अपनी तल्खियों के बावजूद, जाने वाला यह साल हम सभी को कुछ ऐसी यादों का तोहफा देकर जा रहा है जिसे आप हमेशा संभाल कर पास रखना चाहेंगे। इस महीने की पहली सुबह जब मेरी नजर अपनी मेज पर रखे टेबल-कैलेंडर को ठीक करते हुए लाल मोटे अक्षरों में लिखे ‘दिसंबर’ पर पड़ी तो सहसा गुलजार साहब की रचना ‘आने वाला पल जाने वाला है‘ स्मरण हो आई।
कैलेंडर के आखिरी लीफ को पलटने के साथ ही एहसास हुआ कि इस असाधारण वर्ष का अंत भी निकट आ ही गया। इस बरस अति सूक्ष्म नोवेल कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को जैसे अपने गोल कंटीले शरीर में उलझा कर रख दिया है। किसी अति रोमांचक टी -20 मैच की अंतिम कुछ गेंदों की भांति, लॉकडाउन, सोशल डिस्टैन्सिंग, क्वारेंटीन, मास्क , सैनिटाइजर, टेस्टिंग, पी.पी.ई. किट, वेंटीलेटर और काढ़ा जैसे गंभीर शब्दों के इर्द-गिर्द, अब साल 20-20 के भी कुछ ही दिन शेष रह गए हैं।
यह साल हमारे जीवन में जिस प्रकार की चुनौतियां तथा बदलाव लेकर आया है, एक वर्ष पूर्व उसकी कल्पना भी साधारण व्यक्ति के लिए लगभग नामुमकिन थी। आप और हम कई महीनों तक अपने घरों के गेट से बाहर नहीं निकले और हम में से बहुत सारे लोग अपने घरों के किसी अलग कमरे में हफ्तों क्वारेंटीन भी रहे।
लॉकडाउन की घोषणा के कुछ घंटों के भीतर ही शहर की तमाम व्यस्त सड़कें वीरान बन गई थीं। भोर में पार्कों की ताजा हवा, हमेशा गुलजार रहने वाली बाजारें, पॉश इलाकों की दिलकश रौनकें, चाय की दुकानों का कभी न चुपने वाला शोर, विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के आस-पास छात्रों की हर समय दिखने वाली चहल पहल - सब मानों पल भर में इतिहास बन गए थे।
मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे व चर्च जैसी जगहों पर भी अकीदतमंदों का आना थम सा गया था। इसी साल ऋषि कपूर तथा इरफान खान जैसे न जाने हमारे कितने प्रिय हमेशा के लिए हमसे जुदा हो गए। मुझे एक बुजुर्ग वकील मित्र के शव को कंधा न दे पाने का मलाल शायद जीवनभर रहेगा।
अभी भी, सुबह सडकों पर छोटे बच्चों के शोर से भरी स्कूल बसों की कमी शिद्दत से खलती है। इन सब तल्खियों ( कटुता ) के बावजूद यह साल हम सभी को कुछ न कुछ ऐसी अविस्मरणीय यादों का तोहफा देकर जा रहा होगा, जिन्हें सोचकर हम भविष्य में भी आनंदित होते रहेंगे। लॉकडाउन की घोषणा सुनते ही सिर्फ चार घंटों में महीने भर के सामान की फास्ट ट्रैक खरीदारी, घर की छतों को ही पार्क समझ वहीं पर प्रतिदिन कई किलोमीटर लंबी मॉर्निंग वॅाक, घर में किचन की तरफ कभी भूल से भी न जाने वाले लोगों का अचानक से मास्टर शेफ जैसा अवतरण, रोज शाम को मॉडल शॉप पर बिना नागा जाने वालों का महीनों तक घर पर बने जल-जीरा से ही संतोष, पड़ोस के घर से किसी की मात्र छींक पर ही उसे बिना बताए (एक जिम्मेदार नागरिक का फर्ज निभाते हुए ) तुरंत 100 नंबर पर फोन, किसी मास्क पहने व्यक्ति को दूर से आता देख ( उसको पहचान लेने के बावजूद भी) अपना रास्ता बदल देना, ताली-थाली और टॉर्च जैसी घटनाएं हमेशा गुदगुदाती रहेंगी।