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प्रकृति के पास अनंत पाठ हैं: कैसे उसकी शांति हमें अंधेरे समय में भी आशा, शक्ति और जीवन का अर्थ सिखाती है

Sat, 31 Jan 2026 07:10 AM IST
शुभम कुमार राहेल कार्सन

सार

यदि हम अपनी इंद्रियों को प्रकृति के प्रति जाग्रत कर लें, तो उसके पास सिखाने के लिए अनंत पाठ हैं। वह अपने चिर-परिचित अंदाज में यह भरोसा लगातार बोती रहती है कि अंधेरी रात के गर्भ में ही सवेरा पलता है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जोलोग पृथ्वी की सुंदरता और इसके रहस्यों के चिंतन में अपना समय बिताते हैं, वे अपने भीतर शक्ति के ऐसे गुप्त भंडार खोज लेते हैं, जो जीवन के सबसे अंधेरे क्षणों में भी उनका साथ नहीं छोड़ते। प्रकृति एक महान मार्गदर्शिका है। वह मौन है, फिर भी निरंतर संवाद करती है। उसका हर पत्ता, हर लहर, हर आकाश-खंड हमें धैर्य, आशा और पुनर्निर्माण का पाठ पढ़ाता है।

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यदि हम अपनी इंद्रियों को प्रकृति के प्रति जाग्रत कर लें, तो उसके पास सिखाने के लिए अनंत पाठ हैं। वह अपने चिर-परिचित अंदाज में यह भरोसा लगातार बोती रहती है कि अंधेरी रात के गर्भ में सवेरा पल रहा होता है, और हर शीत के बाद वसंत का आगमन निश्चित है। जैसे-जैसे हमारी चेतना ब्रह्मांड के इन सूक्ष्म चमत्कारों पर केंद्रित होती जाती है, वैसे-वैसे हमारे भीतर विनाश की आशंका क्षीण पड़ती जाती है, क्योंकि जो व्यक्ति एक समुद्री जीव की सूक्ष्मतम संरचना या नक्षत्रों की व्यवस्था में निहित सौंदर्य को देख लेता है, वह कभी भी जीवन के इस सुंदर ताने-बाने को नष्ट करने का विचार नहीं कर सकता।

एक बच्चे के लिए यह संसार रहस्यमय, नवीन और विस्मयकारी है। दुर्भाग्य से, वयस्कता की दौड़ में वही निर्मल दृष्टि धुंधली पड़ जाती है, और विस्मय की वह सहज भाषा कहीं खो जाती है। यदि मुझे कोई वरदान मांगने का अवसर मिलता, तो मैं यही प्रार्थना करती कि प्रत्येक बालक के हृदय में ऐसा विस्मय अंकित हो, जो कभी मुरझाए ही नहीं। जो अमोघ औषधि बनकर उसे उसके आंतरिक स्रोतों से जोड़े रखे। यह विस्मय ही हमें फिर से विनम्र बनाता है। यह हमें याद दिलाता है कि हम इस विशाल जीवंत ताने-बाने के अधिपति नहीं, बल्कि इसके एक विनम्र सहभागी हैं।
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जब हम वृक्षों की मौन भाषा सुनते हैं और आकाश की अनंतता को हृदयंगम करते हैं, तब जीवन उपभोग की वस्तु नहीं रह जाता, बल्कि वह एक पवित्र संवाद बन जाता है। प्रकृति के साथ यह संवाद ही हमें कोमल, सजग और उत्तरदायी मनुष्य बनाता है, और यहीं, इसी सहभागिता में, हमारी सबसे गहरी और टिकाऊ शक्ति निहित है।

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