नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के अनुसार देश के 14 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेश की 30 प्रतिशत औरतों ने पति या पार्टनर की मार को जायज ठहराया है।
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घरेलू हिंसा और सुप्रीम कोर्ट
अभी थोड़े ही समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा था। इस याचिका में कहा गया था कि डोमेस्टिक वॉयलेंस एक्ट 2005 होने के बावजूद घरेलू हिंसा अब भी महिलाओ के खिलाफ सबसे आम (और आसान भी) अपराध बना हुआ है। इस याचिका में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे का हवाला देते हुए यह भी कहा गया था कि घरेलू हिंसा की शिकार करीब 86 प्रतिशत महिलाएं कभी मदद मांगने आगे आती ही नहीं। अब जब महिलाएं खुद यह मान रही हैं कि उनपर हाथ उठाना जायज है तो वे शिकायत क्यों करेंगी भला?
कुछ साल पहले की एक घटना मेरे जेहन में आज भी ताजा है। एक परिचित ने नए घर के गृह प्रवेश पर आमंत्रित किया था। खा-पीकर हम सब हाथों में कॉफी के मग लेकर लॉन में आ गए और गप्पें मारने लगे। पुरुष मण्डली अंदर ड्राइंग रूम में बैठी थी। हंसी-मजाक के बीच हमें अपनी एक सहेली के पति द्वारा अंदर से लगाई गई आवाज नहीं आई। एक और दो आवाजों के बाद तीसरी बार में पति महोदय तैश में उठते हुए से बाहर आए और अपनी पत्नी को पीठ पर जोर से धौल जमाते हुए बोले- 'सुन भी लो जरा। अंदर बच्चा गिर गया है।' वो महिला एकदम सकपका गई और कॉफी छलक कर उनकी साड़ी पर गिर गई। वे महाशय इतने पर ही नहीं रुके, आगे हमारी ओर मुखातिब होते हुए बोले- 'अरे हमारी श्रीमतीजी का क्या है, गप्पों में खो जाती हैं। फिर ध्यान ही नहीं रहता घर, पति, बच्चों का।' इतना कहकर वो वहां से चले गए और उनकी पत्नी खिसियानी हंसी के साथ उठकर बिना कुछ बोले अंदर चली गईं।
जाहिर था कि हमें बुरा लगा था लेकिन हम कुछ बोलें उसके पहले ही होस्ट परिवार की बुजुर्ग महिला जो वहां बैठी थीं, बोलीं-'अरे तो क्या हुआ। ध्यान नहीं देगी तो मार खाएगी ही। पति ही तो है, इसका बुरा क्या मानना।' हम सन्न थे। समझ ही नहीं सके कि क्या प्रतिक्रिया दें। इसके बहुत दिनों बाद तक जब भी वो दम्पत्ति किसी कार्यक्रम में मिलते वो 'धौल' हमारे जेहन में ताजा हो जाता। लेकिन वो महिला सामान्य थी, जैसे कुछ हुआ ही न हो। उसपर सबसे बड़ी बात यह थी कि वो महिला स्वयं का व्यवसाय चला रही थी। अपने पैरों पर खड़ी थी और उनके पास बकायदा एक टेक्निकल डिग्री थी।
अपने आसपास कई लोगों को मैंने सालों से इसी धारणा के साथ जीते देखा है। झगड़े-बहस हर घर और हर परिवार में होते हैं लेकिन उस झगड़े में किसी एक को दूसरे पर हाथ उठाने का अधिकार मिल जाना सामान्य इंसान होने के नाते भी खटकता है। कई बार तो यह भी हुआ है कि एक दिन पहले फोन पर रो-रोकर अपने पति को हाथ उठाने पर कोस रही कोई परिचित दो दिन बाद गाल पर थप्पड़ का निशान और गले में पति का गिफ्ट किया हार दोनों गर्व से दिखा रही होती है।
औरतों पर हाथ उठा देना हमारे देश में पान या गुटखे की पीक थूकने जितना आसान है।
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एक्सप्रेशन ऑफ लव और औरतें
ये कोई एक तबके, वर्ग, पढ़े-अपढ़ की बात भी नहीं, लगभग हर जगह औरतें इसी सोच के साथ बड़ी होती हैं। उसपर तुक्का यह कि ये पिटाई तो प्यार वाली ही है। पति प्यार करते हैं इसलिए हाथ उठा देते हैं। इस बात को सुनकर मुझे थप्पड़ फिल्म का वह सीन याद आ जाता है, जब वकील से बात करते हुए एक व्यक्ति कहता है- 'और सर थोड़ी बहुत मारपीट तो एक्सप्रेशन ऑफ लव ही है ना सर?'
हाथ उठा देना हमारे देश में पान या गुटखे की पीक थूकने जितना आसान है। जहां जगह मिली रंग छोड़ दिया और अधिकांशतः इसका प्रयोग औरतों और बच्चों पर किया जाता है क्योंकि ज्यादातर मामलों में दोनों ही न तो आत्मनिर्भर होते हैं न ही खुद के निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र। ऐसे लोगों के मौलिक अधिकारों के बारे में कभी सोचा भी नहीं जाता। समाज इस तरह की व्यवस्था करता है कि थप्पड़ मारना, मारने वाले को और थप्पड़ खाना, खाने वाले को जायज सा लगता है।
इस सोच में बदलाव आसान नहीं है। बचपन से ही यह बात लड़कियों को बताना जरूरी है कि उन पर कोई भी हाथ उठाए वो गलत ही है, चाहे वो घर का कोई अपना हो या बाहर का। लड़कियों को सुरक्षा के साथ आत्मनिर्भर बनने की शिक्षा देने के साथ यह भी बताना जरूरी है कि बेवजह उनका हाथ उठाना भी जायज नहीं। साथ ही लड़कों को बचपन से यह बताना आवश्यक है कि यूंही हाथ उठा देना न तो उनका अधिकार है, न ही मर्दानगी।
बात यह नहीं है कि हर झगड़े या ऐसी किसी घटना की पुलिस में शिकायत कर दी जाए। लेकिन अगर पहली बार आपका पति या पार्टनर आप पर हाथ उठाता है तो उसे वहीं रोक देना जरूरी है। अगर ये उसकी आदत है तब तो कानून की मदद लेना भी जायज है। अगर अब भी लड़कियों को यह समझ विकसित करने में मदद नहीं की गई कि मार खाना गलत है तो यह थप्पड़ हर पीढ़ी में इसी तरह ट्रासंफर होता रहेगा।
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