प्राकृतिक घटना है बादल फटना
बादल फटना प्राकृतिक घटना है जो आमतौर पर हिमालय के कई क्षेत्रों में घटती रहती है। आम तौर पर, बादल फटने का तात्पर्य सीमित भौगोलिक क्षेत्र में कम समय में विशेष रूप से भारी वर्षा से है। इसे अक्सर कुछ वर्ग किलोमीटर के सीमित भौगोलिक क्षेत्र में 100 मिमी प्रति घंटे से अधिक वर्षा के रूप में परिभाषित किया जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में बादल फटने की घटनाओं से ही आकस्मिक बाढ़ आती है जो अपने वेग और मलबे के साथ अपने परिमाण के कारण बहुत खतरनाक होती है। ऐसी घटनाओं के लिये उत्तराखण्ड सबसे अधिक संवेदनशील माना जाता है।
पिछले साल उत्तराखण्ड में मानसून संबंधी आपदाओं में लगभग 130 से अधिक लोग मारे गये थे। हिमाचल प्रदेश में भी कुल्लू, मनाली और शिमला जैसे क्षेत्र पहाड़ी होने के कारण अचानक बाढ़ और बादल फटने के मामले में अधिक संवेदनशील हैं।
जम्मू और कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्र, जिनमें श्रीनगर और गुलमर्ग जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इसी तरह पूर्वोत्तर राज्य में भी अचानक बाढ़ और बादल फटने का खतरा रहता है। असम में विशेष रूप से ब्रह्मपुत्र घाटी, भारी मानसूनी बारिश और नदी के उफान के कारण अचानक बाढ़ के खतरे का सामना करती है। हिमालयी राज्यों में भूस्खलन एक गंभीर समस्या है।
इसरो द्वारा तैयार भूस्खलन एटलस में में देश का 12 प्रतिशत भूभाग (147 जिले) संवेदनशील बताये गये हैं जिनमें उत्तराखण्ड का रुद्रप्रयाग पहले और टिहरी जिला दूसरे नम्बर पर है। जम्मू.कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड हिमालय का 1.4 लाख वर्ग किमी क्षेत्र संवेदनशील माना गया है।
आपदा के लिए मानव ज्यादा जिम्मेदार
हालांकि बादल फटने की घटनाओं का पूर्वानुमान लगाना कठिन है, लेकिन इस घटना को बेहतर ढंग से समझने के लिए विशेष रूप से बादल फटने की आशंका वाले क्षेत्रों में वर्षा मापकों का सघन नेटवर्क आवश्यक है। भूविज्ञान, भू-आकृति विज्ञान और जलवायु विज्ञान के विभिन्न पहलुओं पर आधारित ऐसी घटनाओं और अध्ययनों का सटीक माप बादल फटने के पूर्वानुमान मॉडल को विकसित करने में मदद कर सकता है।
साथ ही क्षेत्र के निवासियों के बीच अत्यधिक वर्षा की घटनाओं और संबंधित आपदाओं के बारे में जागरूकता की आवश्यकता भी है। बढ़ती मानवजनित गतिविधियाँ, सीमित भूमि उपलब्धता और भारी स्थानीय वर्षा के कारण असुरक्षित क्षेत्रों में भूस्खलन की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
मानसून में हिमालयी क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा की घटनाओं को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा कारणों से घाटियों और बरसाती नालों के पास बसने के बजाय लोगों को ढलानों की कठोर चट्टान या ठोस जमीन पर निवास करना चाहिए। उन स्थानों पर जहां जमीन में दरारें विकसित हो गई हैं और धसाव हो गया है वहां बनावट जोखिमपूर्ण होती है।
बादल फटने के दौरान तेज हवा और बिजली गिरना बहुत आम है। भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में अंधाधुंध एवं अवैज्ञानिक निर्माण पर रोक लगाई जानी चाहिए।
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