जवानी जिंदगी का कोई तय मौसम नहीं है, न ही इसे वर्षों की गिनती से मापा जाता है। यह तो मन की एक अवस्था है, एक चमकदार नजरिया है, जिससे हम दुनिया को देखते हैं और उसे हमेशा नया पाते हैं। यह शरीर की कोमलता या अंगों की तेजी नहीं है, बल्कि इच्छाशक्ति की मजबूती, कल्पना की जीवंतता, और भावनाओं की जान है, जो दिल को हमेशा जवान रखती है।
कोई इन्सान सिर्फ जिंदगी में साल जोड़ने से बुजुर्ग नहीं होता, बल्कि वह तब वृद्ध होता है, जब उसके आदर्श फीके पड़ जाते हैं, जब वह सपनों को जीना छोड़ देता है और जब उसके मकसद की लौ धीमी पड़ जाती है। समय भले ही त्वचा पर लकीरें खींच दे, फिर भी उत्साह, आशा व विश्वास को नहीं खोना चाहिए। चिंता, डर और खुद पर शक आत्मा को गुलाम बना देते हैं, और मन के दायरे को सीमित कर देते हैं, लेकिन जिज्ञासा, साहस और आकांक्षा उसे नई ऊंचाइयों की ओर ले जाती हैं। चाहे कोई सोलह साल का हो या साठ बरस का, जब तक दिल में आश्चर्य की भूख, सीखने की प्यास, और विश्वास रहता है, जवानी हमेशा जिंदा और सांस लेती रहती है।
हर इन्सान की आत्मा के केंद्र में एक अदृश्य वायरलेस स्टेशन होता है, जो ब्रह्मांड से सुंदरता, खुशी, शक्ति और साहस के संदेशों को पाने के लिए हमेशा तैयार रहता है। जब तक ये सिग्नल आप तक पहुंचते रहते हैं, कोई भी उम्र आपको उम्रदराज नहीं कर सकती। असली दुश्मन बढ़ते हुए साल नहीं हैं, बल्कि वह पल है, जब आप अपनी अंदरूनी ताकत को कमजोर होने देते हैं।
अगर बीस साल की उम्र में आत्मा उम्मीद खो देती है, तो वह वृद्धावस्था है, पर अगर अस्सी साल की उम्र में भी अगर वह बढ़ने, कोशिश करने, सेवा करने और प्यार करने की इच्छा रखती है, तो जवानी बनी रहती है। जवानी वहीं रहती है, जहां मन जिज्ञासु व दिल बहादुर होता है, और आत्मा मकसद की आग से जलती है।