नागालैंड पूर्वोत्तर का पहला राज्य है जहां किसी चुनाव में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का प्रावधान लागू किया गया है।
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बीते दो दशकों के दौरान राज्य में इस मुद्दे पर भारी हिंसा होती रही है। वर्ष 2017 में तो इस मुद्दे पर हुई हिंसा में कम से कम दो लोगों की मौत हो गई थी और बड़े पैमाने पर तोड़-फोड़ और आगजनी हुई थी। उसके बाद चुनाव स्थगित कर दिए गए थे। आदिवासी संगठनों के विरोध के कारण तब मुख्यमंत्री टी आर जेलियांग को भी अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था।
उस साल राज्य में एक फरवरी को शहरी निकाय चुनावों के लिए मतदान होना था। इस मौके पर टी आर जेलियांग के नेतृत्व वाली नागा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) सरकार, जिसमें बीजेपी भी साझीदार थी, ने महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण पर मुहर लगा दी। लेकिन विभिन्न नागा संगठनों ने बड़े पैमाने पर इसका विरोध शुरू कर दिया।
दूसरी ओर, महिला संगठन नागा मदर्स एसोसिएशन भी अबकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के हवाले आरक्षण की मांग पर अड़ा रहा। इसी पर टकराव शुरू हुआ। हालात इतने बेकाबू हो गए कि राज्य में सेना उतारनी पड़ी और हिंसा में दो लोगों की मौत हो गई। आखिर राज्यपाल ने इन चुनावों को रद्द कर दिया था।
दरअसल, वर्ष 2012 में नागा मदर्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में अदालत से शहरी निकायों में महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण मुहैया कराने के लिए राज्य सरकार को निर्देश देने की अपील की थी।
दो साल चली सुनवाई के बाद बीते साल अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने उसके पक्ष में फैसला सुनाया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हुए सरकार ने इन चुनावों के लिए मतदान कराने का फैसला किया। उसके बाद महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण को मंत्रिमंडल की हरी झंडी मिल गई।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि नागालैंड पूर्वोत्तर का पहला राज्य है जहां किसी चुनाव में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का प्रावधान लागू किया गया है। राज्य में अक्सर राजनीतिक दलों पर महिलाओं की अनदेखी करने के आरोप लगते रहे हैं। लेकिन अब यह चुनाव एक नई मिसाल कायम कर सकता है।
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