देश में किसी निचली अदालतों द्वारा सुनियोजित हत्याओं के दो अलग-अलग लेकिन समान प्रवृत्ति के मामलों में बैक-टू-बैक फांसी देने का संभवत: यह पहला मामला है। दोनों मामलों में पुरुष प्रेमियों के साथ उनकी शादी शुदा प्रेमिकाएं भी समान रूप से दोषी पाई गई हैं। बल्कि यूं कहें कि हत्याकांडों की ये महिलाएं ही मास्टर माइंड रही हैं।
नफरत और प्यार में अंधी होकर इन महिलाओंने अपने पतियों/ मंगेतरों की जिस ढंग से निर्मम और असाधारण तरीके से हत्याएं की है, वह आज के समाज में आपसी रिश्तों के प्रति महिलाओं के बदलते सोच, समझ और मान्यताओं का दुर्भाग्यपूर्ण परिचायक है।
पुरुष तो अमूमन महिलाओं पर अत्याचार और शोषण आदि के लिए बदनाम थे ही, लेकिन अब महिलाएं और खासकर युवा महिलाएं, जो आम तौर पर इक्कीसवीं सदी में जन्मी और पली-बढ़ी हैं, ऐसी हत्याओंको बहुत शातिर तरीके से अंजाम दे रही हैं और अपने किए पर उन्हें कोई पछतावा भी नहीं है।
इन सभी घटनाक्रमों में एक विरोधाभास भी है, वो ये कि जहां एक तरफ ये महिलाएं कथित पारिवारिक बदनामी के डर से अपने माता-पिता की पसंद के युवक के साथ शादी या सगाई करने से खुलकर इंकार करने की हिम्मत नहीं जुटा पातीं, वहीं दूसरी तरफ वो अपने पति या मंगेतर की निर्मम हत्या करने या कराने में जरा भी संकोच का अनुभव नहीं करतीं। बिना यह सोचे कि इस तरह के कृत्य से उनके मां बाप और परिजों की समाज क्या इज्जत रह जाएगी?
ऐसे भयंकर और दुष्टतापूर्ण हत्याकांड को अंजाम देने के बाद वो समाज में कितने मुंह दिखाने लायक रह जाएंगे? कुछ लोगों का मानना है कि पत्नियों/ मंगेतरों का यह व्यवहार समाज के पारंपरिक मूल्यों और परिवार व्यवस्था के प्रति क्रूर बगावत है। वो जीवन को अपने मर्जी से, अपनी जिद और जुनून के साथ ही जीना चाहती है। इसमें उन्हें किसी दूसरे का दखल बर्दाश्त नहीं। या फिर वो यह बताना चाहती हैं कि सदियों से पुरुषों उनके साथ जो किया है, उसके मुकाबले यह कुछ भी नहीं है। लेकिन यह बगावत भी है तो बगावत करने के तो और भी शालीन तरीके हैं। अलग होने के कई कानूनी रास्ते हैं।
आपसी समझदारी से भी अनचाहा रिश्ता तोड़ा जा सकता है। लेकिन ऐसा लगता है ऐसी युवतियों की गहरी मानसिक दुविधा, अंतर्द्वद्व और आपराधिक सोच अब उन्हें आधुनिक और स्वंतत्र बनाने के साथ साथ क्रूर षड्यंत्रकारी और हत्यारा भी बना रहा है।
बेशक नारी कभी चंडी बनती है, पर...
ये हत्यारी महिलाएं सुशिक्षित हैं और इंटरनेट के जरिए हत्या के सभी आधुनिक तौर तरीके देख, सीख, समझ और आजमा रही हैं। नारी मन का यह रूप यह मानसिकता उसके परंपरागत गुणों संवेदनशीलता और ममत्व के आग्रह से बिल्कुल हटकर और इन सबके विपरीत है। बेशक नारी कभी चंडी भी बनती है, लेकिन उसका यह अवतार दुष्टों के दलन के लिए है। केवल अनिच्छा को निर्मम हत्या के जरिए उचित ठहराने के लिए तो कतई नहीं है।
चाहे स्थापित मान्यताओं के प्रति विद्रोह कहें या फिर ऐसी नकारात्मक सोच, जो मानवीय रिश्तों के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओंकी भी हत्या करने को गलत नहीं मानती। चिंता की बात यह है कि ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
इस दृष्टि से पिछले साल मार्च में मेरठ में चर्चा में आए नीले ड्रम कांड ने समूचे देश को हिला दिया था। इसमें पत्नी और दो बच्चों की मां मुस्कान रस्तोगी ने अपने प्रेमी सौरभ शुक्ला के साथ मिलकर पति सौरभ राजपूत को मार कर काटा और कटे अंग नीले ड्रम में सीमेंट के घोल में दबा दिए। उसके बाद मई में चर्चा में आया राजा रघुवंशी कांड भी अपनी तरह का पहला मामला था, जिसमें पत्नी सोनम ने ही प्रेमी राज कुशवाहा के साथ पति राजा को पहाड़ी से धकेल कर ठिकाने लगाया।
केतन-सिया का मामला
इसी साल जून में केतन अग्रवाल हत्याकांड में मंगेतर सिया अग्रवाल ने प्रेमी चेतन चौधरी के साथ केतन को पहाड़ी से धक्का देकर यमलोक पहुंचा दिया। इनमें पहले दो मामलों में महज दो दिन के भीतर चार दोषियों को फांसी की सजा सुनाई। इन फैसलों के बाद अपने पतियों की हत्या के मामले में जेल में बंद महिला आरोपियों की बेचैनी और बढ़ गई। पति या मंगेतर को मारते वक्त उन्हें कोई डर नहीं लगा, लेकिन अब अपनी मौत सामने देखकर वो विचलित हो रही हैं।
पिछले साल मेरठ के ब्रह्मपुरी में हुए सौरभ राजपूत हत्याकांड और बहसूमा के अकबरपुर सादात गांव में हुए अमित हत्याकांड ने देशभर में सुर्खियां बटोरी थीं। लगभग एक महीने के अंतराल पर हुईं इन दोनों वारदातों में पत्नियों ने अपने प्रेमियों के साथ मिलकर पतियों की हत्या की खौफनाक साजिश रची थी।
सौरभ हत्याकांड में जहां पत्नी मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल ने हत्या के साक्ष्य छिपाने के लिए सौरभ की लाश को नीले ड्रम में भरकर सीमेंट से चिन दिया था और दोनो छुट्टियां मनाने पहाड़ों पर चले गए थे।
अदालत ने अपने फैसले में माना कि यह अत्यंतक्रूर और बर्बर श्रेणी का अपराध है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि केवल शव के टुकड़े करना ही जघन्य अपराध नहीं है। पवित्र रिश्तों, भरोसे और शादी के सात वचनों को तोड़ना भी गंभीर अपराध है। ऐसे मामलों में मृत्युदंड न देना न्याय के प्रति नरमी मानी जाएगी।
दूसरे मामले में मेरठ मेरठ के बहसूमा क्षेत्र के गांव अकबरपुर सादात निवासी अमित कश्यप उर्फ मिक्की कश्यप हत्याकांड में अदालत ने उसकी पत्नी रविता और उसके प्रेमी अमरदीप को मृत्युदंड की सजा सुनाई।
यह घटना अप्रैल 2025 की है। इसमें आरोपी पत्नी ने प्रेमी अमरदीप के साथ पति अमित की हत्या कर उसे सांप से डसवाने का ड्रामा रचा। जांच में सामने आया कि जिस सांप से डसवाया गया था, उसके दांत ही नहीं थे। जज ने अपने फैसले में सती सावित्री का जिक्र करते हुए कहा कि पति की लंबी उम्र के लिए पत्नी करवाचौथ का व्रत करती है, लेकिन यहां प्रेमी के साथ ये कृत्य किया जो माफी लायक नहीं है।
मेरठ जिले की इन दो क्रूर घटनाओं के बाद तो मानो ऐसी षड्यंत्र पूर्वक और घृणापूर्वक की गई हत्याओं का सिलसिला सा चल पड़ा। गोया इन सभी मुख्य आरोपी महिलाएं सौरभ राजपूत हत्याकांड की मुख्य आरोपी मुस्कान रस्तोगी से कई महिलाएं कु प्रेरणा ले रही हों।
केतन-सिया का मामला
कुछ ऐसी ही कहानी पुणे के केतन अग्रवाल हत्याकांड में दोहराई गई। उसकी मंगेतर सिया गोयल ने अपनी शादी केतन के साथ तय करने से नाखुश होकर प्रेमी केतन चौधरी के साथ मिलकर राजा रघुवंशी कांड की तरह लौहगढ़ किले की एक ऊंची चोटी से केतन को धक्का दे दिया। उसके साथ सिया ने ऐसा क्यों किया, यह जानने से पहले ही सम्पन्न परिवार के केतन को दुनिया छोड़नी पड़ी। इस मामले में भी पुलिस ने चार्ज शीट दाखिल कर दी है। सोनम रघुवंशी कांड के संदर्भ में इस प्रकरण में भी फांसी हो तो आश्चर्य नहीं।
बेशक निचली अदालत ने दो संगीन मामलों में फांसी की सजा सुनाकर इन घटनाओं को लेकर उभरे जनाक्रोश को कुछ हद तक शांत किया है। हालांकि दोषियों को फांसी पर अमल होगा या नहीं, होगा तो कब होगा, यह अभी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि कानून के हाथों की तरह कानून की गलियां भी बहुत लंबी होती हैं। फांसी की सजा की पुष्टि पहले हाई कोर्ट करेगा। उसके बाद अपील और दया के रास्ते खुले हैं।
महिलाओं को फांसी की सजा
वैसे भी भारत में महिलाओं को फांसी पर लटकाने के मामले अपवाद स्वरूप ही हैं। ऐसे ज्यादातर प्रकरणों में सजा- ए- मौत को ताउम्र कैद में बदला जाता रहा है। मानवतावादियों का मानना है कि फांसी की सजा देने भर से समाज में अपराध कम नहीं होते। सही है, लेकिन जघन्य और क्रूरतम अपराधों में दोषियों को कड़ा संदेश देना भी न्याय व्यवस्था और समाज को शरीफों के रहने लायक बने देने रहने के लिए जरूरी है।
एक और चिंता की बात यह है कि ऐसी निर्मम हत्याओं के लिए नए-नए तरीके खोजकर उन्हें आजमाया जा रहा है। ये हत्याएं किसी तात्कालिक आवेश का नतीजा नहीं थी। बल्कि सुनियोजित लंबी साजिश और आपराधिक दिमाग का नतीजा थीं। यह बात अलग है कि सच्चाई कभी न कभी उजागर हो ही जाती है। लेकिन इन्हें अंजाम देने वाली महिलाएं यह नहीं सोचतीं कि जिस मनमर्जी की खातिर वो ये सब कर रहीं हैं, वो पूरी शायद ही हो। मृत्युदंड से उन्हें छूट मिल भी जाए तो भी बाकी की जिंदगी सलाखों के पीछे ही कटनी है।
ऐसे में उन्हें हासिल क्या होना है, सिवाय समाज से मुंह छिपाए रखने के। लेकिन हत्यारी मानसिकता शायद इतना दूर का नहीं सोचती। वरना पति से अलग होने या मंगेतर से रिश्ता तोड़ने के लिए उनकी हत्या करना तो कतई जरूरी नहीं है।
हत्या और वो भी किसी निर्दोष की, जिसे खुद नहीं मालूम कि उसका गुनाह क्या है, पाशविकता है न कि अविवेक से किया गया मानवीय व्यवहार। बदलते वक्त में महिलाएं पुरुषों से हर मामले में बराबरी करें, स्पर्द्धा करें, यह अच्छी बात है, लेकिन पाशविकता और क्रूरता में पुरुषों को हराकर वो कौन सी ट्रॉफी जीत लेंगी?
--------------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।