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डराती है असामान्य मानसून की गर्जना

सार

मौसम विभाग के दीर्घकालिक पूर्वानुमान में इस साल देश के 80 प्रतिशत हिस्सों में जून से लेकर 30 सितंबर तक सामान्य से अधिक यानी कि 106 प्रतिशत वर्षा होने का अनुमान लगाया गया है।
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मानसून 2024 - फोटो : PTI
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विस्तार
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जयसिंह रावत

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भारतीय मौसम विभाग ने इस वर्ष सामान्य से अधिक गर्मी के साथ ही अधिक वर्षा का भी पूर्वानुमान जारी किया है। सामान्य से अधिक तापमान का अनुभव तो हो ही रहा है लेकिन अब सामान्य से अधिक वर्षा की बारी है जिसकी आशंका लोगों को अभी से डराने लगी है। क्योंकि मानसून प्रकृति की वह व्यवस्था है जो कि समस्त जीवधारियों के लिये वरदान है तो इसके विकराल हो जाने पर यह अभिशाप भी बन जाता है। सामान्यतः मानसून जून के पहले सप्ताह केरल में दस्तक देता है, लेकिन इस साल बादलों के फटने की शुरुआत पहाड़ों में पहले ही हो गयी है। उत्तराखण्ड में जंगलों में भड़की आग के बुझने से पहले ही 8 और 9 मई को चार जिलों में बादल फटने की घटनाओं ने भारी नुकसान पहुंचा दिया है।

अल नीनो और ला नीना जिम्मेदार मानसून के लिए

मौसम विभाग के दीर्घकालिक पूर्वानुमान में इस साल देश के 80 प्रतिशत हिस्सों में जून से लेकर 30 सितंबर तक सामान्य से अधिक यानी कि 106 प्रतिशत वर्षा होने का अनुमान लगाया गया है। सामान्यतः इस 80 प्रतिशत हिस्से में भी कहीं कम तो कहीं अधिक वर्षा हो सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार प्रशांत महासागर में दक्षिण अमेरिका के निकट यदि विषुवत रेखा के इर्द-गिर्द समुद्र की सतह अचानक गरम होनी शुरू हो जाए तो ‘‘अल नीनो’’ बनता है।
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यदि तापमान में यह बढ़ोतरी 0.5 डिग्री से 2.5 डिग्री के बीच हो तो यह मानसून को प्रभावित कर सकती है। इसका असर यह होता कि विषुवत रेखा के इर्द-गिर्द चलने वाली ट्रेड विंड कमजोर पड़ने लगती हैं। यही हवाएं मानसूनी हवाएं हैं जो भारत में बारिश करती हैं। ऐसी स्थिति में अल नीनो के ठीक विपरीत घटना होती है जिसे ‘‘ला नीना’’ कहा जाता है। ’’ला नीना’’ बनने से हवा के दबाव में तेजी आती है और ट्रेड विंड को रफ्तार मिलती है, जो भारतीय मानसून पर व्यापक प्रभाव डालती है।

मानसून जो वरदान भी और अभिशाप भी

मानसून का देश के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। यह राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और कृषि उत्पादन की जीवनरेखा भी है। लेकिन अति तो सर्वत्र वर्जित ही होती है। मानसून के रूप में प्रकृति का यह वरदान ‘‘अति’’ के कारण आपदाओं के रूप में अभिशाप भी बन जाता है।

मानसून संबंधी भारी वर्षा, बादल फटना और अचानक बाढ़ की घटनाएं बड़े पैमाने पर लोगों के हताहत होने के साथ सम्पत्तियों को भारी नुकसान पहुंचाती हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुमान के अनुसार देश में प्रति वर्ष बाढ़ से औसतन 75 लाख हेक्टेयर भूमि प्रभावित होती है और हजारों लोगों की जानें जाती हैं।

हजारों लोग गंवा बैठते हैं जानें

सेंटर फॉर साइंस एण्ड इनवार्नमेंट संस्था के अध्ययन के अनुसार गत वर्ष चरम मौसमी घटनाओं में 2,923 लोग मारे गये, 1.84 मिलियन हेक्टेयर जमीन पर फसल बर्बाद हुई, 80,536 घर और 92,519 पशु नष्ट हो गये। ये चरम परिस्थितियां अधिकतर मानसून सीजन की हैं।

एक अन्य अध्ययन के अनुसार पिछली बरसात में हिमाचल प्रदेश के कुल्लू, मंडी, शिमला, सिरमौर, सोलन और चंबा जिलों में 8 से 11 जुलाई, 14 से 15 अगस्त और 22 से 23 अगस्त 2023 को कम से कम तीन चरम दौरों में अचानक आई बाढ़ (फ्लैश फ्लड) और बादल फटने तथा भूस्खलन जैसी चरम घटनाओं में 404 लोगों की जानें चली गई थीं और 38 लोगों का अभी तक पता नहीं चला। उत्तराखण्ड में पिछले साल मानसूनी आपदा में 130 लोगों की जानें चलीं गयीं थी।

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मानसून 2024 - फोटो : PTI
प्राकृतिक घटना है बादल फटना

बादल फटना प्राकृतिक घटना है जो आमतौर पर हिमालय के कई क्षेत्रों में घटती रहती है। आम तौर पर, बादल फटने का तात्पर्य सीमित भौगोलिक क्षेत्र में कम समय में विशेष रूप से भारी वर्षा से है। इसे अक्सर कुछ वर्ग किलोमीटर के सीमित भौगोलिक क्षेत्र में 100 मिमी प्रति घंटे से अधिक वर्षा के रूप में परिभाषित किया जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में बादल फटने की घटनाओं से ही आकस्मिक बाढ़ आती है जो अपने वेग और मलबे के साथ अपने परिमाण के कारण बहुत खतरनाक होती है। ऐसी घटनाओं के लिये उत्तराखण्ड सबसे अधिक संवेदनशील माना जाता है। 

पिछले साल उत्तराखण्ड में मानसून संबंधी आपदाओं में लगभग 130 से अधिक लोग मारे गये थे। हिमाचल प्रदेश में भी कुल्लू, मनाली और शिमला जैसे क्षेत्र पहाड़ी होने के कारण अचानक बाढ़ और बादल फटने के मामले में अधिक संवेदनशील हैं। 

जम्मू और कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्र, जिनमें श्रीनगर और गुलमर्ग जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इसी तरह पूर्वोत्तर राज्य में भी अचानक बाढ़ और बादल फटने का खतरा रहता है। असम में विशेष रूप से ब्रह्मपुत्र घाटी, भारी मानसूनी बारिश और नदी के उफान के कारण अचानक बाढ़ के खतरे का सामना करती है। हिमालयी राज्यों में भूस्खलन एक गंभीर समस्या है। 

इसरो द्वारा तैयार भूस्खलन एटलस में में देश का 12 प्रतिशत भूभाग (147 जिले) संवेदनशील बताये गये हैं जिनमें उत्तराखण्ड का रुद्रप्रयाग पहले और टिहरी जिला दूसरे नम्बर पर है। जम्मू.कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड हिमालय का 1.4 लाख वर्ग किमी क्षेत्र संवेदनशील माना गया है।

आपदा के लिए मानव ज्यादा जिम्मेदार

हालांकि बादल फटने की घटनाओं का पूर्वानुमान लगाना कठिन है, लेकिन इस घटना को बेहतर ढंग से समझने के लिए विशेष रूप से बादल फटने की आशंका वाले क्षेत्रों में वर्षा मापकों का सघन नेटवर्क आवश्यक है। भूविज्ञान, भू-आकृति विज्ञान और जलवायु विज्ञान के विभिन्न पहलुओं पर आधारित ऐसी घटनाओं और अध्ययनों का सटीक माप बादल फटने के पूर्वानुमान मॉडल को विकसित करने में मदद कर सकता है। 

साथ ही क्षेत्र के निवासियों के बीच अत्यधिक वर्षा की घटनाओं और संबंधित आपदाओं के बारे में जागरूकता की आवश्यकता भी है। बढ़ती मानवजनित गतिविधियाँ, सीमित भूमि उपलब्धता और भारी स्थानीय वर्षा के कारण असुरक्षित क्षेत्रों में भूस्खलन की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

मानसून में हिमालयी क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा की घटनाओं को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा कारणों से घाटियों और बरसाती नालों के पास बसने के बजाय लोगों को ढलानों की कठोर चट्टान या ठोस जमीन पर निवास करना चाहिए। उन स्थानों पर जहां जमीन में दरारें विकसित हो गई हैं और धसाव हो गया है वहां बनावट जोखिमपूर्ण होती है।

बादल फटने के दौरान तेज हवा और बिजली गिरना बहुत आम है। भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में अंधाधुंध एवं अवैज्ञानिक निर्माण पर रोक लगाई जानी चाहिए।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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