नैनीताल हाईकोर्ट पहुंचा मामला
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पहली बार नही मलजल बहाने की शिकायत
सनातन धर्मावलम्बियों के चार सर्वोच्च धामों में से एक बद्रीनाथ में मलजल की बेतरतीव निस्तारण से उत्पन्न गंदगी की शिकायत पहली बार नहीं है। इससे पहले 15 जून 2018 को चेतना भरद्वाज नाम की महिला की जनहित याचिका पर नैनीताल हाइकोर्ट की जस्टिस वी.के. बिष्ट और जस्टिस अलोक सिंह की खण्डपीठ ने इसी मुद्दे को लेकर केन्द्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया था। यही नहीं सन् 2005 में भी हाइकोर्ट के समक्ष यह मुद्दा उठा था।
नैनीताल हाइकोर्ट में जा चुका है मामला
अपनी पीआइएल में चेतना भारद्वाज ने शिकायत की थी कि बद्रीनाथ मंदिर से 500 मीटर से भी कम दूरी पर अलकनन्दा नदी के किनारे मानकों की अनदेखी कर एसटीपी लगाया गया है। इसके निकट अन्न क्षेत्र आश्रम है जहां बड़ी संख्या में साधू सन्तों को भोजन कराया जाता है। जबकि वहां बदूबू फैली रहती है।
चेतना ने अपनी याचिका में कहा था कि उन्होंने 6 जून 2018 को एसटीपी का दौरा किया तो वह हैरान रह गईं। नदी किनारे एक आवासीय और धार्मिक क्षेत्र में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट न केवल नामामि गंगे कार्यक्रम के उद्देश्य को विफल करता है अपितु वहां के निवासियों और वहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए तनाव और बीमारी पैदा करता है। याचिका में कहा गया है कि प्लांट को पहले मंदिर से काफी दूर जोशीमठ मार्ग पर अलकनन्दा वन्य विहार में लगाया जाना था लेकिन बाद में प्लांट खाक चैक पर लगा दिया गया।
नमामि गंगे परियोजना का हो रहा उद्धेश्य विफल
नमामि गंगे कार्यक्रम एक एकीकृत संरक्षण मिशन है, जिसे केंद्र सरकार द्वारा जून 2014 में 20,000 करोड़ रुपये के बजट परिव्यय के साथ राष्ट्रीय नदी गंगा के प्रदूषण, संरक्षण और कायाकल्प के प्रभावी उन्मूलन के दोहरे उद्देश्यों को पूरा करने के लिए ‘फ्लैगशिप प्रोग्राम’ के रूप में अनुमोदित किया गया था।
नमामि गंगे परियोजना के 2021 के आंकड़ों के अनुसार परियोजना के तहत उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान राज्यों में 48 सीवेज प्रबंधन परियोजनाएं कार्यान्वित की जा रही हैं और 99 सीवेज परियोजनाएं पूरी की जा चुकी हैं। इन राज्यों में 27 सीवेज परियोजनाएं निविदा के अधीन हैं और 8 नई सीवेज परियोजनाएं शुरू की गई हैं। 5658.37 (एमएलडी) की सीवरेज क्षमता सृजित करने का कार्य निर्माणाधीन है।
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