हमारे ऋषि-मुनियों ने जीवन में भोग का नहीं, त्याग का महत्व बताया है।
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हमारे ऋषि-मुनियों ने जीवन में भोग का नहीं, त्याग का महत्व बताया है। साधा जीवन उच्च विचार की बात कही है। क्योंकि जीवन में आंतरिक शक्तियों की अभिव्यक्ति बाह्य भोगों में उलझने से नहीं, अपितु उनका त्याग करने से होती है।
सांख्य दर्शन कहता है - 'भोग और त्याग की शिक्षा बाज से लेनी चाहिए। बाज पक्षी से जब कोई उसके हक का मांस छीन लेता है तो मरणांतक दुख का अनुभव करता है किंतु जब वह अपनी इच्छा से ही अन्य पक्षियों के लिए अपने हिस्से का मांस, जैसा कि उसका स्वभाव होता है, त्याग देता है तो वह सुख का अनुभव करता है। यानी सारा खेल इच्छा, आसक्ति अथवा अपने मन का है।'
इन्हीं सब को देखते हुए उपभोक्ता में उत्पादकता और गुणवत्ता संबंधित जागरूकता को बढ़ाने व उपभोक्ता कानूनों के बारे में लोगों को जानकारी देकर उपभोक्ता के हितों की रक्षा करने केे उद्देश्य से भारत में 24 दिसंबर को 'राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस' के रूप में मनाया जाता है, क्योंकि उपभोक्ताओं को शोषण से बचाने के लिए 24 दिसंबर, 1986 को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम-1986 लागू किया गया था।
इसके बाद इस अधिनियम में 1991 तथा 1993 में संशोधन किए गए। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम को अधिकाधिक कार्यरत और प्रयोजनपूर्ण बनाने के लिए दिसंबर 2002 में एक व्यापक संशोधन लाया गया और 15 मार्च 2003 से लागू किया गया।
परिणामस्वारूप उपभोक्ता संरक्षण नियम, 1987 में भी संशोधन किया गया और 5 मार्च 2004 को अधिसूचित किया गया। भारत में यह दिवस पहली बार वर्ष 2000 में मनाया गया।
हाल में तीन दशक पुराने उपभोक्ता संरक्षण कानून, 1986 को बदल दिया गया है। इसकी जगह उपभोक्ता संरक्षण कानून, 2019 ने ली है। नए कानून में उपभोक्ताओं के हित में कई कदम उठाए गए हैं। पुराने नियमों की खामियां दूर की गई हैं।
इसका उद्देश्य भ्रामक विज्ञापनों, डिजिटल लेनदेन और ई-कॉमर्स से जुड़ी समस्याओं को बेहतर तरीके से दूर करके उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना है। इस विधेयक में यह प्रावधान है कि यदि कोई निर्माता या सेवा प्रदाता झूठा या भ्रामक प्रचार करता है जो उपभोक्ता के हित के खिलाफ है तो उसे दो साल की सजा और 10 लाख रुपये तक जुर्माना हो सकता है। अपराध दोहराए जाने पर जुर्माने की राशि 50 लाख रुपये तक और कैद की अवधि पांच साल तक हो जाएगी।
नि:संदेह, कानून बनने से उपभोक्ता अधिकारों के घेरे में आ गया है। जिसके तहत उपभोक्ता को स्वयं के हितों पर विचार करने के लिए बनाए गए विभिन्न मंचों पर प्रतिनिधित्व का अधिकार, अनुचित व्यापार पद्धतियों या उपभोक्ताओं के शोषण के विरुद्ध निपटान का अधिकार, सूचना संपन्न उपभोक्ता बनने के लिए ज्ञान और कौशल प्राप्त करने का अधिकार, अपने अधिकार के लिए आवाज उठाने का अधिकार, जीवन एवं संपत्ति के लिए हानिकारक सामान और सेवाओं के विपणन के खिलाफ सुरक्षा का अधिकार, सामान अथवा सेवाओं की गुणवत्ता, मात्रा, क्षमता, शुद्धता, स्तर और मूल्य, जैसा भी मामला हो, के बारे में जानकारी का अधिकार प्राप्त हुए हैं। वहीं उपभोक्ता को वस्तु एवं सेवा में दोष पाये जाने पर उपभोक्ता अदालतों में मुकदमा लड़ने व न्याय पाने का भी प्रावधान किया गया है।
आज उपभोक्ता जमाखोरी, कालाबाजारी, मिलावट, बिना मानक की वस्तुओं की बिक्री, अधिक दाम, गारंटी के बाद सेवा नहीं देना, हर जगह ठगी, कम नाप-तौल इत्यादि संकटों से घिरा हैं।
उपभोक्ता संरक्षण के लिए विभिन्न कानून बने हैं, इसके फलस्वरूप उपभोक्ता आज सरकार पर निर्भर हो गया है। जो लोग गैर-कानूनी काम करते हैं, जिन्हें राजनैतिक संरक्षण प्राप्त होता है। उपभोक्ता चूंकि संगठित नहीं हैं इसलिए हर जगह ठगा जाता है। उपभोक्ता आंदोलन की शुरूआत यहीं से होती है। उपभोक्ता को जागना होगा व स्वयं का संरक्षण करना होगा।
आजकल ऑनलाइन खरीदारी के बढ़ते प्रचलन को लेकर नकली सामानों की बिक्री एक बड़ी समस्या बनकर उभर रही है। वेलोसिटी एमआर द्वारा किए गए सर्वे के मुताबिक ऑनलाइन सामान मंगवाने वाले हर तीन ग्राहकों में से एक को पिछले छह माह में कोई ना कोई खराब सामान मिला है।
इसी तरह लोकल सर्विस के सर्वे के अनुसार 38 प्रतिशत लोगों का कहना हैं कि उन्हें एक साल के अंदर ई-कॉमर्स साइट से कोई न कोई नकली खराब सामान मिला है। इस स्थिति में एक ऐसी गाइडलाइन घोषित की जानी चाहिए जो ऑनलाइन विक्रेता कंपनियों के लिए नियमों का निर्धारण करने में सक्षम साबित हो जिससे ग्राहक ठगी से बच सकें।
ग्राहकों को भी चाहिए कि मंगवाये गए माल को लेकर किसी भी प्रकार की समस्या होने पर उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज कराने की तत्परता दिखाएं। इसके लिए जरूरी है कि हम केवल दिवस मनाने की औपचारिकता न निभाएं।
वास्तव में समाज के पढ़े-लिखे लोग आगे आकर उपभोक्ता कानूनों का प्रचार-प्रसार कर आम जनता को इसके संबंध में जागरूक करें। हम लोगों को अपने व्यस्त समय में से कुछ क्षण निकालकर उपभोक्ता अधिकार कानून के बारे में प्रचार-प्रसार का कार्य करना चाहिए।
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