थिक बोझ
इस लीक तंत्र का सबसे बड़ा प्रभाव छात्रों के मानसिक संतुलन पर पड़ता है। अनेक विद्यार्थी चिंता, अवसाद, निराशा और कमतरी महसूस करने लगते हैं। बार-बार परीक्षा की तैयारी और अनिश्चित तिथियों की प्रतीक्षा छात्रों को मानसिक रूप से थका देने वाली होती है। ऐसा बार-बार होने से छात्रों को मेंटल ट्रॉमा से गुजरना पड़ता है। ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों के लिए जिनके पास सीमित संसाधन है यह पीड़ा और भी अधिक गंभीर है।
वंचित तबका अपने जीवन भर की गाढ़ी कमाई बच्चों का भविष्य बनाने के लिए शिक्षा पर खर्च करती है। ऐसे में उनके साथ कितना बुरा होता है क्या सिस्टम इसके लिए जिम्मेदारी लेने से इंकार करेगा कि इसका दुष्प्रभाव समाज के अंतिम पंक्ति के लोगों पर पड़ता है। सरकार ने प्रतियोगी और शैक्षणिक परीक्षाओं में नकल, पेपर लीक और संगठित धोखाधड़ी को रोकने के लिए 'द पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट, 2024' (Public Examinations Act, 2024) लागू किया है।
भविष्य के लिए व्यापक सुधार और जवाबदेही की आवश्यकता
यह कानून परीक्षाओं में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए बेहद सख्त प्रावधान तो करता है, जिसके तहत दोषी पाए जाने पर 10 साल तक की जेल और ₹1 करोड़ तक का जुर्माना लग सकता है। लेकिन समस्या यह है कि इस कानून के पास होने के बाद भी लीक हुई परीक्षाओं की न तो स्पष्ट जांच हो सकी है और न ही दोषियों को सजा हो पाई। यह सरकार और एजेंसियों पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।
कड़े कानूनों का सख्ती से पालन और निरंतर समीक्षा
आज केवल परीक्षा रद्द करने या पुनः परीक्षा कराने से काम नहीं चलने वाला है बल्कि पूरी परीक्षा प्रणाली में व्यापक और कठोर सुधार लागू करने की जरूरत है। प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर वितरण तक की प्रक्रिया को पूर्णतः सुरक्षित और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। साइबर सुरक्षा को और मजबूत किया जाए, परीक्षा केंद्रों की निगरानी बढ़ाई जाए तथा दोषियों के विरुद्ध त्वरित और कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
परीक्षा की सुचिता भंग होने, प्रश्नपत्र लीक होने और नकल रोकने से संबंधित जो कानून पूर्व में बनाए गए हैं उनका सख्ती से पालन करना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए और भी कड़े से कड़े कानून पारित करके लागू करने की ज़रूरत है और उसे समय समय पर पुनरीक्षित भी करते रहना चाहिए।
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