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नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023: चुनौतियां और संभावनाएं, एक दृष्टि..!

सार

एक चिंता यह भी है कि कहीं विधायिकाओं  में सीधे-सीधे महिला सीट आरक्षण करने से महिला कैंडिडेट सिर्फ महिला सीट तक ही सीमित होकर न रह जाए जैसे कि 1990 के प्रारंभिक वर्षों में फिलिपींस, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशो में हुआ और ऐसे में सामान्य सीटों पर सक्षम होने पर भी महिला कैंडिडेट को नहीं उतरा गया। हालांकि वर्तमान बिल में सीटों के  रोटेशन का भी ज़िक्र किया गया है।  

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नारी शक्ति वंदन अधिनियम संसद से पारित। - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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आखिरकार राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद नारीशक्ति अधिनियम के कानून बनने के साथ ही देश की आधी आबादी की एक लंबे अरसे से चली आ रही राजनैतिक अधिकारों की लड़ाई का सुखद समापन हो ही गया। इसके साथ ही देश के संसदीय इतिहास में 1996 से चले आ रहे और कुल मिलाकर 27 साल, 5 प्रधानमंत्री और अनेको बार पेश होने के बाद इस ऐतिहासिक निर्णय को मंज़ूरी मिल गई जिसमें महिलाओं के लिए लोकसभा व् राज्य विधानसभाओं में  SC/ST वर्ग के साथ एक-तिहाई सीटें, निर्वाचन क्षेत्रों के पुनःनिर्धारण के बाद से आरक्षित होनी शुरू हो जाएंगी।  

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हालांकि संसद की अग्नि-परीक्षा में ऐतिहासिक बहुमत से पारित इस विधेयक पर  लगभग सभी विपक्षी दलों ने किसी न किसी तरह से अपने-अपने दावे ठोके। दूसरी तरफ इस पर अभी न लागू करने, टालने, पिछड़ा, अल्पसंख्यक विरोधी आदि-आदि जैसे प्रश्न चिह्न लगाने पर भी नहीं चूके। तभी से पब्लिक डोमेन में इन्हे मुद्दा बना, सरकार की मंशा पर संशय की स्थिति उत्पन्न कर जनता को भ्रमित करने के दुर्भाग्य पूर्ण प्रयास देखे जा रहे हैं। इनकी प्रमाणिकता को परखने के लिए  संवैधानिक पहलुओं पर नज़र डालना अति आवश्यक  हो जाता है।  


संविधान में आरक्षण- 

हमारे संविधान में आर्टिकल 81, 170, 330 और 332, जिनमें सीटों का आरक्षण वर्णित है, जिसमें स्पष्ट है कि बढ़ती जनसंख्या के आधार पर वक्त-वक्त पर चुनावी प्रक्रिया को पूर्णरूप से लोकतांत्रिक बनाए जाने के लिए निर्वाचन क्षेत्र की सीमाएं को दोबारा निर्धारित करने के लिए परिसीमन कराया जाना अति आवश्यक होगा जोकि वास्तविक जनगणना के आधार पर ही संभव है।

 

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कानूनी रूप से जनगणना और परिसीमन के बाद ही व्यवहारिक रूप से  निर्वाचन क्षेत्रों को आकार दिया जाता है, परन्तु दुर्भाग्यवश 1976 में आपातकाल के दौरान संविधान में 42वें संशोधन के तहत 1971 की जनगणना के ही आधार मानकर 2001 तक विधायिकाओं की सीटों की संख्या को स्थिर कर दिया गया था फिर 2001 में हुए 84वें संशोधन में इनमें वर्ष 2026 तक कोई परिवर्तन न करने का प्रावधान भी कर दिया गया था। यानी कानूनी रूप से देश की वर्तमान विधायिकाओं के स्वरूप को आकार देने की व्यवस्था को 2026 से पहले आरम्भ नहीं किया जा सकता, परन्तु दुखद की दिन-रात संविधान को खतरे में बताने वालो को कानूनी तथ्यों से कोई लेना-देना नहीं है, नहीं तो उन्हें पता होता कि इस बिल को 2024 से लागू करने के प्रावधान के साथ कराया जाता तो पूर्वव्रत ही निरर्थक साबित होता क्योंकि उसे कोई भी न्यायालय में चुनौती दे सकता था और निश्चित रूप से पूरी प्रक्रिया निष्फल हो जाती।

यही नहीं सीटों के आरक्षण की स्थति को लेकर राजनैतिक राग-द्वेष के आरोप-प्रत्यारोप की संभावनाए भी निश्चित थीं, परन्तु मात्र विरोध की राजनीति से संसद में कानून नहीं बनते उसके लिए न्यायिक प्रक्रिया के तहत अभ्यास भी करना पड़ता है, तो लोकसभा और विधानसभा में नई जनगणना और परिसीमन के बिना सीटों में हेर-फेर को असंवैधानिक माना जाता है। दूसरी तरफ राज्यसभा और विधान परिषद् में इस आरक्षण को लागू न करने का करण सीधेतौर पर चुनाव का न होना यानी अप्रत्यक्ष चुनाव का होना है।  

नारीशक्ति वंदन अधिनियम भारत की नई उपलब्धि है। - फोटो : अमर उजाला
गौरतलब है की उच्च सदन में  वोटिंग प्रक्रिया एकल संक्रमणीय मत के अनुसार होती है यानी बैलट पेपर पर उम्मीदवार की वरीयता का क्रम अंकित किया जाता है तो इस प्रकार की प्रक्रिया में आरक्षण प्रक्रिया को लागू करना व्यावहारिक नहीं होता पाता। संभवतः इसका मूल कारण कि संविधान निर्माता उच्च सदन को आरक्षण  से दूर रखना चाहते थे।


विपक्ष की सियासत और मंशा 

दुर्भाग्य से आज विपक्षी गठबंधन में बीस से भी अधिक दल धर्म-जातिगत् वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित माने जाते हैं। ऐसे में समाज की धार्मिक और जातिगत् समीकरणों की रेखाएं कहीं धूमिल न पड़ जाएं उसके लिए इसमें अल्पसंख्यक व् पिछड़ी जाति के आरक्षण  का प्रावधान ना होने के एजेंडा को भी खूब जोर-शोर से चलाया जा रहा है, परन्तु तकनीकी रूप से देखा जाए तो इसमें पिछड़ी जाति व्  अल्पसंख्यक को शामिल ना करने का मूल कारण, एक तरफ तो संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण का वर्जित होना है।

दूसरी तरफ वर्तमान कानून में विधायिका में व्यवहारिक रूप से पिछड़ों के लिए आरक्षण का न होना है,क्योंकि कानूनी रूप से अभी तक भारत की संवैधानिक व्यवस्था में व्यवहारिक, OBC के लिए आरक्षण की कोई व्यवस्था वास्तव में लागू है ही नहीं।  

हालांकि संविधान के अनुच्छेद-330 के अनुसार लोकसभा में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को जनसंख्या के अनुपात के आधार पर प्रतिनिधित्व दिया जाता है इसलिए मात्र SC/ST कोटे को ही इसमें वर्तमान विधिरचना के अनुरूप स्थान दिया गया है। यहां तक कि पूर्व में पूर्व  में जब कांग्रेस ने राज्यसभा में यह बिल पारित कराया था तो न ही उसमे पिछड़ों की बात थी और ना ही SC/ST की और यह मात्र 10 वर्ष के लिए ही लागू होना था।

हालांकि पूर्व बंगाली सांसद गीता मुखर्जी जिन्होंने 1996 में  संसद के पटल पर इसे एक निजी सदस्य विधेयक के रूप में पेश किया था, उनकी समिति की अधिकतर संस्तुतियों का सम्मान करते हुए वर्तमान में इसकी अवधि को पंद्रह वर्ष तक लिए रखा गया है। 

देखा जाए तो जातिगत् प्रतिनिधित्व वास्तिविक जातिगत संख्या के बिना अधूरा है और देश में वर्तमान परिसीमन 1931 की जातिगत जनगणना के आधार पर है जिसके बाद जातिगत समीकरण काफी बदल चुकी है।
वर्तमान में केंद्र, राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों की सरकारों की ओबीसी लिस्ट में लगभग तीन हज़ार उप-जातियां शामिल हैं और सरकार इन्हें आरक्षण का बराबर लाभ आवंटित करने की कार्यवाही में भी सतर्कता से लगी है जिसके सन्दर्भ में  रोहिणी कमीशन के तहत एक रिपोर्ट भी राष्ट्रपति मुर्मू को सौपी गई है।  

स्मरण रहे की पूर्व में इस रोहिणी आयोग के तहत ही गठित मंडल कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर देश की पिछड़ी आबादी को केंद्र सरकार की नौकरियों और उच्च शिक्षा में 27.5 फीसदी, एससी के लिए 15 फीसदी और एसटी के लिए 7.5 फीसदी आरक्षण देने का भी प्रावधान किया गया था, तो मात्र विरोध के लिए सरकार को पिछड़ा विरोधी तबका देकर वर्तमान सत्ता में पिछड़े समाज के प्रतिनिधत्व करने वाले  85 सांसदों जिसमें से 29 केबिनेट मंत्रियो को विरोधियो द्वारा एक तरह से प्रॉक्सी घोषित करना क्या उनकी क्षमताओं पर प्रश्न चिह्न लगाना जैसा नहीं है?  

हालांकि प्रायोजित नैरेटिव के बीच इसके दूरगामी परिणामों के असल मुद्दों नहीं आ पाए जैसे इससे भविष्य में राज्यसभा और विधान परिषद् में महिलाओं की संख्या और भी कम हो सकती है जो वर्तमान में लोकसभा से पहले ही बहुत कम है। गोया कि जिन पुरुष प्रतिनिधियों को विधायिकाओ में टिकट नहीं दिया जाएगा उन्हें उच्च सदन  में भेजने की कोशिश को पूरी सम्भावनाएं रहेंगी।


 
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कहीं विधायिकाओं  में सीधे-सीधे महिला सीट आरक्षण करने से महिला कैंडिडेट सिर्फ महिला सीट तक ही सीमित होकर न रह जाए। - फोटो : अमर उजाला

महिला आरक्षण और चुनौतियां 

एक चिंता यह भी है कि कहीं विधायिकाओं  में सीधे-सीधे महिला सीट आरक्षण करने से महिला कैंडिडेट सिर्फ महिला सीट तक ही सीमित होकर न रह जाए जैसे कि 1990 के प्रारंभिक वर्षों में फिलिपींस, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशो में हुआ और ऐसे में सामान्य सीटों पर सक्षम होने पर भी महिला कैंडिडेट को नहीं उतरा गया। हालांकि वर्तमान बिल में सीटों के  रोटेशन का भी ज़िक्र किया गया है।  

दूसरी और पुरुष कैंडिडेट्स के महिला चेहरों को उतरना  जैसी समस्या, ग्राम प्रधान-पति  आदि के रूप में लोकल बॉडीज में भी झेली जा चुकी है। सक्षम दावेदारों के ईमानदार चयन हेतु राजनीतिक दलों को अपने आंतरिक ढांचे में और अधिक लैंगिक तटस्थता लानी होगी।

कुल मिलाकर यदि महिला को धरातल पर राजनैतिक रूप से सशक्त करना है तो उसके सामाजिक और आर्थिक उत्थान के साथ साथ सभी संगठनो में भी महिला आरक्षण को प्रभावी रूप से लागू करना होगा, क्योंकि लैंगिक समानता सतत् विकास लक्ष्यों का एक सक्रिय हिस्सा भी है। यही कारण है कि  हाल ही में  ही में वैश्विक शक्तियों का साक्षी बनें G20 के दिल्ली घोषणा-पत्र में प्रधानमंत्री ने “वीमेन लेड डेवलपमेंट” के अपने संकल्प की ऒर बढ़ते हुए युग परिवर्तन का आगाज़ किया है और इस परिपेक्ष में संसद से प्रधानमंत्री का महत्वपूर्ण सन्देश आज भारतीय राजनीती में महिलाओं की वास्तविक हैसियत बताने के लिए पर्याप्त है कि “आज तक भारत के लोकतंत्र के इतिहास में कुल मिलाकर साढ़े सात हज़ार सांसद चुने गए जिसमें से मात्र 650 महिलाएं ही संसद तक पहुंच पाई” तो असल प्रश्न यह उठता है कि क्या कई-कई बार बहुमत की मलाई खा चुकी पूर्व की सरकारें इतनी अपाहिज थी कि नारीशक्ति के बिल को पास नहीं करा सकती थी या करवाने की मंशा नहीं थी। 


मात्र एक राजनैतिक एजेंडा बनाकर इसे हर बार चुनाव में इस्तेमाल करना था, इसलिए नारी सशक्तिकरण के ठेकेदार सत्तापक्ष द्वारा अभी महिला के लिए लागू की गई योजनाओ जैसे  तीन तलाक हटाने, शौचालय बनवाने से लेकर गृहस्वामिनी बनवाने तक को एक जुमला करार देना बंद करे और बुद्धिजीवी जवाब दे, क्या भारत के क़ानून के इतिहास में बहु चर्चित शाहबानों केस पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय को रातोंरात पलट कर मुस्लिम महिलाओ से मुआवज़े तक का हक़ छीन लेने वाली पार्टी क्या कभी महिलाओं की संसद जाने की राह आसान कर सकती थी?

 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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