नारीशक्ति वंदन अधिनियम संसोधन के लिए संसद का तीन दिवसीय विशेष सत्र 16 अप्रैल से शुरू है। संसद के इस विशेष सत्र में इस पर चर्चा होना है ताकि महिलाओं के लिए आरक्षण संबंधी 2023 के संवैधानिक प्रावधानों को लागू किया जा सके। यह संसोधन 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन की अनुमति देकर, भविष्य की जनगणना और पूर्ण परिसीमन पर निर्भरता को समाप्त करता है।
दरअसल, सितंबर 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित होने के साथ ही राजनीतिक सशक्तिकरण को संस्थागत् रूप दे दिया गया। इस अधिनियम ने भारी संसदीय समर्थन के साथ लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण सुनिश्चित किया। यह नवीनतम संसोधन भविष्य की जनगणना का इंतजार करने की आखिरी शर्त को हटा देता है और 2011 के आंकड़ों का उपयोग करके परिसीमन को संभव बनाता है। यह सुनिश्चित करता है कि 2029 के चुनावों तक, एक तिहाई विधायक महिलाएं होंगी। यह उनका संवैधानिक अधिकार होगा न कि कोई राजनीतिक रियायत!
हालांकि प्रयास पहले भी हुआ था लेकिन नीति व नियत के अभाव में आधे अधूरे मन से। महिला आरक्षण विधेयक जिसे पहली बार 1996 में प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा के कार्यकाल में पेश किया गया था। लगभग तीन दशकों तक कानून का रूप नहीं ले पाया। राजनीतिक अस्थिरता और आम सहमति की कमी के कारण यह विधेयक बार बार निष्प्रभावी हो जाता था। 1999 से 2004 के बीच अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्ववाली सरकार ने इसे पास करने के कई प्रयास किए, लेकिन सपा और राजद जैसी पार्टियों से कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। संसद में रुकावटें और ओबीसी आरक्षण को प्राथमिकता देने की मांगों के कारण प्रगति रुक गई। यूपीए काल के दौरान राज्यसभा में विधयेक पारित होने के बावजूद इसे कभी भी लोकसभा में पेश नहीं किया गया।
बहरहाल, मोदी सरकार 2023 में कानून पास करके और 2026 के संसोधन के माध्यम से इसके कार्यान्वयन में तेजी लाकर, दशकों से चले आ रहे गतिरोध को सुलझाने वाली सरकार के रूप में प्रस्तुत किया है। यह कांग्रेस की निष्क्रियता के बिल्कुल विपरीत है। यह सुधार लंबे समय से बंद दरवाजे को खोलने सरीखा है। जो यह सुनिश्चित करता है कि 2029 तक संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई सदस्य महिलाएं होंगी। यह भारतीय राजनीति में पारंपरिक वोट बैंक की गतिशीलता से परे एक संरचनात्मक बदलाव का संकेत है।
16 से 18 अप्रैल तक संसद के इस विशेष सत्र में, केंद्र शासित प्रदेश क़ानून (संशोधन) विधेयक 2026, संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 और परिसीमन विधेयक 2026 यह 3 विधेयक पेश किये जायेंगे। संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 में प्रस्ताव है कि लोकसभा में अधिकतम 850 सीटें होंगी। इनमें 815 सीटें राज्यों से और 35 केंद्र शासित प्रदेशों से। फ़िलहाल लोकसभा में 543 सीटें हैं और संविधान में इनकी अधिकतम संख्या 550 तय की गई है। विधेयक में संविधान के अनुच्छेद 81 में संशोधन का भी प्रस्ताव है, ताकि 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों की संख्या पर लगी रोक को हटाया जा सके।
अनुच्छेद 81 के इन्हीं प्रावधानों की वजह से 1976 से ही लोकसभा की सीटों की संख्या में इजाफा नहीं हुआ है। तो अगर मौजूदा लोकसभा का आधार 1971 की जनगणना थी, तो लोकसभा की सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव किस आधार पर दिया जा रहा है? इस सवाल का जवाब डीलिमिटेशन बिल (परिसीमन विधेयक 2026) में है, जिसे भी विशेष सत्र में पेश किया जाएगा।
फिलहाल लोकसभा में 78 महिला सांसद (कुल सीटों का 14%) और राज्यसभा में 42 महिला सांसद (कुल सीटों का 18%) है। सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की एक प्रेस रिलीज़ मुताबिक़, दुनिया भर में महिला सांसदों का प्रतिनिधित्व औसतन 27.2% है। यानी भारत में महिलाओं का संसद में प्रतिनिधित्व दुनिया की तुलना में काफी कम है। जबकि महिला संगठनों और महिला सांसदों ने दशकों से महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग उठाई है। इन तीनों विधयेक के पारित होने के बाद लोकसभा और विधानसभा की सीटों की संख्या बढ़ेगी तो उसी अनुपात में राज्यसभा व विधानपरिषद की सीटों की संख्या भी बढ़ेगी।
एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी तो हर राजनीतिक दल को एक तिहाई महिलाओं को उम्मीदवार बनाना मजबूरी होगी। यह बिल्कुल वैसे ही होगा जैसे अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति सीटों के मामले में होता है।
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