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थाईलैंड-म्यांमार भूकंप: भारत के लिए खतरे की चेतावनी, आखिर कितने अलर्ट हैं हम?

सार

वैज्ञानिक मानते हैं कि भारतीय प्लेट हर साल लगभग 5 सेमी की गति से उत्तर की ओर खिसक रही है और यूरेशियन प्लेट के नीचे धंस रही है। यह टकराव सतह के नीचे जबरदस्त तनाव उत्पन्न कर रहा है, जिससे कभी भी विनाशकारी भूकंप आ सकता है। तिब्बत में लगातार दर्ज हो रहे छोटे-बड़े झटके इस बात के संकेत हैं कि यह क्षेत्र एक बड़े भूकंप की ओर बढ़ रहा है। यदि यह संचित ऊर्जा एक बार में मुक्त होती है, तो इसका प्रभाव किसी परमाणु विस्फोट से अधिक विनाशकारी हो सकता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह भूकंप 8.5 से 9.0 तीव्रता का हो सकता है, जो पूरे उत्तर भारत को झकझोर सकता है और हिमालयी राज्यों में भयानक तबाही मचा सकता है।

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भूकंप एक प्राकृतिक घटना है, जो आनी ही है और इसे रोका भी नहीं जा सकता। हमें केवल ऐसी प्राकृतिक व्यवस्था के साथ जीना सीखना होगा। - फोटो : Self
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विस्तार
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थाईलैंड-म्यांमार का विनाशकारी भूचाल वहां जो तबाही मचा चुका है, वह बेहद दुखद और चिंताजनक तो है ही, लेकिन भारत के लिए और खासकर भूकंप के लिए अति संवेदनशील हिमालयी राज्यों के लिए सजग रहने की एक चेतावनी भी है, क्योंकि म्यांमार से लेकर जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख तक निरंतर भूकंप के झटके आ रहे हैं। तिब्बत में तो शायद ही कोई दिन हो जब वहां भूकंप के झटके महसूस न किए जाते हों, जबकि यूरेशियन प्लेट में स्थित तिब्बत के भूकंपों का कारण ही हिमालय और इंडियन टेक्टोनिक प्लेट है।

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नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी के डैशबोर्ड पर अगर नजर डालें तो अकेले 28 मार्च को म्यांमार में रिक्टर स्केल पर 4 से लेकर 7.5 परिमाण के 9 झटके दर्ज किए गए हैं। उसी दिन म्यांमार से लगे मणिपुर के कामजौंग और चंदेल तथा मेघालय के गारो हिल्स में भी भूकंप दर्ज किए गए।


उत्तराखंड के चमोली में भी उसी दिन 3.2 परिमाण का भूकंप दर्ज किया गया। अगर 15 मार्च से लेकर 29 मार्च तक के आंकड़े देखें तो जम्मू-कश्मीर और लद्दाख से लेकर पूर्वोत्तर तक के हिमालयी राज्यों में 17 और तिब्बत में 8 भूकंप दर्ज किए गए हैं। ये झटके स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि भारतीय टेक्टोनिक प्लेट और खासकर हिमालय का भूगर्भ अशांत है। केवल हिमालय ही नहीं, अफगानिस्तान तक हिंदूकुश का भूगर्भ भी मचल रहा है और इसका कारण भूवैज्ञानिक धरती के अंदर निरंतर जमा हो रही भूगर्भीय ऊर्जा को मानते हैं, जो कि बाहर निकलने के लिए मचल रही है।

भूकंप एक प्राकृतिक घटना है, जो आनी ही है और इसे रोका भी नहीं जा सकता। हमें केवल ऐसी प्राकृतिक व्यवस्था के साथ जीना सीखना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सतर्कता और सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव है। भूकंप स्वयं किसी को नहीं मारता, बल्कि उसके कारण कमजोर या अवैज्ञानिक तरीके से बनी इमारतें गिरती हैं और जनहानि होती है।

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इस संदर्भ में, 2001 में आए भुज भूकंप (6.9 तीव्रता) और 1993 के लातूर भूकंप (6.4 तीव्रता) में हजारों लोगों की मौत हुई थी, क्योंकि वहां की निर्माण शैली भूकंपरोधी नहीं थी। वहीं, 1991 में उत्तरकाशी (6.6 तीव्रता) और 1999 में चमोली (6.8 तीव्रता) में आए भूकंपों के दौरान हताहतों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम रही—उत्तरकाशी में लगभग 700 और चमोली में 103 लोगों की जान गई। जबकि तीव्रता लगभग समान थी, लेकिन हिमालयी क्षेत्रों में घर अपेक्षाकृत हल्की सामग्री से बने थे, जिससे क्षति कम हुई। इससे यह स्पष्ट होता है कि यदि निर्माण कार्य वैज्ञानिक तरीकों से किए जाएं, तो भूकंप से होने वाले नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है।

वैज्ञानिक मानते हैं कि भारतीय प्लेट हर साल लगभग 5 सेमी की गति से उत्तर की ओर खिसक रही है और यूरेशियन प्लेट के नीचे धंस रही है। यह टकराव सतह के नीचे जबरदस्त तनाव उत्पन्न कर रहा है, जिससे कभी भी विनाशकारी भूकंप आ सकता है। तिब्बत में लगातार दर्ज हो रहे छोटे-बड़े झटके इस बात के संकेत हैं कि यह क्षेत्र एक बड़े भूकंप की ओर बढ़ रहा है। यदि यह संचित ऊर्जा एक बार में मुक्त होती है, तो इसका प्रभाव किसी परमाणु विस्फोट से अधिक विनाशकारी हो सकता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह भूकंप 8.5 से 9.0 तीव्रता का हो सकता है, जो पूरे उत्तर भारत को झकझोर सकता है और हिमालयी राज्यों में भयानक तबाही मचा सकता है।

हिमालयी क्षेत्र में 100 वर्षों से कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है। 1897 में असम (8.1 तीव्रता), 1905 में कांगड़ा (7.8 तीव्रता), 1934 में बिहार-नेपाल (8.0 तीव्रता) और 1950 में असम-तिब्बत (8.6 तीव्रता) के बाद इस क्षेत्र में कोई बड़ा भूकंप नहीं हुआ है। इस वजह से पिछले एक सदी में यहां विशाल मात्रा में भूकंपीय ऊर्जा जमा हो चुकी है। जब यह ऊर्जा मुक्त होगी, तो हिमालयी क्षेत्र में भारी विनाश होगा। हजारों इमारतें, पुल और सड़कें ध्वस्त हो सकती हैं, ग्लेशियर टूट सकते हैं और बड़े पैमाने पर भूस्खलन और बाढ़ आ सकते हैं। टिहरी और भाखड़ा नंगल जैसे जलाशय भी खतरे में हैं, जो यदि भूकंप के प्रभाव में टूटते हैं, तो पूरे उत्तर भारत में जल प्रलय आ सकता है।

इस स्थिति को देखते हुए भारत को तत्काल सावधान होने की जरूरत है। भूकंपरोधी निर्माण नियमों को सख्ती से लागू करना होगा, पुरानी इमारतों को मजबूत करना होगा और नई इमारतों को वैज्ञानिक मानकों के अनुसार बनाना होगा। आपदा प्रबंधन को आधुनिक तकनीकों से लैस करना होगा और भूकंप पूर्वानुमान प्रणाली को विकसित करना होगा। जापान की तरह मोबाइल अलर्ट सिस्टम शुरू किया जाना चाहिए, जिससे लोगों को भूकंप आने से पहले चेतावनी मिल सके। स्कूलों, कॉलेजों और दफ्तरों में भूकंप सुरक्षा प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाना चाहिए।

सबसे जरूरी बात यह है कि सरकार और आम जनता इस खतरे को गंभीरता से लें। अगर समय रहते सुरक्षा उपाय नहीं किए गए, तो यह संभावित आपदा लाखों लोगों की जान ले
 

सकती है और भारत की अर्थव्यवस्था को गहरा आघात पहुंचा सकती है। थाईलैंड और म्यांमार में आया भूकंप केवल एक आपदा नहीं, बल्कि एक संकेत है—एक चेतावनी कि हिमालय के गर्भ में विनाश पल रहा है और हमें अभी से तैयार हो जाना चाहिए।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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