आज लड़कियां लडकों से किसी भी क्षेत्र में कमतर नहीं हैं। हर क्षेत्र में महिला शक्ति को पूरी हिम्मत से काम करते देखा जा सकता है। समाज के पढ़े-लिखे लोगों को आगे आकर कन्या भ्रूण हत्या जैसे घिनौने कृत्य को रोकना होगा। एक माहौल बनाना होगा और ऐसा करने वाले लोगों को समझा कर उनकी सोच में बदलाव लाना होगा। लोगों को इस बात का संकल्प लेना होगा कि ना तो गर्भ में कन्या की हत्या करेगें ना ही किसी को करने देगें।
एक तरफ जहां बेटी को जन्मते ही मरने के लिये लावारिस छोड़ दिया जाता है, वहीं झुंझुनू जिले की मोहना सिंह जैसी लड़कियां भी हैं, जो देश में फाईटर प्लेन उड़ा कर जिले का पूरे देश में मान बढ़ा रही हैं। समाज में सभी को मिलकर राष्ट्रीय बालिका दिवस के दिन हमें लड़का-लड़की में भेद नहीं करने और समाज के लोगों को लिंग समानता के बारे में जागरूक करने की प्रतिज्ञा लेनी चाहिए।
देश में आए दिन बालिकाओं के साथ बलात्कार, प्रताड़ना की घटनाएं अखबारों की सुर्खियां बनती हैं। लड़कियां आज कहीं भी अपने को सुरक्षित नहीं समझती हैं। हर साल बालिका दिवस मनाने की बजाय सरकार और समाज को मिलकर ऐसे वातावरण का निर्माण करने का प्रयास करना चाहिए, जिसमें बालिकाएं खुद को महफूज समझ सकें। जब तक बालिकाओं की सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था नहीं होगी, तब तक बालिका दिवस मनाना सार्थक नहीं हो पाएगा।
बालिकाओं पर अत्याचार करने वालों के मन में भय व्याप्त करने के लिए सरकार को कानून में और अधिक सुधार की जरूरत है। आंध्र प्रदेश जैसे राज्य में सरकार ने बलात्कार करने वालों को 21 दिन में फांसी देने का कानून बनाया है। ऐसा कानून सभी जगह लागू होना चाहिए।
निर्भया प्रकरण में पटियाला हाउस कोर्ट ने दोषियों को 22 जनवरी को फांसी देने के लिए डेथ वारंट जारी किया था, लेकिन जब दया याचिका दाखिल की गई तो उसके बाद कोर्ट ने एक फरवरी के लिए नया डेथ वारंट जारी किया है। अब एक फरवरी को भी डेथ वारंट पर अमल होगा कि नहीं उस पर भी अभी संदेह व्यक्त हो रहा है।
हाल ही में केंद्र सरकार ने एक अच्छी पहल करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी डाली है। केंद्र ने अपनी याचिका में कहा है कि ये तय किया जाए कि कोर्ट की ओर से डेथ वारंट जारी करने के बाद सात दिनों के भीतर ही दया याचिका दायर की जा सके। देश के सभी सक्षम न्यायालयों, राज्य सरकारों, जेल प्राधिकारों को उनकी दया याचिका को खारिज करने के सात दिन के भीतर डेथ वारंट जारी करने और इसके सात दिनों के भीतर मौत की सजा देने का आदेश दिया जाए। भले ही उसके साथी दोषियों की पुनर्विचार या क्यूरेटिव याचिका दया याचिका लंबित हो।