एक बार जब छुट्टियां मनाने केलिए वे परिवार के साथ जा रहे थे। मार्केस ड्राइव कर रहे थे। अचानक उनके दिमाग में एक उपन्यास की पहली पंक्ति कौंधी और बस वहीं-के-वहीं उन्होंने यात्रा रोकी वापस मुड़े और सीधे लिखने बैठ गए। एक दो दिन नहीं अट्ठारह महीने लिखते रहे। जो पहली पंक्ति सूझी थी, वह थी-
‘बहुत सालों के बाद, जब उसने फ़ायरिंग स्क्वॉड का सामना किया...’ जिसका नतीजा हुआ उनका विश्व प्रसिद्ध, जादुई यथार्थवादी उपन्यास ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ़ सोलिट्यूड’। 1967 के इस उपन्यास की ख्याति ने उन्हें अमर कर दिया।
इस अट्ठारह महीने के दौरान कैसे घर की हर चीज बिक गई या गिरवी रख दी गई, कर्ज चढ़ गया और कैसे न केवल कर्ज चुकाया गया वरन् पूरा जीवन बदल गया, यह सब अब इतिहास है। इस उपन्यास की लाखों प्रतियां कुछ सप्ताह में बिक गई। अब तक इस किताब की पचास लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं और तीस भाषाओं में इसका अनुवाद उपलब्ध है। यह हिन्दी में भी उपलब्ध है। मजे की बात यह है, यह उपन्यास पहले उनके अपने देश में न प्रकाशित हो सका। पहले यह अर्जेंटीना में प्रकाशित हुआ। यह महागाथा एक परिवार की कई पीढ़ियों की कहानी ‘मैजिकल रियलिज्म’ की शैली में चित्रित करती है।
इस समयातीत गाथा के केंद्र में बुनेदिया परिवार है और यह मकांडो नामक काल्पनिक स्थान में घटित होती है। मार्केस द्वारा रचित यह काल्पनिक स्थान आज वास्तविक स्थान से अधिक प्रसिद्ध है। इस उपन्यास में क्या नहीं है। यहां अतीत है, प्रेम है, भाग्य और विश्वास है।
इसका कथानक एक ओर एक परिवार (असल में मार्केस परिवार) की गाथा कहता है, तो दूसरी ओर यह पूरे महादेश की कथा कहता है। स्पैनिश रॉयल अकादमी ने इसकी चालीसवीं वर्षगाँठ बड़ी धूमधाम से विशेष संस्करण निकाल कर मनाई। उन्होंने अब तक ऐसा केवल सर्वांतिस के डॉन क्विक्सोट (किहोटे) के लिए ही किया था।
जिंदगी में प्रारंभ से दोस्तों के बीच गैबिटो और गाबो के नाम से प्रेमपूर्वक पुकारे जाते मार्केस स्त्रियों से खूब प्रभावित रहे। उनकी मां-नानी उनके जीवन को दिशा देने में प्रमुख भूमिका निभाती हैं। नानी से सुने किस्से इस उपन्यास में समाहित हैं। युवा मार्केस के जीवन में उनकी प्रेमिका-पत्नी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। जब वे यह उपन्यास लिख रहे थे, उस सारे 18 महीने उनकी पत्नी मर्सडीज बार्चा पार्डो घर की देखभाल कर रहीं थीं। मार्केस अपने कमरे में बंद बस एक काम कर रहे थे, लिखना, लिखना और लिखना। मर्सडीज बार्चा पार्डो एक दशक से अधिक उनकी प्रेमिका थीं, दोनों ने 1958 में विवाह किया। इन दोनों के दो बेटे हैं, बड़ा बेटा रोड्रिगो फ़िल्म निर्देशक है, जबकि छोटा गोंज़ालो ग्राफ़िक डिजाइनर है।
6 मार्च 1927 को जन्में गैब्रियल गार्षा मार्केस ने ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ़ सोलिट्यूड’ के अलावा ‘क्रोनिकल ऑफ़ ए डेथ फ़ोरटोल्ड’, ‘ऑटम ऑफ़ द पैट्रियार्क’, ‘लव इन टाइम ऑफ़ कॉलरा’, ‘इन एविल ऑवर’, ‘द जनरल इन हिज लेबीरिंथ’, ‘लीफ़ स्ट्रोम’ आदि लिखा है। ‘लव एंड अदर डीमन्स’ उनका अंतिम उपन्यास था। विपुल लेखन करने वाले गैब्रियल गार्षा मार्केस और उनके काम पर बहुत लोगों ने लिखा, कई लोगों ने उनकी जीवनी लिखी। मार्टिन जेराल्ड ने करीब 700 पन्नों में ‘गैब्रियल गार्षा मार्केस एक लाइफ़’ नोबेल पुरस्कृत (1982) की जीवनी लिखी। वे खुद अपनी जीवनी तीन भागों में प्रकाशित करवाने का इरादा रखते थे, मगर 2002 में केवल एक भाग ‘लिविंग टू टेल द टेल’ ही प्रकाशित हो सका। इसके बाद उनकी तबियत बहुत खराब हो गई। गजब की याददाश्त वाले मार्केस को स्मृति-ह्रास होने लगा और फ़िर वे 17 एप्रिल 2014 को चल बसे।
क्या वेब सीरीज रचेगी इतिहास?
और अब इसी उपन्यास ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ़ सोलिट्यूड’ पर सीरियल बन रहा है। जबकि मार्केस अपने इस उपन्यास पर फ़िल्म बनाने के सख्त खिलाफ़ थे। हालांकि फ़िल्म की सीमा और साहित्य की असीमित शक्ति से परिचित थे। अत: उन्होंने कई लोगों द्वारा अकूत राशि का प्रस्ताव मिलने पर भी अपने सर्वाधिक प्रसिद्ध उपन्यास ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सोलिट्यूड’ का फ़िल्म बनाने का अधिकार किसी को नहीं दिया।
वैसे उनकी कुछ कहानियों और उपन्यासों पर फ़िल्म बनीं हैं। इनमें ‘आई ओनली केम टू यूज द फ़ोन’, ‘लव इन द टाइम ऑफ़ कॉलरा’, ‘क्रोनिकल ऑफ़ ए डेथ फ़ोरटोल्ड’, ‘ए वेरी ओल्ड मैन विद एनॉर्मस विन्ग्स’ और एरेंडीरा’ प्रमुख हैं। मार्केस ने तरह-तरह के काम किए।
लेखन में वे उपन्यासकार के तौर पर पहचाने जाते हैं, जबकि उन्होंने नायाब कहानिया लिखी हैं, लेख और स्क्रिप्ट लिखी हैं। विज्ञापन संस्थान के लिए काम किया है। टेलिविजन के लिए एक सोप ऑपेरा ‘आई रेंट माईसेल्फ़ आउट टू ड्रीम’ की स्क्रिप्ट लिखी। यह वेनेज़ुला में एक इंग्लिश गर्वनेस के जीवन पर आधारित कहानी है।
पत्रकारिता के जुनून के साथ-साथ मार्केस को फ़िल्म का भी चस्का था। उन्होंने बाकायदा फ़िल्म स्टडी की थी। अस्सी के प्रारंभ में उन्होंने क्यूबा की राजधानी हवाना में एक इंटरनेशनल फ़िल्म स्कूल की स्थापना की। उन्होंने फ़िल्म समीक्षा, स्क्रिप्ट लेखन का काम जम कर किया। मगर वे अपने उपन्यास ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सोलिट्यूड’ पर फ़िल्म बनाने का अधिकार किसी को नहीं देना चाहते थे।