‘माही’ के खेल से रिटायर होने का मुझ जैसे क्रिकेट के अल्पज्ञानी के लिए क्या मतलब है? जीत को आदत में बदलने के आग्रही सेनापति की रणक्षेत्र से स्वैच्छिक निवृत्ति या फिर उस लाजवाब हेलीकाॅप्टर शाॅट का स्मृति के हैंगर पर हमेशा के लिए टंग जाना? एक लंबे बालों वाले मर्द क्रिकेटर का हर वक्त जूझने की मुद्रा में चौकस रहना या फिर विकेट के पीछे घात लगाए सजग विकेट कीपर का हमेशा के लिए ग्लव्स उतार देना? कोई निश्चित जवाब देना कठिन है।
असल में धोनी के कई चेहरे हैं, जिन पर क्रिकेट की वीर गाथाएं लिखी हैं। लिहाजा उनका संन्यास भी चौंकाने वाला था। इसलिए नहीं कि वह अचानक भूकंप के झटके की तरह आया था, बल्कि इसलिए था कि ‘कैप्टन कूल’ क्रिकेट से अपनी विदाई का ऐलान भी ‘सुबह की ठंडी ओस’ की तरह करेंगे, यह उम्मीद किसी को नहीं थी।
धोनी के क्रिकेट में उम्र कुछ दस्तक देने लगी थी, लेकिन वो अचानक और इस बेदर्दी के साथ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले लेंगे, यह झटका देने वाली बात थी। वरना लोग तो रिटायरमेंट उस घड़ी तक टालते रहते हैं, जब कि लोग उन्हें घर तक न छोड़ आएं।
बहरहाल शनिवार की शाम 7 बजकर 29 मिनट पर एक मैसेज इंस्टाग्राम पर नमूदार हुआ- ‘कंसीडर मी रिटायर्ड फ्राॅम 19:29। इसके बाद तो मानो खेल प्रेमियों और महान क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी (माही) के प्रशंसकों की शाम का एजेंडा ही बदल गया। इस का महत्व इसी बात से समझा जा सकता है कि धोनी के रिटायरमेंट के कारणों की व्याख्याक देश के एक और महान क्रिकेटर सुनील गावस्कर को करनी पड़ी।
गावस्कर ने कहा कि धोनी निश्चित तौर पर यह जानना चाह रहे थे कि आईपीएल में वो कैसा प्रदर्शन करते हैं। इसके बाद ही वो तय करते कि अगले टी-20 वर्ल्ड कप में खेलना है कि नहीं। चूंकि कोरोना वायरस के चलते आईपीएल पोस्टपोन हो गया और टी-20 वर्ल्ड कप भी दो साल तक के लिए टल गया तो धोनी को लगा होगा कि जब अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट ही नहीं है तो फिर हाथ में बल्ला थामे रखना भी बेमतलब है।
क्रिकेट एक ऐसा खेल है, जिसमें खिलाड़ी की उपलब्धियां आंकड़ों के स्क्रीन शाॅट पर नापी जाती हैं। इस लिहाज से धोनी के तरकश में कामयाबियों के इतने तीर हैं कि वो चाहे जब कह सकते हैं कि कौन सा तीर दिखाऊं? भारतीय क्रिकेट के वो सफलतम कप्तान तो रहे ही हैं, साथ में बेहतरीन विकेटकीपर और कुशल रणनीतिकार भी रहे हैं।
शायद भाग्य और क्रिकेट की ललक ही उन्हें बचपन में फुटबाॅल के मैदान से क्रिकेट की पिच तक खींच लाई और जन्म कुंडली में इतिहास रचने की अघोषित भविष्यवाणी ही धोनी को रेलवे टीटीई की नौकरी छुड़वाकर भारतीय क्रिकेट टीम के अब तक के सबसे सुनहरे दौर का टिकट कटवाने के लिए ले आई।
जिस कालखंड में सचिन तेंडुलकर को भारतीय क्रिकेट टीम की ‘स्थायी आस’ माना जाता था, उसी दौर में 2005 में लंबे बालों वाले एक मजबूत कद काठी वाले भारतीय क्रिकेटर ने पाकिस्तान दौरे के समय दुनिया का ध्यान खींचा। पता चला कि इस नए चेहरे का नाम महेंद्र सिंह धोनी है।
तब धोनी की चर्चा उनके क्रिकेट के साथ-साथ उनके गर्दन पर झूलते लंबे बालों के कारण भी होती थी। क्योंकि भारतीय क्रिकेट टीम में तब तक इस स्टाइल के बाल रखने वाला कोई क्रिकेटर सामने नहीं आया था। धोनी के उन बालों की तारीफ तब पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने भी की थी।
लेकिन जल्द ही हमने बालों से परे धोनी की उस क्रिकेट प्रतिभा का जलवा देखा, जिसने धोनी को धोनी बनाया। 2007 में हुए पहले टी-20 वर्ल्ड कप में धोनी की अगुवाईं में नौजवानों की टीम सीधे कप जीतकर ही लौटी। तब बस एक ही नारा गूंजता था ‘चक दे इंडिया।‘ हमे पहली बार अहसास हुआ कि ‘दे दनादन’ शैली में खेले जाने वाले क्रिकेट के इस फार्मेट के हम भी बादशाह हो सकते हैं।