मसूरी और शिमला की ही तरह ही है नैनीताल की स्थिति। (प्रतीकात्मक तस्वीर)
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मसूरी पर भी मंडरा रहा खतरा
जो बेहद चिन्ताजनक स्थिति आज शिमला की है उससे अधिक नाजुक मसूरी की है। संवेदनशीलता में शिमला 61वें नम्बर पर है जबकि देहरादून का रैंक 29वां है जहां मसूरी है। इसलिए कभी भी मसूरी और नैनीताल में भी खतरनाक स्थिति पैदा हो सकती है। शिमला की तरह मूसरी और नैनीताल को भी अंग्रेजों ने ही पहाड़ियों पर बहुत सीमित जनसंख्या के लिए बसाया था। उत्तराखण्ड आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केन्द्र के वैज्ञानिकों द्वारा कराए गए एक अन्य अध्ययन के अनुसार मसूरी के केम्प्टी फॉल, लाल टिब्बा और भट्टाफाॅल सर्वाधिक खतरे वाले क्षेत्र हैं। इसका कारण भूवैज्ञानिक सुशील खण्डूड़ी ने टेक्टॉनिक डिसकंटिन्युटी और तीब्र अस्थिर ढलान माना है।
इस अध्ययन में भट्टाघाट और लाल टिब्बा के उत्तर पश्चिम क्षेत्र को भूस्खलन के लिए अत्यधिक संवेदनशील बताया गया है, जबकि कम्पनी गार्डन के उत्तर, लाल टिब्बा के उत्तर पूर्व, जबरखेत के पश्चिम और क्यारकुली के दक्षिण पश्चिम के क्षेत्र उच्च संवेदनशीलता में माने गए हैं। इन क्षेत्रों में अक्सर भूस्खलन होते रहते हैं।
इसी प्रकार परी टिब्बा, जबरखेत, क्यारकुली एवं भट्टा के पश्चिमी क्षेत्र, बार्लोगंज के उत्तर पश्चिम और खट्टापानी के उत्तर पूर्वी क्षेत्र को मध्यम दर्जे की संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। इस अध्ययन में मसूरी क्षेत्र के 31.6 प्रतिशत क्षेत्र को मध्यम जोखिम या संवेदनशील श्रेणी, 21.6 प्रतिशत उच्च संवेदनशील श्रेणी और 1.7 प्रतिशत क्षेत्र को अति संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। मसूरी को 1823 में देहरादून के ज्वाइंट मजिस्ट्रेट कैप्टन यंग ने तलाशा था।
नैनीताल को डराता है इतिहास और बनियानाला
मसूरी और शिमला की ही तरह नैनीताल की स्थिति है। यह शहर पहले ही मानवीय बोझ तले दबा जा रहा था उस पर हाइकोर्ट का बोझ डालकर इसका लगभग कचूमर ही निकल गया। नैनीताल में सबसे बड़ा भूस्खलन 18सितंबर 1880 को हुआ था, जिसमें 151 लोग मलबे के नीचे दब कर मर गए थे, जिनमें लगभग सभी यूरोपियन ही थे। इस विनाशकारी भूस्खलन से पहले वहां लेगातार 40 घंटों तक 25 इंच (510 मिमी) से 35 इंच (890मिमी) तक अतिभारी वर्षा हुई थी।
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