आजकल अखबार हर सुबह कुछ बिकने की, कुछ डूबने की खबरें लेकर ही दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। आधा दर्जन से अधिक सरकारी कंपनियां डूबने की कगार पर हैं, कुछ ने तो दम तोड़ दिया है। देश में बेरोजगारी नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है। अर्थव्यवस्था पीठ पर ऑक्सीजन का सिलेंडर बांधे है। रुपया को तो यूपीए-2 ने ही गिरा दिया था, इस सरकार के राज में अब उसकी कब्र खुदने लगी है।
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) की तरफ से जारी आंकड़ों के अनुसार फरवरी 2019 में बेरोजगारी दर ने 7.2 फीसदी का आंकड़ा छू लिया। जो कि 45 साल में सबसे अधिक है। महिलाओं के खिलाफ अपराध की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं, लेकिन सरकार मान रही है कि सब कुछ फर्स्ट क्लास है।
एयरपोर्ट की नीलामी के लिए बोलियां लग रही हैं, बीएसएनएल और भारत पेट्रोलियम जैसी आपार संभावनाओं वाली कंपनियां बिकने के लिए तैयार हैं। रेलवे के गले में भी ऐतिहासिक घाटे की तख्ती लटक ही गई है। एयर इंडिया आसमान से जमीन पर धड़ाम है। कश्मीर, राम मंदिर और सीएबी के मुद्दों के बीच आम आदमी की बातें और उसके जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दे हाशिए पर हैं।
दरअसल, नोटबंदी का असली असर अब दिखाई दे रहा है। नोटबंदी की वजह से छोटे व्यवसायों पर गहरा असर पड़ा है। लगभग 35 लाख नौकरियां गईं हैं और छोटे व्यवसाय अब तक उबर नहीं पाए हैं। ऊपर से रही सही कसर जीएसटी ने पूरी कर दी है। अपने दूसरे कार्यकाल में पहले से मजबूत बहुमत के साथ सत्ता संभालने वाली मोदी सरकार के सामने इस समय ज्यादा चुनौतियां हैं। खास बात यह है कि सरकार को पता है कि चुनौतियां हैं, लेकिन उसे स्वीकार करने में उसकी इमेज का छोटा होना उसे कतई पसंद नहीं।
तेजी से बढ़ी बेरोजगारी
रोजगार के मोर्चे पर बात करें तो बड़े शहरों में सबसे अधिक नौकरियां रियल स्टेट सेक्टर ने दी है। जहां एक ओर थोड़ी बहुत शिक्षा में लोगों ने कम पैसे में ही रोजगार हासिल किया तो वहीं रियल स्टेट ने गांवों से आए हजारों की संख्या में मजदूरों को भी रोजगार दिया। लेकिन नोटबंदी के बाद से ये सेक्टर ऐसा टूटा की अभी तक संभल नहीं पाया है।
खास बात यह है कि रोजगार के मोर्चे पर पहले से ही फेल सरकार के लिए दूसरे कार्यकाल में रोजगार का संकट ज्यादा बड़ा हो गया है, लेकिन सरकार इस पर ध्यान देने की बजाए वह ऐसे मुद्दों पर बहस कर रही जिससे भविष्य में उसे राजनीतिक मुनाफा मिले और वह इसमें सफल भी हो रही है। जनता के लिए सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि कांग्रेस के नेतृत्व में उसे कमजोर विपक्ष मिला है जिसकी संसद में डूबती आवाज कहीं पहुंच ही नहीं पा रही।
इधर, नागरिकता संशोधन बिल भी देश की संसद में बुधवार को पास हो गया। जिस वक्त सरकार जिन लोगों के लिए सदन में सीएबी को पास कराने के लिए बहस कर रही थी, उस वक्त वही लोग सड़कों पर उतर इस बिल के खिलाफ नारे लगा रहे थे, जो अब भी जारी है और हिसंक रूप ले चुका है।
सदन में देश के गृह मंत्री ने कांग्रेस पर देश को धर्म के आधार पर बांटने का आरोप लगाया। तमाम विरोध के बावजूद बिल पास हुआ, क्योंकि सरकार के पास नंबर थे, लेकिन सरकार से यह भी जरूर पूछा जाना चाहिए कि देश में वैध रूप से रह रहे नागरिकों को मूलभूत सुविधाएं कब मिलेंगी? प्रदूषण के कारण गैस चैंबर बनी दिल्ली, बदहाल किसान और बेरोजगार नौजवान के मुददे पर भी सरकार संसद में कोई बिल पेश करेगी क्या? जिससे इनके हालात सुधर जाएं।